अतीक अहमद का एक और चिराग बुझा, छोटे बेटे की दर्दनाक मौत; कैसे खत्म हुआ 'डॉन' का कुनबा?
माफिया अतीक अहमद के सबसे छोटे बेटे अबान की झांसी में एक दर्दनाक सड़क हादसे में मौत हो गई है। वह जेल में बंद अपने भाई से मिलने जा रहा था। जानें अतीक के खौफ से लेकर उसके कुनबे के खौफनाक अंत की पूरी कहानी।

मारे गए माफिया डॉन अतीक अहमद के परिवार का बुरा दौर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। कभी प्रयागराज (इलाहाबाद) में जिस परिवार के नाम से लोग कांपते थे, आज उस परिवार का वजूद लगभग मिट चुका है। गुरुवार को अतीक के सबसे छोटे बेटे अबान की झांसी में एक दर्दनाक सड़क हादसे में मौत हो गई है। बताया जा रहा है कि वह जेल में बंद अपने बड़े भाई से मिलने जा रहा था, तभी यह हादसा हुआ। तांगेवाले के बेटे से 'डॉन' बनने और फिर पूरे परिवार के खाक में मिलने तक, अतीक अहमद की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। आइए जानते हैं कि कैसे शुरू हुआ था अतीक का खौफ, कैसे हुआ उसका अंत और अब उसके परिवार में कौन-कौन बचा है।
17 की उम्र में मर्डर और जुर्म की दुनिया में एंट्री
अतीक अहमद के पिता हाजी फिरोज इलाहाबाद में तांगा चलाते थे। अतीक पढ़ाई में कमजोर था और जल्द ही उसने स्कूल छोड़ दिया। अमीर बनने की चाहत में उसने जरायम की दुनिया का रास्ता चुना।
साल 1979 में, महज 17 साल की उम्र में अतीक पर हत्या का पहला मुकदमा दर्ज हुआ। उस दौर में इलाहाबाद में 'चांद बाबा' नाम के गुंडे का खौफ था। पुलिस और नेता चांद बाबा से परेशान थे। अतीक ने इसे मौके के तौर पर देखा और पुलिस-नेताओं की शह पर चांद बाबा का ही मर्डर कर दिया। इसके बाद अतीक अहमद रातों-रात इलाहाबाद का नया 'डॉन' बन गया।
सियासत का चोला और बाहुबली की छवि
अपराध के दम पर अतीक ने राजनीति में एंट्री ली। 1989 में उसने इलाहाबाद पश्चिमी सीट से निर्दलीय विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत गया।
इसके बाद वह लगातार 5 बार विधायक रहा। 2004 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर फूलपुर लोकसभा सीट (जो कभी पंडित जवाहरलाल नेहरू की सीट थी) से जीतकर सांसद बना। उसके खिलाफ हत्या, अपहरण, रंगदारी और जमीन कब्जे के 100 से ज्यादा मुकदमे दर्ज हुए, लेकिन खौफ ऐसा था कि कोई गवाही देने को तैयार नहीं होता था।
राजू पाल हत्याकांड: वह जुर्म जिसने उल्टी गिनती शुरू की
अतीक के सांसद बनने के बाद इलाहाबाद पश्चिमी की विधानसभा सीट खाली हुई। अतीक ने वहां से अपने भाई अशरफ को चुनाव लड़वाया, लेकिन बसपा के टिकट पर खड़े राजू पाल ने अशरफ को हरा दिया। यह अतीक के अहम पर बहुत बड़ी चोट थी। 25 जनवरी 2005 को दिनदहाड़े विधायक राजू पाल को भून दिया गया। इस केस का मुख्य गवाह था उमेश पाल।
'मिट्टी में मिला देंगे': ऐसे हुआ डॉन का अंत
सालों तक उमेश पाल अतीक के खिलाफ डटा रहा। अतीक जेल में था, लेकिन उसका नेटवर्क बाहर काम कर रहा था। 24 फरवरी 2023 को प्रयागराज में दिनदहाड़े उमेश पाल की बम और गोलियों से हत्या कर दी गई।
इस घटना ने यूपी की सियासत में भूचाल ला दिया। विधानसभा में सीएम योगी आदित्यनाथ ने गरजते हुए कहा- "माफियाओं को मिट्टी में मिला देंगे।" इसके बाद यूपी पुलिस और एसटीएफ का ऐसा एक्शन शुरू हुआ, जिसने अतीक के साम्राज्य को जड़ से उखाड़ फेंका।
13 अप्रैल 2023: उमेश पाल हत्याकांड में शामिल अतीक के तीसरे बेटे असद का झांसी में एसटीएफ ने एनकाउंटर कर दिया।
15 अप्रैल 2023: बेटे को सुपुर्द-ए-खाक किए जाने के कुछ घंटों बाद ही, प्रयागराज के कॉल्विन अस्पताल के बाहर मीडिया के कैमरों के सामने पुलिस कस्टडी में अतीक और उसके भाई अशरफ की तीन लड़कों ने गोलियों से भूनकर हत्या कर दी।
अब अतीक के परिवार में कौन-कौन बचा है?
अतीक अहमद के 5 बेटे थे। भाई और खुद की मौत के बाद अतीक का पूरा परिवार आज या तो जेल में है, फरार है या कब्र में जा चुका है।
शाइस्ता परवीन (पत्नी): उमेश पाल हत्याकांड के बाद से ही अतीक की पत्नी शाइस्ता फरार है। उस पर 50 हजार रुपये का इनाम है और पुलिस आज तक उसे नहीं खोज पाई है।
उमर (सबसे बड़ा बेटा): लखनऊ के एक बिल्डर के अपहरण और देवरिया जेल कांड के आरोप में उमर फिलहाल लखनऊ जेल में बंद है।
अली अहमद (दूसरा बेटा): रंगदारी और हत्या के प्रयास के मामलों में अली नैनी सेंट्रल जेल (प्रयागराज) में बंद है।
असद (तीसरा बेटा): उमेश पाल हत्याकांड में गोली चलाते हुए दिखा था। पुलिस ने झांसी में एनकाउंटर में इसे मार गिराया था।
अहजाम (चौथा बेटा): माता-पिता के फरार होने और मारे जाने के बाद यह बाल सुधार गृह में था। बाद में इसे अतीक की बहन (बुआ) को सौंप दिया गया था।
अबान (सबसे छोटा बेटा): हाल ही में सामने आई खबर के मुताबिक, अपने जेल में बंद भाई से मिलने जाते वक्त झांसी में एक कार एक्सीडेंट में अबान की भी मौत हो गई है।
कभी करोड़ों की संपत्ति और हथियारों के दम पर सत्ता को चुनौती देने वाले अतीक अहमद के कुनबे का यह खौफनाक अंजाम आज अपराध की दुनिया के लिए एक बड़ी नजीर बन चुका है।
लेखक के बारे में
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अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।
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