अगर लोगों में वैज्ञानिक सोच होती, तो... नदियों में दूध बहाने पर बिदके जस्टिस ओका; क्या बोले?
जस्टिस ओका ने कहा कि दूध पानी को काफी हद तक प्रदूषित कर सकता है और इसे ठीक होने में लंबा वक्त लगेगा, क्योंकि दूध में ऐसा गुण होता है कि वह ऑक्सीजन सोख लेता है।

सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस अभय एस ओका ने आस्था के नाम पर नदियों में दूध प्रवाहित करने पर गहरी चिंता और नाराजगी जताई है और कहा है कि अगर लोगों में वैज्ञानिक सोच होती, तो वे इस तरह नदियों में दूध नहीं बहाते। हाल ही में चेन्नई में एक कार्यक्रम में बोलते हुए जस्टिस ओका ने पर्यावरण को बचाने के लिए वैज्ञानिक सोच विकसित करने की जरूरत पर बल दिया और कहा कि आस्था के नाम पर कोई भी काम करने से पहले, उसे वैज्ञानिक सोच के आधार पर परखना जरूरी है। जस्टिस ओका ने यह भी कहा कि वैज्ञानिक सोच के आधार पर परखने वाला विश्लेषण धर्म के खिलाफ नहीं है।
नदियों में दूध प्रवाहित करने और नदियों में स्नान की प्रथा का ज़िक्र करते हुए, जस्टिस ओका ने कहा कि अगर ऐसे फैसलों को वैज्ञानिक सोच की कसौटी पर परखा जाए, तो पता चलेगा कि नदियों में दूध बहाने से जलीय जीवन पर बुरा असर पड़ता है और उसे ठीक होने में काफी समय लगता है। उन्होंने कहा, “धर्म के नाम पर, हम अपने पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं। अगर मैं वैज्ञानिक सोच विकसित करता हूँ, तो इसका मतलब यह नहीं है कि मैं किसी आस्था या धर्म के खिलाफ हूँ।”
दूध ऑक्सीजन सोख लेता है
लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस ओका ने आगे कहा, “मैं एक उदाहरण देता हूँ। उन लोगों को लीजिए जो नदियों में दूध बहाते हैं। अब, वैज्ञानिक सोच क्या है? कोई भी काम करने से पहले, आपको उसे विज्ञान के आधार पर परखना चाहिए। अगर आप Google करेंगे या कोई किताब खोलेंगे, तो पता चलेगा कि दूध नदियों को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है। यह पानी को काफी हद तक प्रदूषित कर सकता है और इसे ठीक होने में लंबा वक्त लगेगा, क्योंकि दूध में ऐसा गुण होता है कि वह ऑक्सीजन सोख लेता है। अब, अगर वहाँ बैठे उन लोगों में वैज्ञानिक सोच होती, तो वे ऐसा नहीं करते। इसलिए जब हम धर्म के नाम पर ऐसा कुछ करते हैं जिससे पर्यावरण पर असर पड़ता है, तो हमें यह परखना चाहिए कि हम जो करने जा रहे हैं, वह विज्ञान के आधार पर सही है या नहीं। आखिरकार, वैज्ञानिक सोच ही हमें बताती है कि क्या गलत है और क्या सही है।”
एन राम के सवाल का दे रहे थे जस्टिस ओका जवाब
जस्टिस ओका, राकेश लॉ फाउंडेशन और रोज़ा मुथैया रिसर्च लाइब्रेरी द्वारा आयोजित एक लेक्चर सीरीज के दौरान 'द हिंदू ग्रुप' के निदेशक एन. राम द्वारा पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रहे थे। यह लेक्चर सीरीज न्याय और समानता के लिए वार्षिक 'राकेश एंडोमेंट लेक्चर सीरीज़' का हिस्सा थी, जिसकी शुरुआत वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद एन.आर. इलांगो के बेटे आर. राकेश की याद में की गई थी। इस साल लेक्चर सीरीज का विषय है, “पर्यावरण – भारत के संविधान के तहत अधिकार या कर्तव्य।”
गरीबों को ही प्रदूषण का सबसे ज्यादा खामियाज़ा भुगतना पड़ता है
जब एन राम ने जस्टिस ओका से पूछा कि वैज्ञानिक सोच विकसित करने की जरूरत और पर्यावरण की रक्षा करने की जरूरत, अधिकारों और कर्तव्यों के बीच क्या संबंध है, तो जज ने वैज्ञानिक सोच और धार्मिक अधिकारों के पालन के बीच के आपसी तालमेल के बारे में विस्तार से बताया। जस्टिस ओका ने यह भी बताया कि हमारे देश में, अक्सर गरीबों को ही प्रदूषण का सबसे ज्यादा खामियाज़ा भुगतना पड़ता है, जबकि शहरों में रहने वाले लोग, जो अक्सर प्रदूषण फैलाने में अधिक योगदान देते हैं, शहरों में आराम से रहते हैं। जस्टिस ओका ने कहा कि इस समय की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि पढ़े-लिखे लोगों को पर्यावरण कानूनों और संविधान के बारे में जागरूक किया जाए।
लेखक के बारे में
Pramod Praveenप्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।
अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।


