
बिहार की हार से INDIA में तनाव, अभी बचा है UP का चुनाव; कांग्रेस की कप्तानी को चुनौती
INDIA गठबंधन में दरार की शुरुआत बिहार चुनाव से झारखंड मुक्ति मोर्चा का पीछे हटने को माना जा सकता है। अक्तूबर में झामुमो ने सियासी साजिश बताकर चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया था। बिहार चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले ही जुलाई में आम आदमी पार्टी ने अकेले लड़ने का ऐलान कर दिया था।
बिहार चुनाव में हार का सबसे बड़ा असर INDIA गठबंधन पर पड़ता नजर आ रहा है। कहा जा रहा है कि गठबंधन में अंदरूनी टूट हो सकती है। वहीं, कुछ दल अलग होने का भी ऐलान कर सकते हैं। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। कई दल खुलकर सवाल उठा रहे हैं। बिहार में महागठबंधन सिर्फ 35 सीटों पर सिमट गया, जिसमें INDIA गठबंधन की अगुवाई करने वाली कांग्रेस 6 सीटों पर ही सीमित रह गई। पार्टी ने कुल 61 सीटों पर चुनाव लड़ा था।
पहले भी मिलती रही है चुनौती
गठबंधन की अगुआई को लेकर तृणमूल लगातार कांग्रेस को चुनौती दे रही है। तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, शिवसेना (UBT) और आम आदमी पार्टी मिलकर संसद में कई बार स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता दे चुके हैं। इससे भी लोकसभा में 99 सांसदों के बावजूद गठबंधन के अंदर कांग्रेस का दबदबा कम हुआ है।
अगले चुनावों पर हो सकता है असर
रणनीतिकार मानते हैं कि INDIA गठबंधन के घटकदलों को सीट बंटवारे को लेकर आपसी समझ पैदा करनी होगी। ऐसा नहीं होता है तो वर्ष 2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों पर इसका असर पड़ेगा। क्योंकि, कांग्रेस तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में दूसरी पार्टियों के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ती है।
वहीं, 2027 में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और गुजरात में कांग्रेस का भाजपा से सीधा मुकाबला होगा, पर इन चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के लिए पार्टी को गठबंधन वाले राज्यों में खुद को साबित करना होगा। पार्टी इन चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करती है, तो वह सीधा मुकाबले वाले राज्यों में भाजपा को हरा सकती है।
सपा ने कर दी नेतृत्व की मांग
कहा जा रहा है कि INDIA गठबंधन को सबसे बड़ी और सीधी चुनौती समाजवादी पार्टी से मिल रही है। सीएनएन न्यूज18 से बातचीत में सपा के वरिष्ठ नेता रविदास मेहरोत्रा ने कहा कि अखिले यादव 'को INDIA गठबंधन का नेता बनाया जाना चाहिए, क्योंकि बिहार विधानसभा चुनाव में सभी विपक्षी दलों ने देखा कि वह गठबंधन के लिए कैसे कुर्बानी देते हैं।'
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि चुनाव न लड़ते हुए भी यादव ने 26 बड़ी रैलियों को संबोधित किया था। उन्होंने कांग्रेस और राजद के बीच फ्रैंडली फाइट की अनबन की आलोचना की। दोनों ने 13 सीटों पर एक साथ उम्मीदवार उतारे थे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को राजद का समर्थन करना चाहिए था। उन्होंने कहा कि पार्टी भाजपा को 2027 में हराने में सक्षम है।
झामुमो ने की शुरुआत!
INDIA गठबंधन में दरार की शुरुआत बिहार चुनाव से झारखंड मुक्ति मोर्चा का पीछे हटने को माना जा सकता है। अक्तूबर में झामुमो ने सियासी साजिश बताकर चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया था। झामुमो के वरिष्ठ नेता सुदिव्य कुमार ने संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि उनकी पार्टी झारखंड में कांग्रेस और राजद के साथ गठबंधन की समीक्षा करेगी और इस ‘अपमान’ का करारा जवाब देगी।
झारखंड के पर्यटन मंत्री कुमार ने कहा, 'राजद और कांग्रेस एक राजनीतिक साजिश के तहत झामुमो को चुनाव लड़ने से वंचित करने के लिए जिम्मेदार हैं। झामुमो इसका करारा जवाब देगा और राजद व कांग्रेस के साथ अपने गठबंधन की समीक्षा करेगा।'
कुमार ने कहा, 'बिहार विधानसभा चुनाव-2020 में राजद और कांग्रेस ने झामुमो को तीन सीटें देने का आश्वासन दिया था, लेकिन बाद में उन्होंने हमें धोखा देते हुए आपस में सीटें बांट लीं। पिछले साल झारखंड चुनाव में झामुमो ने कांग्रेस, राजद और वाम दलों के लिए सम्मानजनक संख्या में सीटें छोड़ी थीं, लेकिन 2025 के बिहार चुनाव में पार्टी को फिर से अपमानित होना पड़ा।'
उन्होंने बिहार में ‘महागठबंधन’ के प्रमुख दलों द्वारा रची गई ‘‘सियासी साजिश’’ से लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। कुमार ने दावा किया, ‘‘झामुमो एक बड़ी ताकत है और देश में आदिवासियों की एक मजबूत आवाज है। इस विश्वासघात को भुलाया नहीं जाएगा।’’ उन्होंने कहा कि कांग्रेस को बिहार में झामुमो के हितों के लिए लड़ना चाहिए था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।
AAP ने बना ली थी कांग्रेस से दूरी
बिहार चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले ही जुलाई में आम आदमी पार्टी ने अकेले लड़ने का ऐलान कर दिया था। तब एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा था, 'आप बिहार चुनाव अकेले लड़ेगी। INDIA ब्लॉक सिर्फ लोकसभा चुनाव के लिए था। कांग्रेस के साथ अब कोई गठबंधन नहीं होगा। अगर कोई गठबंधन होता, तो कांग्रेस विस्वादार उपचुनाव क्यों लड़ रही है। वो हमें हराने आए हैं। भाजपा ने हमें हराने और वोट काटने के लिए कांग्रेस को भेजा है।'
इससे पहले दिल्ली चुनाव में भी आप ने अकेले ही लड़ने का फैसला किया था। हालांकि, उस चुनाव में आप को हार का सामना करना पड़ा और पार्टी बिहार में एक भी सीट जीतने में नाकाम रही।
बिहार में कांग्रेस में भी दिखा असंतोष
कांग्रेस इस बार कुल 61 सीटों पर चुनाव लड़ रही थी, जो 2020 के मुकाबले पांच कम हैं। पिछले चुनाव में उसे केवल 19 सीटें मिली थीं और उसकी खराब सफलता दर को महागठबंधन की हार के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था।
पीटीआई भाषा के अनुसार, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ से मिली गति के बावजूद कांग्रेस में असंतोष कायम है। राज्य के कई नेताओं ने टिकट बंटवारे के मापदंड पर सवाल उठाए हैं, क्योंकि जिन उम्मीदवारों को पिछली बार भारी हार मिली थी, उन्हें फिर मौका दिया गया, जबकि बेहतर प्रदर्शन करने वालों को नजरअंदाज किया गया है।
एजेंसी के अनुसार, पप्पू यादव की बढ़ती राजनीतिक हैसियत भी कांग्रेस में असंतोष का कारण बनी है। पूर्णिया के निर्दलीय सांसद और कांग्रेस से राज्यसभा सदस्य रंजीत रंजन के पति पप्पू यादव के करीबी कई नेताओं को टिकट दिया गया है, जिससे पुराने नेताओं में नाराजगी है।
यूपी में गठबंधन के भविष्य को लेकर अटकलें
पीटीआई भाषा के अनुसार, बिहार में एनडीए की एकतरफा जीत के बाद उत्तर प्रदेश में में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर विपक्षी दलों के समूह 'INDIA गठबंधन' के भविष्य को लेकर अटकलें शुरू हो गई हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस को ‘मुस्लिम लीगी’ और ‘माओवादी’ करार देते हुए यह कहकर कि 'जल्द ही कांग्रेस में विभाजन देखने को मिलेगा' एक नई बहस की शुरुआत कर दी है।
जानकार मानते हैं कि उप्र में इसको लेकर मंथन शुरू होगा और भविष्य की उम्मीद तलाशते पक्ष-विपक्ष के कार्यकर्ताओं को भी समीक्षा की एक नई कसौटी मिलेगी। इसके लिए दिमागी स्तर पर खेल शुरू हो चुका है। उप्र में 2024 के लोकसभा चुनाव से सपा के गठजोड़ से कुछ हद तक नया जीवन पाने वाली कांग्रेस 2027 के महागठबंधन के सवालों को लेकर सीधे-सीधे जवाब देने से बच रही है।
एक तथ्य यह भी है कि 2017 के विधानसभा चुनावों में खराब परिणाम आने के बाद कांग्रेस और सपा के रिश्ते टूट गये थे और दोनों लड़कों (राहुल-अखिलेश) की जोड़ी अलग हो गई थी।
2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद से ही उप्र में सपा और कांग्रेस की एकता ने यहां 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर संभावनाओं की एक नई जमीन तैयार की थी। इसके बाद से ही राजनीतिक पंडितों को 2027 में राज्य में विपक्ष के भविष्य को लेकर संभावनाएं दिखने लगी थीं।
हालांकि सपा के मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता और उप्र सरकार के पूर्व मंत्री राजेंद्र चौधरी ने पीटीआई-भाषा से कहा 'झटका लगने जैसी कोई बात नहीं है, हम परिणाम की समीक्षा करेंगे कि उसकी क्या-क्या वजहें हैं।' चौधरी ने यह दावा किया कि 'INDIA गठबंधन पर कोई आंच नहीं आएगी, गठबंधन मजबूत रहेगा।'
क्या मुस्लिम वोटर देख रहे हैं दूसरा विकल्प?
हिन्दुस्तान टाइम्स से बातचीत में विपक्ष के एक नेता ने बिहार में AIMIM के 5 सीटें सीमांचल में जीतने की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा, 'इससे पता चलता है कि मुस्लिम मतदाताओं का एक वर्ग चुनावी विकल्पों के तौर पर INDIA ब्लॉक से आगे देख रहा है।'
अखबार से एक बातचीत में एक कांग्रेस नेता ने स्वीकार किया कि बिहार के नतीजे पार्टी के सीट शेयरिंग क्षमता को प्रभावित करेंगे। उन्होंने कहा, 'हमने बिहार में 61 सीटों के लिए कड़ी मेहनत की थी, लेकिन हमारा प्रदर्शन उत्तर प्रदेश या अन्य हिंदी बेल्ट राज्यों में ज्यादा सीटों के लिए मदद नहीं करेगा।'





