3 सुन्नी देशों को पड़ी इस्लामिक नाटो बनाने की जरूरत? क्या हो भारत का अगला कदम
इस्लामिक नाटो इन दिनों चर्चा में है। दुनिया में इससे पहले भी कई गठजोड़ बने हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस नए गठजोड़ से अरब देशों या दुनिया का भला होगा? भारत को क्या करना चाहिए?
दुनिया जब शांति के बजाय संघर्ष की ओर बढ़ने लगती है, तब विकास के बजाय सुरक्षा के लिए नए-नए ब्लॉक या गठजोड़ बनने लगते हैं। ऐसा ही एक ब्लॉक बीते दिनों सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान द्वारा बनाया गया है। ऐसा नहीं है कि यह कोई अनोखा संगठन है, जो भूतो न भविष्यति का सार समेटे हुए दुनिया में प्रकट हुआ है। इससे पहले भी इससे कई गुना अधिक ताकतवर संगठन बने और आगे भी बनते रहेंगे। हालांकि ध्यान देने वाली बात यह है कि तीनों देश इस्लामी सुन्नी हैं, रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर मक्का में किए गए और दिन भी शुक्रवार चुना गया। तो क्या यह मान लिया जाए कि यह एक इस्लामी रक्षा संगठन है, जिसमें एक देश परमाणु शक्ति के साथ-साथ आतंकवाद को पनाह देने के लिए जाना जाता है। दूसरा (तुर्किये) एक उभरते कट्टरपंथी राष्ट्र के रूप में और तीसरा (सऊदी अरब) आर्थिक रूप से बहुत मजबूत है तथा अपना चेहरा बदलने की कोशिश कर रहा है।
नए गठजोड़ को कैसे देखें ?
सवाल उठता है कि क्या इस संगठन को एक विशुद्ध इस्लामी रक्षा संगठन के रूप में देखा जाए? एक औपचारिक रक्षा संगठन के रूप में देखा जाए या किसी और नजरिए से देखा जाए? यह गठजोड़ कई विरोधाभासों को समेटे हुए है। नया गठजोड़ उन संगठनों या ब्लॉक्स से कैसे तालमेल बिठाएगा, जो वैश्विक प्रगति और रक्षा को एक साथ आगे बढ़ाना चाहते हैं, जैसे-शंघाई सहयोग संगठन, ब्रिक्स, जी-20 इत्यादि। सवाल यह भी है कि खाड़ी के संगठनों जीसीसी, ओआईसी के साथ उपजने वाले अंतर्विरोधों को यह नया गठजोड़ कैसे सुलझाएगा? क्या यह रक्षा समझौता केवल क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग को और गहरा करने तक सीमित रहेगा या फिर इसके विशेष उद्देश्य हैं?
तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच यह समझौता ऐसे समय हुआ है, जब रियाद को यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों की ओर से बढ़ते खतरे का सामना करना पड़ रहा है। हूतियों ने लाल सागर में तेल टैंकरों पर हमले किए हैं और मिसाइलों तथा ड्रोन के जरिए सऊदी अरब के ऊर्जा बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया है। चूंकि सऊदी अरब अमेरिकी छतरी के अधीन है, इसलिए यदि सऊदी इससे निकलकर एक नई छतरी का निर्माण कर रहा है, तो इसे क्या माना जाए?
सफाई दे रहे तीनों देश
अहम बात यह है कि तीनों देश बयान के बजाय सफाई देते हुए नजर आ रहे हैं कि यह समझौता किसी सैन्य धुरी या किसी सांप्रदायिक गुट की स्थापना का प्रयास नहीं है। इसकी प्रकृति पूरी तरह रक्षात्मक है। इसका लक्ष्य किसी विशिष्ट पक्ष को निशाना बनाना नहीं है।
फिर भी कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता उस पारस्परिक रक्षा समझौते के समान है, जिस पर सऊदी अरब और परमाणु शक्ति सम्पन्न पाकिस्तान ने पिछले सितंबर में सहमति जताई थी। इसी समझौते के तहत अप्रैल में पाकिस्तान ने सऊदी अरब के एक सैन्य अड्डे पर लड़ाकू विमानों और उनके चालक दल के स्क्वाड्रन के साथ-साथ चीन में निर्मित एचक्यू-9 वायु रक्षा प्रणाली भी तैनात की थी, ताकि ईरानी हमलों से बचाव किया जा सके।
पाकिस्तान पर कोई कैसे करे भरोसा?
पाकिस्तान वही देश है, जिसने शीत युद्ध के दौरान अमेरिका के साथ सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन और साउथ एशिया ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन में शामिल होकर भारत की सीमा तक शीतयुद्ध को पहुंचा दिया था। अहम बात यह है कि सीटो के अनुच्छेद चार में पारस्परिक रक्षा का प्रावधान था। फिर तो पाकिस्तान अमेरिकी गोद में रक्षा प्रसाद पा ही रहा था। ऐसे में, इस गठबंधन की जरूरत क्यों आन पड़ी?
ऐसा तो नहीं है कि पाकिस्तान अपनी रक्षा पंक्ति को और मजबूत करने के लिए सऊदी पूंजी और तुर्किये की आधुनिक रक्षा क्षमता के साथ त्रिकोण बनाकर भारत की सीमा पर एक कड़ी चुनौती पेश करना चाहता है? हालांकि, सऊदी अरब के साथ भारत के अच्छे आर्थिक रिश्ते हैं, लेकिन उसके द्वारा पिछले ग्यारह महीनों के भीतर संधि के जरिए अपनी सुरक्षा को पाकिस्तान की सुरक्षा से जोड़ देना, आखिर क्या दर्शाता है?
इधर तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप्प एर्दोगन ने भले ही यह बयान दिया हो कि इस समझौते का मकसद किसी देश को निशाना बनाना नहीं है, लेकिन दुनिया जानती है, तुर्किये पाकिस्तान के साथ खड़ा है। पाकिस्तान आतंकवाद को पनाह देने वाला राष्ट्र है और उसी के जरिए भारत से प्रॉक्सी युद्ध लड़ रहा है। ऑपरेशन सिंदूर में हम तुर्किये का पाकिस्तान से जुड़ाव देख चुके हैं। ऐसे में, सऊदी अरब की वित्तीय ताकत, पाकिस्तान की परमाणु ताकत और तुर्किये का सैन्य अनुभव क्या रक्षा चुनौती पेश नहीं करेंगे? वे भले ढिंढोरा पीटें कि ये समझौता संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के मुताबिक है, जिसमें आत्मरक्षा का अधिकार शामिल है। दुनिया जानती है, संयुक्त राष्ट्र आज स्वयं अप्रासंगिक हो चुका है। इसलिए इस गठजोड़ को केवल मध्य-पूर्व तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए।
मिनीलैटरल सिक्योरिटी ग्रुप्स का दौर
आज के दौर में मिनीलैटरल सिक्योरिटी ग्रुप्स का निर्माण तेजी से हो रहा है और यह नई जियोपॉलिटिक्स की विशेषता मानी जा सकती है, जैसे-क्वाड और आकुस। क्वाड में भारत के साथ अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जुड़े हैं, लेकिन यह सही अर्थों में कोई संगठन नहीं है, बल्कि डायलॉग है, जिसके दस्तावेज पर सभी सदस्यों के एक साथ हस्ताक्षर भी नहीं हुए हैं। फिर भी अमेरिका ने इसका प्रचार चीन को घेरने वाले ब्लॉक के रूप में किया है। फिलहाल अभी तक इसने ऐसे कोई भी कदम नहीं उठाए हैं, जिनके आधार पर इसे भविष्य का ऐसा विशिष्ट रक्षा ढांचा माना जा सके, जो इण्डो-पेसिफिक की सुरक्षा के मोर्चे पर कारगर हो। वैसे, भारत ने भी पश्चिम एशिया में आई2यू2 (इंडिया, इजरायल, यूएई और अमेरिका) बना रखा है, जो आर्थिक, रणनीतिक और प्रौद्योगिकीय सहयोग संबंधी संगठन है। ऐसे गठजोड़ शायद मजबूरी बनते जा रहे हैं।
लगातार बनते गठजोड़
यह माना जाता है कि ऐसे गठजोड़ बनाने या बनवाने में अमेरिका सबसे आगे है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड फाइव आइज जैसी डिफेंस ट्रीटी से बंधे हुए हैं। इसी क्षेत्र में अमेरिका-जापान-दक्षिण कोरिया त्रिकोण, अमेरिका-जापान-फिलीपींस त्रिकोण, अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया-जापान रणनीतिक सहयोग आदि पहले से मौजूद हैं। साफ है कि रक्षा ब्लॉक या सहयोगों का अतिरेक इण्डो-पेसिफिक में बड़े पैमाने पर देखने को मिलता है, लेकिन चीन की एक घुड़की सबको दुबक कर खड़े होने पर विवश कर देती है। फिर इन सहयोगों या गठजोड़ों या संगठनों का वास्तविक प्रयोजन क्या है? रक्षा बाजार या अमेरिका की रक्षा छतरी के सहारे आगे बढ़ने की रणनीति?
अब मध्य-पूर्व को देखें, जहां एक तरफ गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) है, जिसमें सऊदी अरब सहित 6 देश शामिल हैं। यह खाड़ी क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय समूह है। इसके भीतर सऊदी-संयुक्त अरब अमीरात-कतर की अलग रणनीतिक साझेदारी है। फिर 22 अरब राष्ट्रों का एक अरब लीग है, अरब राज्यों का व्यापक राजनीतिक मंच है। इसके अतिरिक्त 57 मुस्लिम देशों का एक व्यापक राजनीतिक समूह ओआईसी है। ऐसे में, देखना यह चाहिए कि गठजोड़ों का परस्पर घालमेल भी हो रहा है। क्या ऐसे घालमेल के बावजूद ये गठजोड़ कारगर हो पाएंगे? क्या ये गठजोड़ अंतरविरोधों के चलते अपने-अपने शीर्षकों तक ही सीमित रह जाएंगे?
क्या करे भारत?
सच यह है कि अमेरिकी सैन्य नेतृत्व को भी युद्ध में दबाव का सामना करना पड़ रहा है। इसका मतलब, अमेरिका भी अब असीमित सुरक्षा संसाधनों वाला देश नहीं रहा। जब महाशक्ति की क्षमता सीमित दिखाई देने लगती है, तब क्षेत्रीय शक्तियां विकल्प तलाशने लगती हैं। ऐसे में भारत को यह समझना होगा कि 21वीं सदी की शक्ति केवल सैनिकों की संख्या से तय नहीं होगी। आज जरूरी है कि भारत किसी एक तरफ न देखे, बल्कि मल्टी-एलाइनमेंट की अपनी नीति को और मजबूत बनाए।


