एक गलती से मिली मौत की सजा! अब 34 करोड़ देकर सऊदी से आजाद हुआ केरल का ड्राइवर अब्दुल
केरल के अब्दुल रहीम 20 साल बाद सऊदी अरब की जेल से रिहा हो रहे हैं। 2006 में एक अनजाने हादसे के चलते उन्हें मौत की सजा मिली थी। दुनिया भर के मलयाली समुदाय ने 34 करोड़ रुपये की 'ब्लड मनी' जुटाकर उनकी जान बचाई।

सऊदी अरब की जेल में पिछले करीब 20 सालों से मौत की सजा के साए में जी रहे केरल के अब्दुल रहीम आखिरकार अब अपने घर लौटने वाले हैं। उनका यह सफर दहशत, अनिश्चितता, लंबी कानूनी लड़ाई और आम जनता द्वारा चलाए गए एक ऐतिहासिक अभियान की दास्तान है। पीड़ित परिवार द्वारा 34 करोड़ रुपये की 'ब्लड मनी' स्वीकार करने के बाद उनकी फांसी की सजा टल गई है और अब वह एक आजाद इंसान के तौर पर अपने वतन वापस आने की कगार पर हैं।
महज 28 दिन में ही जेल पहुंच गए थे रहीम
कोझिकोड जिले के रहने वाले 6 भाई-बहनों में सबसे छोटे अब्दुल रहीम केरल में अपने परिवार का पेट पालने के लिए ऑटो-रिक्शा और स्कूल बस चलाते थे। बेहतर जिंदगी की तलाश में वह 28 नवंबर 2006 को सऊदी अरब के रियाद गए थे, जहां उन्हें बतौर ड्राइवर नौकरी मिली थी।
इसके साथ ही उन्हें अपने कफील (मालिक) के 17 वर्षीय लकवाग्रस्त बेटे की देखभाल का जिम्मा भी सौंपा गया था, जो पूरी तरह से जीवन रक्षक उपकरण (ब्रीदिंग सपोर्ट) पर निर्भर था। 24 दिसंबर 2006 को जब रहीम कार चला रहे थे और किशोर पीछे बैठा था, तभी गलती से उसका ब्रीदिंग सपोर्ट सिस्टम हट गया, जिससे उसकी मौत हो गई। इस घटना के बाद, सऊदी अरब पहुंचने के महज 28 दिन के भीतर ही रहीम को गिरफ्तार कर लिया गया और 2011 में सऊदी की एक अदालत ने उस समय 26 वर्षीय रहीम को मौत की सजा सुना दी। ऊपरी अदालतों से भी यह सजा बरकरार रही।
34 करोड़ का चमत्कार और दुनिया भर से मिला समर्थन
लंबे समय तक कोई रास्ता न दिखने के बाद साल 2024 में रहीम की किस्मत ने अचानक करवट ली। अक्टूबर 2022 में पीड़ित परिवार मध्यस्थता के लिए राजी हुआ और एक साल बाद उन्होंने मुआवजा लेने की सहमति दे दी। मध्यस्थों ने रहीम को फांसी से बचाने के लिए 16 अप्रैल 2024 की आखिरी डेडलाइन तय की।
34 करोड़ रुपये जैसी विशाल रकम जुटाना रहीम के गरीब परिवार के लिए बिल्कुल नामुमकिन था। ऐसे में मार्च 2024 में कोझिकोड के फेरोक इलाके के लोगों ने एक एक्शन कमेटी बनाई और 'सेव अब्दुल रहीम' नाम से एक क्राउडफंडिंग प्लेटफॉर्म लॉन्च किया। देखते ही देखते सोशल मीडिया के जरिए यह मुहिम पूरी दुनिया में फैल गई। आम मजदूरों, प्रवासियों, सामाजिक संगठनों और जानी-मानी हस्तियों ने दिल खोलकर दान दिया। मशहूर कारोबारी बॉबी चेम्मनूर ने भी फंड जुटाने और जागरूकता फैलाने के लिए तिरुवनंतपुरम से कासरगोड तक की यात्रा की। इस सामूहिक प्रयास का नतीजा यह रहा कि महज कुछ ही हफ्तों में 34 करोड़ रुपये जमा हो गए।
परिवार का 20 साल का दर्द और इंतजार
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, रहीम का परिवार पिछले दो दशकों से हर दिन एक अनजानी दहशत में जी रहा था। उनके भाई नजीर बताते हैं, "हम सभी उनकी वापसी का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। यह हम सबके लिए एक अग्निपरीक्षा जैसा रहा है।" उन्होंने बताया कि रहीम के जेल जाने के 6 महीने बाद ही उनके पिता मोहम्मदकुट्टी का निधन हो गया था। उनकी मां फातिमा इतने सालों में सिर्फ एक बार- नवंबर 2024 में माफी मिलने के बाद ही अपने बेटे से जेल में मिल पाईं। उनके लिए राहत का एकमात्र जरिया कभी-कभार होने वाली वीडियो कॉल ही थी।
रिहाई की अंतिम कानूनी प्रक्रिया जारी
मुआवजे की रकम मिलने के बाद रहीम की मौत की सजा तो रद्द कर दी गई, लेकिन सऊदी अधिकारियों ने आदेश दिया कि उन्हें 20 साल की जेल की सजा पूरी करनी होगी। अरबी कैलेंडर के अनुसार, उनकी यह 20 साल की मियाद इसी साल 20 मई को पूरी हो चुकी है।
अभियान का समन्वय करने वाली एक्शन कमेटी के संयोजक मजीद अम्बलक्कंडी के मुताबिक, भारतीय दूतावास के अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता अशरफ वेंगाड और रहीम के पावर-ऑफ-अटॉर्नी धारक सिद्दीकी तुव्वुर सऊदी प्रशासन के साथ मिलकर जल्द से जल्द उनकी रिहाई सुनिश्चित करने में लगे हैं। उन्होंने कहा, "रहीम अपनी 20 साल की सजा पूरी कर चुके हैं। जेल प्रणाली के भीतर बची हुई कानूनी औपचारिकताएं पूरी होते ही उनकी रिहाई हकीकत बन जाएगी।"
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Amit Kumarडिजिटल पत्रकारिता की बदलती लहरों के बीच समाचारों की तह तक जाने की ललक अमित कुमार को इस क्षेत्र में खींच लाई। समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पैनी नजर रखने के साथ-साथ अमित को जटिल विषयों के गूढ़ विश्लेषण में गहरी रुचि है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के रहने वाले अमित को मीडिया जगत में एक दशक का अनुभव है। वे पिछले 4 वर्षों से लाइव हिन्दुस्तान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
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अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।
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