Explainer: रूस और ईरानी तेल खरीद पर मिली अमेरिकी छूट खत्म, अब भारत की बढ़ेगी परेशानी?

Upendra Thapak लाइव हिन्दुस्तान
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अमेरिका ने रूस और ईरानी कच्चे तेल खरीद पर दी गई छूट को वापस ले लिया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इस छूट को आगे बढ़ाने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि यह छूट केवल समुद्र में टैंकरों पर मौजूद तेल के लिए थी, जिसका उपयोग हो चुका है।

रूस और ईरानी तेल खरीद पर मिली अमेरिकी छूट खत्म, अब भारत की बढ़ेगी परेशानी?

पश्चिम एशिया में जारी संकट के बीच वैश्विक बाजार में तेल के दाम स्थिर रखने के लिए अमेरिका ने एक महीने रूसी और ईरानी तेल खरीदने की छूट दी थी। अब अमेरिका ने इस छूट को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया है। अमेरिकी वित्त मंत्री ने गुरुवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि रूसी तेल खरीद की छूट 11 अप्रैल को खत्म हो चुकी है, जबकि ईरानी तेल खरीद के ऊपर मिली छूट 19 अप्रैल को खत्म हो जाएगी। इसे आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है।

बेसेंट ने कहा, "हम रूसी तेल पर दिए जा रहे सामान्य छूट का नवीनीकरण नहीं करेंगे। रूस के अलावा ईरान के तेल पर भी अब छूट नहीं दी जाएगी। यह छूट केवल उस कच्चे तेल के लिए थी, जो पहले से ही समुद्र में टैंकरों में भरा हुआ था। एक महीने के समय में इसका उपयोग हो चुका है।"

अमेरिकी छूट का वैश्विक बाजार पर क्या हुआ असर?

ईरान के ऊपर हमला करके अमेरिका ने दुनिया भर को ऊर्जा संकट में धकेल दिया था। होर्मुज के बंद होने से ऊर्जा सप्लाई बुरी तरह से प्रभावित हुई थी। इसके बाद वैश्विक तेल बाजार की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका ने रूसी और ईरान तेल पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था। इसका फायदा यह हुआ कि तेल बाजार में खाड़ी देशों से आने वाले तेल की कमी के बावजूद तेल पर्याप्त मात्रा में आता रहा। हालांकि, वैश्विक बाजार पर इसका असर कितना हुआ, इसका कुछ नतीजा सामने नहीं आया, क्योंकि ईरान युद्ध के शुरू होने के बाद से लेकर अब तक तेल की कीमतें ऊंची ही हैं।

छूट की वजह से अमेरिका की जमकर हुई थी आलोचना

वैश्विक तेल बाजार में कीमतों को स्थिर रखने के लिए अमेरिका द्वारा दी गई इस छूट के लिए ट्रंप प्रशासन की कड़ी आलोचना हुई थी। विशेषज्ञों ने राष्ट्रपति ट्रम्प के इस प्रयास को मध्यवाधि चुनाव के पहले अंतर्राष्ट्रीय तेल कीमतों और उसके घरेलू असर को कम करने वाला माना।

इस छूट के लिए ट्रंप प्रशासन को काफी आलोचना का सामना भी करना पड़ा। आलोचकों ने तर्क दिया कि इस कदम से रूस और ईरान को वित्तीय मदद मिलेगी। अमेरिका कई वर्षों से इसी मदद को रोकने के लिए प्रयास कर रहा था। इसके जवाब में अमेरिकी वित्तमंत्री ने कहा था कि यह छूट केवल उस तेल के लिए है, जो पहले से ही समंदर में मौजूद है। इससे रूस को या ईरान को ज्यादा लाभ नहीं होगा।

भारत ने जमकर खरीदा तेल

यूक्रेन युद्ध के शुरू होने के बाद से भारत लगातार रूस से तेल खरीद रहा है। अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप की सत्ता आने के बाद भारत ने कुछ मात्रा में तेल खरीद को कम किया था, लेकिन इसके बाद पिछले महीने अमेरिकी छूट मिलने के बाद रूस से तेल आयात और भी ज्यादा बढ़ गया।

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध की वजह से भारत के तेल आयात का एक बड़ा हिस्सा कट गया, जिसकी वजह से भारत की रूसी तेल पर निर्भरता बढ़ गई। इसकी वजह से मार्च और अप्रैल के महीनों में देश के रूसी तेल आयात में भारी वृद्धि हुई।

भारत को हुआ लाभ

पश्चिम एशिया में जारी संकट और बढ़ते कच्चे तेल के दामों से निपटने के लिए अमेरिका ने सबसे पहले भारत को ही यह छूट दी थी। हालांकि, सरकार ने साफ किया था कि उसे किसी भी छूट की आवश्यकता नहीं है। मार्च में भारत के लिए अमेरिका की तरफ से आए इस बयान के कुछ दिन बाद ही सभी देशों के लिए इसे लागू कर दिया गया।

सरकारी सूत्रों का कहना था कि रूस से तेल खरीदने के लिए भारत को अमेरिका से छूट की आवश्यकता नहीं थी। हालांकि, उद्योग विशेषज्ञों का कहना था कि इस छूट से वास्तव में मदद मिली है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि भारतीय रिफाइनर प्रतिबंधित टैंकरों पर रूसी तेल की आपूर्ति प्राप्त करने में सक्षम थे और रोसनेफ्ट और लुकोइल जैसी अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रही रूसी कंपनियों के साथ सीधे सौदे कर सकते थे। इसके अलावा, इसने मॉस्को से कच्चे तेल की भारी खरीद को लेकर वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच किसी भी तरह के तनाव को अस्थायी रूप से समाप्त कर दिया।

बता दें, ट्रंप ने कुछ महीने पहले ही रूसी तेल खरीदने की वजह से भारत के ऊपर 25 फीसदी का अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया था। हालांकि, इसके बाद भी भारत ने रूस से अपनी तेल खरीद को कम नहीं किया था।

भारत ने सबसे ज्यादा तेल रूस से मंगाया

पश्चिम एशिया संकट के बीच अमेरिका की इस छूट ने भारत को ऊर्जा संकट से निकलने में मदद की। भारतीय रिफाइनर ईरानी तेल की कुछ खेप भी प्राप्त करने में सक्षम थे, जो लगभग सात वर्षों में भारत को तेहरान के कच्चे तेल की पहली खेप थी, हालांकि रूसी कच्चे तेल के आयात की तुलना में इसकी मात्रा नगण्य थी। पश्चिम एशिया युद्ध शुरू होने से पहले भी भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहा था, लेकिन पिछले कुछ महीनों में इसकी मात्रा में उल्लेखनीय कमी आई थी। अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से भारत ने फरवरी में रूस से केवल 10 लाख बैरल प्रतिदिन तेल खरीदा था।

केप्लर के टैंकर डाटा के अनुसार, पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध और प्रतिबंधों में छूट लागू होने के बाद, मार्च में भारत का रूसी तेल आयात लगभग दोगुना होकर 20 लाख बैरल प्रति दिन (बीपीडी) हो गया। यह मार्च में भारत के कुल तेल आयात का 44.4% था। यह आंकड़े दिखाते हैं कि मार्च के महीने में भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदा है। इसके अलावा अप्रैल के पहले दो हफ्तों में, भारत का रूसी तेल आयात औसतन 16 लाख बीपीडी रहा।

छूट खत्म लेकिन होर्मुज का संकट बरकरार

अमेरिका द्वारा भले ही छूट समाप्त कर दी गई हो, लेकिन पश्चिम एशिया का संकट अभी भी जारी है। इस छूट के खत्म होने के बाद रूस से तेल आयात में कुछ समायोजन और गिरावट आ सकती है, हालांकि आने वाले महीनों में मॉस्को भारत के कच्चे तेल का सबसे बड़ा स्रोत बना रहेगा। भारत सरकार भी यह साफ कर चुकी है कि दिल्ली अपनी हितों की रक्षा के लिए किसी भी देश से तेल खरीदेगी।

Upendra Thapak

लेखक के बारे में

Upendra Thapak

उपेंद्र ने डिजिटल पत्रकारिता की शुरुआत लाइव हिन्दुस्तान से की है। पिछले एक साल से वे होम टीम में कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर कार्यरत हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव 2024, ऑपरेशन सिंदूर और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की कवरेज की है। पत्रकारिता की पढ़ाई भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली (बैच 2023-24) से पूरी करने वाले उपेंद्र को इतिहास, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, राजनीति, खेल, विज्ञान और समसामयिक घटनाओं से जुड़े विषयों में गहरी रुचि है। स्नातक स्तर पर बायोटेक्नोलॉजी की पढ़ाई करने के कारण उन्हें मेडिकल और वैज्ञानिक विषयों की भाषा की भी अच्छी समझ है। वे मूल रूप से मध्यप्रदेश के भिंड जिले के निवासी हैं।

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