79.8% बड़ा या 14%? किस बात पर ओवैसी और किरेन रिजिजू में छिड़ गई जंग; मुस्लिमों के अल्पसंख्यक दर्जे पर नया संग्राम
असदुद्दीन ओवैसी ने किरेन रिजिजू को अल्पसंख्यकों के खिलाफ मंत्री कहकर संबोधित किया। ओवैसी ने गणित का सहारा लेते हुए सोशल मीडिया पर तीखा प्रहार किया और पूछा कि 79.8% बड़ा है या 14%?

भारत में अल्पसंख्यकों की परिभाषा और दर्जे को लेकर अब एक नई जुबानी जंग छिड़ गई है। इस बार विवाद के केंद्र में हैदराबाद से सांसद और AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू हैं। इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब किरेन रिजिजू ने नई दिल्ली में राज्य अल्पसंख्यक आयोगों के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए भारत में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और उनकी जनसंख्या पर बयान दिया। सम्मेलन को संबोधित करते हुए रिजिजू ने कहा कि भारत अल्पसंख्यकों के लिए सबसे सुरक्षित और समावेशी देशों में से एक है।
किरेन रिजिजू ने क्या कहा
इस कार्यक्रम में रिजिजू ने तर्क दिया कि भारत सभी अल्पसंख्यक समुदायों को समान सुरक्षा प्रदान करता है, चाहे उनकी आबादी का आकार कुछ भी हो। उन्होंने कहा कि भारत अल्पसंख्यकों के लिए दुनिया के सबसे सुरक्षित और समावेशी देशों में से एक है। उन्होंने एक दिलचस्प तुलना करते हुए कहा, “यदि हम मुस्लिम आबादी को एक अलग देश के रूप में देखें, तो यह दुनिया का छठा सबसे बड़ा देश बन जाएगा।”
उन्होंने पारसी समुदाय का उदाहरण देते हुए कहा कि लगभग 53,000 की आबादी वाला यह छोटा समुदाय भी देश में उतना ही सुरक्षित है जितने कि मुस्लिम। रिजिजू ने यह भी दावा किया कि भारत में हर धर्म फला-फूला है, लेकिन प्रतिशत के मामले में केवल हिंदुओं और पारसियों की आबादी कम हुई है। उन्होंने कांग्रेस पर भी निशाना साधते हुए उसे "मुस्लिम लीग पार्टी" करार दिया।
‘79.8% बड़ा या 14%?’ ओवैसी का पलटवार
किरेन रिजिजू के बयानों पर असदुद्दीन ओवैसी ने कड़ी आपत्ति जताई है और रिजिजू को "अल्पसंख्यकों के खिलाफ मंत्री" (Minister Against Minorities) कहकर संबोधित किया। ओवैसी ने गणित का सहारा लेते हुए सोशल मीडिया पर तीखा प्रहार किया और पूछा, “किरेन रिजिजू के लिए एक सरल गणित का सवाल है, 79.8% बड़ा है या 14%?”
ओवैसी ने तर्क दिया कि अगर हिंदू बहुसंख्यक समुदाय हैं, तो हर गैर-हिंदू समूह संवैधानिक रूप से अल्पसंख्यक है। उन्होंने आरोप लगाया कि मंत्री अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यकों को मिलने वाले मौलिक अधिकारों को छीनने के लिए "दुष्प्रचार" कर रहे हैं। उन्होंने एक और उदाहरण देते हुए कहा कि अगर मंत्री के तर्क को मान लिया जाए, तो गैर-हिंदी राज्यों में हिंदी भाषियों को भी अल्पसंख्यक नहीं माना जा सकेगा, क्योंकि उनकी कुल आबादी कनाडा और अमेरिका की संयुक्त आबादी से भी अधिक है।
संवैधानिक अधिकारों पर फिर गरमाई बहस
इस राजनीतिक टकराव ने एक बार फिर संविधान के अनुच्छेद 30 पर बहस को केंद्र में ला दिया है, जो अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार देता है। अल्पसंख्यकों की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर होनी चाहिए या राज्य स्तर पर, यह मुद्दा लंबे समय से कानूनी और राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना हुआ है। यह विवाद पहले भी सोशल मीडिया (X) पर प्री-मैट्रिक स्कॉलरशिप और अन्य योजनाओं को लेकर आमने-सामने आ चुका है।
ओवैसी ने केंद्र सरकार की आलोचना की कि उसने प्री-मैट्रिक स्कॉलरशिप को केवल कक्षा 9 और 10 तक सीमित कर दिया है, जबकि मुस्लिम छात्रों में स्कूल छोड़ने (ड्रॉपआउट) की समस्या कक्षा 5 से ही शुरू हो जाती है। उन्होंने मौलाना आज़ाद नेशनल फैलोशिप (MANF) को बंद करने और अल्पसंख्यक मंत्रालय का बजट घटाने पर भी सरकार को घेरा।
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लेखक के बारे में
Pramod Praveenप्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।
अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।


