बंगाल में न्यायिक समीक्षा के बाद वोटर लिस्ट से कटे 27 लाख नाम, मुस्लिम-मतुआ इलाकों से सबसे अधिक
चुनाव आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि 29 अप्रैल को होने वाले दूसरे चरण के 142 सीटों के लिए वोटर लिस्ट अब फ्रीज कर दी गई हैं। इसका अर्थ यह है कि अब चुनाव समाप्त होने तक इन सूचियों में कोई नया नाम नहीं जोड़ा जा सकेगा और न ही कोई सुधार होगा।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (West Bengal Elections 2026) के लिए वोटिंग से पहले चुनाव आयोग के एक ताजा आंकड़े ने राज्य की सियासत में हलचल मचा दी है। गुरुवार को जारी चुनाव आयोग के डेटा के अनुसार, एसआईआर के बाद हुई न्यायिक समीक्षा के बाद मतदाता सूची से करीब 27 लाख नाम हटा दिए गए हैं। इस बड़े बदलाव के बाद अब बंगाल में कुल मतदाताओं की संख्या 6.7 करोड़ रह गई है। इस छंटनी का सबसे गहरा असर मुस्लिम बहुल जिलों और मतुआ समुदायों के प्रभाव वाले क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है, जबकि आदिवासी बहुल बेल्ट में मतदाताओं की संख्या में नाममात्र की कमी आई है।
मुर्शिदाबाद और मालदा सबसे बड़ा हॉटस्पॉट
टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि मुर्शिदाबाद जिले के शमशेरगंज और लालगोला विधानसभा सीट पर सबसे अधिक मतदाताओं के नाम काटे गए हैं। शमशेरगंज में कुल 1,08,400 नाम न्यायिक जांच के दायरे में थे, जिनमें से रिकॉर्ड 74,775 नाम हटा दिए गए। इसी तरह लालगोला में 99,082 नामों में से 55,420 मतदाताओं को सूची से बाहर कर दिया गया है।
मालदा जिले का मोथाबाड़ी का भी यही हाल है। यहां जांच के दायरे में आए 79,683 नामों में से 37,000 से अधिक नाम हटाए गए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि शमशेरगंज और मोथाबाड़ी जैसे इलाके हाल के दिनों में वक्फ (संशोधन) अधिनियम के विरोध और रामनवमी के दौरान हुई झड़पों के कारण पहले से ही संवेदनशील बने हुए हैं। मोथाबाड़ी में तो मतदाता सूची से नाम कटने पर हिंसक प्रदर्शन भी देखे गए, जहां उग्र भीड़ ने न्यायिक अधिकारियों का घेराव तक कर लिया था।
मतुआ बहुल क्षेत्रों में भी भारी कमी
उत्तर 24 परगना और नदिया जिलों के मतुआ बहुल क्षेत्रों में भी मतदाता सूची पर कैंची चली है। बनगांव की सभी छह विधानसभा सीटों पर यह छंटनी 67% से 88% के बीच रही है। वहीं कृष्णानगर और रानाघाट की सीटों पर तो स्थिति और भी चौंकाने वाली है, जहां जांच के लिए रखे गए नामों में से 90% से अधिक को मतदाता सूची में शामिल होने के योग्य नहीं माना गया।
ऑल इंडिया मतुआ महासंघ के सचिव सुकेश चौधरी ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा है कि इस तरह के बड़े पैमाने पर बहिष्कार से समुदाय के भीतर असुरक्षा और घबराहट का माहौल है। हालांकि, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा कानूनी सहायता के आश्वासन से उन्हें कुछ उम्मीद जरूर बंधी है।
आदिवासी बेल्ट और हाई-प्रोफाइल सीटों का हाल
एक तरफ जहां सीमावर्ती और मुस्लिम बहुल इलाकों में भारी कटौती हुई है, वहीं पुरुलिया और झाड़ग्राम के आदिवासी क्षेत्रों में स्थिति इसके बिल्कुल उलट है। पुरुलिया के ओन्डा में केवल 1% नाम काटे गए, जबकि मानबाजार में 2,771 नामों में से केवल 71 नाम ही हटाए गए। यह आंकड़ा राज्य के औसत से काफी कम है।
अगर हाई-प्रोफाइल सीटों की बात करें, तो कोलकाता की भवानीपुर और पूर्वी मेदिनीपुर की नंदीग्राम सीट पर राज्य के औसत से कम प्रभाव पड़ा है। भवानीपुर में 14,154 संदिग्ध नामों में से सिर्फ 3,893 (27.5%) हटाए गए। वहीं, नंदीग्राम में 10,616 नामों में से 3,461 (32.6%) को बाहर किया गया।
जैसे ही चुनाव आयोग के आंकड़े सार्वजनिक हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार और आयोग पर हमला बोल दिया है। उन्होंने इसे टारगेटेड एक्सक्लूजन करार देते हुए आरोप लगाया कि एक खास रणनीति के तहत उनके समर्थकों और विशेष समुदायों के नाम हटाए जा रहे हैं।
दूसरी ओर, भाजपा के स्थानीय नेताओं का कहना है कि यह एक न्यायिक प्रक्रिया है और जिनका नाम गलती से कटा है उन्हें ट्रिब्यूनल जाने में मदद की जाएगी। भाजपा के बिकाश घोष ने कहा कि प्रभावित मतदाताओं को उनके नाम बहाल करने के लिए कानूनी सहायता दी जाएगी।
चुनाव आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि 29 अप्रैल को होने वाले दूसरे चरण के 142 सीटों के लिए वोटर लिस्ट अब फ्रीज कर दी गई हैं। इसका अर्थ यह है कि अब चुनाव समाप्त होने तक इन सूचियों में कोई नया नाम नहीं जोड़ा जा सकेगा और न ही कोई सुधार होगा। पहले चरण के 152 क्षेत्रों के लिए सूचियां 6 अप्रैल को ही सील कर दी गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट पर टिकी निगाहें
जिन 27 लाख लोगों के नाम सूची से हटाए गए हैं, उनके पास अब केवल कानूनी रास्ता ही बचा है। पश्चिम बंगाल सरकार ने इस छंटनी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है। 13 अप्रैल को होने वाली सुनवाई इन लाखों लोगों के लिए भविष्य का फैसला करेगी। यदि अदालत से कोई राहत नहीं मिलती, तो ये 27 लाख लोग इस बार लोकतंत्र के इस महापर्व में अपनी भागीदारी सुनिश्चित नहीं कर पाएंगे।
लेखक के बारे में
Himanshu Jhaबिहार के दरभंगा जिले से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु शेखर झा डिजिटल मीडिया जगत का एक जाना-माना नाम हैं। विज्ञान पृष्ठभूमि से होने के बावजूद (BCA और MCA), पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून के कारण उन्होंने IGNOU से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया और मीडिया को ही अपना कर्मक्षेत्र चुना।
एक दशक से भी अधिक समय का अनुभव रखने वाले हिमांशु ने देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों जैसे दैनिक भास्कर, न्यूज़-18 और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दी हैं। वर्तमान में, वे वर्ष 2019 से लाइव हिन्दुस्तान के साथ जुड़े हुए हैं।
हिमांशु की पहचान विशेष रूप से राजनीति के विश्लेषक के तौर पर होती है। उन्हें बिहार की क्षेत्रीय राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति की गहरी और बारीक समझ है। एक पत्रकार के रूप में उन्होंने 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों और कई विधानसभा चुनावों को बेहद करीब से कवर किया है, जो उनके वृहद अनुभव और राजनीतिक दृष्टि को दर्शाता है।
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