20 रुपये की घूस पर 30 साल चली कानूनी-अदालती जंग, सुप्रीम कोर्ट ने अब क्या कहा?

लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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बेंच ने यह भी देखा कि छात्र ने इनकम सर्टिफिकेट मिलने के बाद ही चपरासी को 20 रुपये दिए थे। कोर्ट ने पाया कि हालात अभियोजन पक्ष द्वारा बताई गई घटना की कहानी पर गंभीर संदेह पैदा करते हैं।

20 rupees bribe case
सुप्रीम कोर्ट ने 30 साल पुराने मामले को बंद कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने आज (बुधवार, 19 अगस्त को) गुजरात सरकार के उन दो कर्मचारियों की सजा को रद्द करते हुए उन्हें बड़ी राहत दी है, जिन पर आज से 30 साल पहले 20 रुपये की रिश्वत लेने के आरोप लगे थे। इसके साथ ही करीब तीन दशक तक चली यह लंबी कानूनी और अदालती लड़ाई अब खत्म हो गई है। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने इस पुराने मामले में एक क्लर्क और एक चपरासी को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ 20 रुपये बरामद होने के आधार पर सजा बरकरार नहीं रखी जा सकती, जब तक यह साबित न हो जाए कि उन्होंने रिश्वत की मांग की थी।

यह मामला फरवरी 1996 का है। एक छात्र शैक्षिक रियायतें पाने के लिए इनकम सर्टिफिकेट (आय प्रमाण पत्र) लेने गुजरात के आनंद जिले के बेचरी ग्राम पंचायत कार्यालय गया था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि क्लर्क ने सर्टिफिकेट जारी करने के लिए उस छात्र से तब 120 रुपये की मांग की थी। इसमें 100 रुपये अपने लिए और 20 रुपये चपरासी के लिए। इसके बाद, छात्र ने एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) में शिकायत दर्ज कराई। ACB ने जाल बिछाया और छात्र को 120 रुपये के निशान लगे नोट देकर वहां भेज दिया।

20 रुपये देते ही ACB ने दबोच लिया

NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, सर्टिफिकेट मिलने के बाद, छात्र ने चपरासी को जैसे ही 20 रुपये दिए। ACB की टीम ने चपरासी से वही नोट बरामद कर लिए, लेकिन क्लर्क के पास 100 रुपये नहीं मिले। सुप्रीम कोर्ट को अभियोजन पक्ष के दावों में भी विसंगतियां मिलीं। कोर्ट ने गौर किया कि छात्र ने एक अलग मामले में कथित मांग के बारे में अलग बयान दिया था। उस मामले में, उसने कहा था कि आरोपियों ने शुरू में 200 रुपये की मांग की थी और बाद में 120 रुपये पर समझौता हुआ था। यह दावा ट्रायल कोर्ट के सामने उसकी गवाही का हिस्सा नहीं था।

जिरह के दौरान मिली विसंगतियां

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को भी अहम माना कि ACB ने छात्र को निर्देश दिया था कि अगर मांग की जाए तो पूरे 120 रुपये दे दे। इसके बावजूद, उसने चपरासी को सिर्फ़ 20 रुपये ही दिए थे। इस पर एक संदेह यह भी पैदा हुआ कि जब चपरासी को कथित 20 रुपये की रिश्वत दी गई, तब क्लर्क चपरासी के ठीक बगल में था, फिर भी बाकी रकम क्यों नहीं दी गई। क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) के दौरान, छात्र ने यह भी माना कि चपरासी ने खुद उससे किसी रिश्वत की मांग नहीं की थी।

संदेह का दिया लाभ

बेंच ने यह भी देखा कि छात्र ने इनकम सर्टिफिकेट मिलने के बाद ही चपरासी को 20 रुपये दिए थे। कोर्ट ने पाया कि हालात अभियोजन पक्ष द्वारा बताई गई घटना की कहानी पर गंभीर संदेह पैदा करते हैं। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 20 के तहत कानूनी अनुमान के मुद्दे का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि चूंकि शुरुआती मांग ही साबित नहीं हुई, इसलिए चपरासी से सिर्फ़ 20 रुपये बरामद होने से अभियोजन पक्ष का मामला साबित नहीं होता।

कोर्ट ने चपरासी के इस दावे को भी ज़्यादा उचित माना कि छात्र ने उसे 20 रुपये इसलिए दिए थे क्योंकि अगले दिन ईद थी। कोर्ट ने यह भी पाया कि क्लर्क पर मुकदमा चलाने की मंज़ूरी अमान्य थी क्योंकि इसे एक अनाधिकृत अधिकारी ने दिया था। आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और गुजरात हाई कोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया और दोनों आरोपियों को बरी कर दिया।

Pramod Praveen

लेखक के बारे में

Pramod Praveen

प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।

अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।

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