कोख से पैदा हुए और गोद लिए बच्चे में नहीं कोई अंतर; SC का बड़ा फैसला, तीन माह की बाध्यता भी खत्म

लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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बेंच ने कहा कि गोद लिया हुआ बच्चा, तथाकथित 'सगे' बच्चे से किसी भी तरह से अलग नहीं होता। गोद लेने का काम, माता-पिता होने के एहसास को उतना ही गहरा, या शायद उससे भी ज़्यादा गहरा पुष्टिकरण देता है।

कोख से पैदा हुए और गोद लिए बच्चे में नहीं कोई अंतर; SC का बड़ा फैसला, तीन माह की बाध्यता भी खत्म

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (17 मार्च) को एक अहम फैसला सुनाते हुए व्यवस्था दी है कि किसी महिला के गर्भ (कोख) से पैदा हुए बच्चे और गोद लिए गए बच्चे में कोई अंतर नहीं है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने कहा कि तीन महीने से अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं को मातृत्व अवकाश से वंचित करना असंवैधानिक है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि ऐसी महिलाओं को भी 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलना चाहिए।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि मातृत्व संरक्षण का उद्देश्य इस बात पर निर्भर नहीं करता कि बच्चा परिवार में कैसे आया है। अदालत ने कहा, “जो महिलाएं बड़े बच्चे को गोद लेती हैं, वे भी उसी स्थिति में हैं जैसे कोई महिला तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेती हैं।” पीठ ने कहा, “हालांकि, पारंपरिक रूप से रिश्तेदारी को समझने का मुख्य आधार जीव विज्ञान (बायोलॉजी) रहा है, लेकिन गोद लेना भी परिवार बनाने का उतना ही सही तरीका है। परिवार का आधार जीव विज्ञान नहीं, बल्कि आपसी जुड़ाव और साझा भावनाएँ होती हैं। सिर्फ़ जैविक कारक ही परिवार तय नहीं करते। गोद लिया हुआ बच्चा, अपने सगे बच्चे से किसी भी तरह अलग नहीं होता।”

कानून की धारा पर सवाल

कोर्ट ने माना कि 'सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020' की धारा 60(4) के तहत उम्र से जुड़ी ऐसी पाबंदियाँ, संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करती हैं। इस धारा में यह प्रावधान था कि महिलाएँ मातृत्व अवकाश की हकदार तभी होंगी, जब वे 3 महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लें। हालांकि, अदालत ने इस धारा को निरस्त नहीं किया, बल्कि इसकी व्याख्या करते हुए महिलाओं के अधिकारों का विस्तार किया।

“गोद लेना भी परिवार बनाने का समान अधिकार”

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि गोद लेना परिवार बनाने का एक समान और वैध तरीका है। अदालत ने टिप्पणी की, “गोद लिया गया बच्चा तथाकथित ‘जैविक’ बच्चे से अलग नहीं होता। यह मातृत्व और पितृत्व की गहरी स्वीकृति है।” पीठ ने यह भी कहा कि कानूनी प्रक्रियाओं के चलते तीन महीने से कम उम्र के बच्चों को गोद लेना बहुत कम मामलों में संभव होता है, इसलिए यह शर्त व्यावहारिक रूप से भी अनुचित है।

पितृत्व अवकाश पर भी सुझाव

मातृत्व अवकाश के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पितृत्व अवकाश को भी सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने के लिए कानून बनाने की सिफारिश की। कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला हमसानंदिनी नंदूरी द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर आया, जिसमें आयु-आधारित इस भेदभाव को मनमाना और असंवैधानिक बताया गया था। यह निर्णय न केवल गोद लेने वाली माताओं के अधिकारों को मजबूत करता है, बल्कि भारतीय समाज में दत्तक ग्रहण को समान सम्मान देने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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Pramod Praveen

लेखक के बारे में

Pramod Praveen

प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।

अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।

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