अगर इसे स्वीकार कर लिया तो हमारे भाई जस्टिस बागची को जाना पड़ेगा बंगाल, CJI ने किस मुद्दे पर ली चुटकी

Pramod Praveen लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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CJI Suryakant on Justice Bagchi : जस्टिस कांत की अगुवाई वाली पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि उठाए गए मुद्दे नीतिगत दायरे में आते हैं और इन पर उचित विधायी और कार्यकारी अधिकारियों (संसद और सरकार) द्वारा विचार किया जाना ही सबसे बेहतर है।

अगर इसे स्वीकार कर लिया तो हमारे भाई जस्टिस बागची को जाना पड़ेगा बंगाल, CJI ने किस मुद्दे पर ली चुटकी

CJI Suryakant on Justice Bagchi : देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ आज (गुरुवार, 16 अप्रैल को) एक ऐसी जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें अनिवार्य मतदान लागू करने के निर्देश देने की मांग की गई थी। अपनी याचिका में याचिकाकर्ता अजय गोयल ने सुप्रीम कोर्ट से यह निर्देश देने की मांग की थी कि सभी मतदाताओं को अनिवार्य रूप से वोट देने का बाध्यकारी निर्देश दिया जाए, जिसे शीर्ष न्यायालय ने खारिज कर दिया।

अपनी अर्जी में याचिकाकर्ता ने कहा था कि जो लोग मतदान करने से इनकार करते हैं, उन्हें सरकारी सुविधाओं से भी वंचित कर देना चाहिए और उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन शीर्ष अदालत ने दो टूक कहा कि इस पर कड़ा रुख नहीं अपनाया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनावों में भागीदारी को दमनकारी या बाध्यकारी उपायों से लागू नहीं कर सकते।

वोट देने के लिए मजबूर नहीं कर सकते

CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि लोकतंत्र में नागरिकों से मताधिकार प्रयोग करने की अपेक्षा होती है, लेकिन राज्य किसी व्यक्ति को वोट देने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। याचिकाकर्ता के वकील ने सुझाव दिया था कि अदालत चुनाव आयोग को अनिवार्य मतदान के लिए दिशानिर्देश बनाने और बिना वैध कारण वोट न देने वालों पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक समिति गठित करने का निर्देश दे। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि मताधिकार के प्रति जन जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए, लेकिन हम इसके लिए मजबूर नहीं कर सकते।

न्यायिक कार्य भी तो जरूरी है: जस्टिस बागची

इसके बाद CJI सूर्यकांत ने कहा, "अगर हम इस याचिका को स्वीकार कर लेते हैं और ये मान लेते हैं, तो मेरे भाई-साथी जस्टिस बागची को भी पश्चिम बंगाल जाना पड़ेगा और वहां जाकर वोट डालना होगा, भले ही यहां उस दिन काम-काज का दिन हो।" इसी बीच जस्टिस बागची ने कहा, "न्यायिक कार्य भी तो जरूरी है।" बार एंड बेंच के मुताबिक, CJI ने इसके आगे कहा, “तो क्या हमें उनकी गिरफ्तारी वगैरह का आदेश देना चाहिए? एक ऐसा देश जो कानून के राज से चलता है और लोकतंत्र में विश्वास रखता है, और हमने पिछले 75 सालों में यह दिखाया भी है कि हम इस पर कितना भरोसा करते हैं, वहाँ सभी से यह उम्मीद की जाती है कि वे वोट डालने जाएँ। अगर वे नहीं जाते हैं तो न जाएं। इसलिए, बस जागरूकता की जरूरत है। लेकिन हम किसी को मजबूर नहीं कर सकते। अगर कोई गरीब आदमी यह कहता है कि मुझे तो अपनी दिहाड़ी कमानी है, मैं वोट डालने कैसे जाऊँ? तो हम उससे क्या कहेंगे?”

कुछ पाबंदियाँ लगानी जरूरी हैं, मीलॉर्ड!

इतना सुनने के बाद याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, "कुछ पाबंदियाँ लगानी जरूरी हैं,मीलॉर्ड! ताकि वे सरकार की योजनाओं का लाभ न उठा सकें।" इस पर CJI ने फिर चुटकी ली और कहा, "यह काम आप हमारी तरफ से कर लीजिए।" न्यायालय ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि उठाए गए मुद्दे नीतिगत दायरे में आते हैं और इन पर उचित विधायी और कार्यकारी अधिकारियों (संसद और सरकार) द्वारा विचार किया जाना ही सबसे बेहतर है। पीठ ने दोहराया कि मतदान एक संवैधानिक अधिकार और लोकतांत्रिक कर्तव्य है, लेकिन इसे किसी पर थोपा नहीं जा सकता।

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लेखक के बारे में

Pramod Praveen

प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।

अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।

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