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नंदनकहानी वाशिंग मशीन की

अनिल जायसवाल,नई दिल्लीPublished By: Anil Kumar
Sat, 04 Jul 2020 12:29 PM
कहानी वाशिंग मशीन की

“मम्मी, अब मैं कैसे स्कूल जाऊं, मेरी तो ड्रेस ही साफ नहीं है।” कहते हुए शालू की आंखें शरारत से चमक उठीं। आज क्लास टेस्ट था और वह उसे मिस करना चाहती थी।
“कोई बात नहीं, तुम फ्रेस हो लो। मैं ड्रैस देखती हूं।”  कहते हुए मम्मी मुसकरा उठीं।  
शालू तो बाथरूम में घुस गई, पर बीस मिनट बाद वह नहाकर बाहर आई, तो मम्मी के हाथों में चमचमाती स्कूल ड्रैस देखकर चकित रह गई। फिर उसकी निगाह कोने में रखी वाशिंग मशीन पर गई। 
“पता नहीं किस बदमाश ने वाशिंग मशीन बनाई? वह बच्चों को बिल्कुल प्यार नहीं करता होगा।” भुनभुनाते हुए शालू तैयार होने लगी।
“बेटी तुम्हें मालूम नहीं। वाशिंग मशीन के आविष्कार की कहानी भी बड़ी मजेदार है। सबसे पहले कपड़े धोने के लिए मशीन बनने का उल्लेख 1691 में मिलता है। इंग्लैंड में किसी ने अपनी मशीन को पेटेंट कराने के लिए आवेदन किया था। पर 1782 में पहली बार हेनरी सिडजियर को घूमने वाले ड्रम वाशर का पेटेंट दिया गया था। 1797 में ही पहली बार अमेरिका में नथानिएल ब्रिग्स को एक पेटेंट मिला, जिसका नाम था ‘कलोद्स वाशिंग’।  
1906 में पहली बार बिजली से चलने वाली वाशिंग मशीन का आविष्कार हुआ। पर इसे बनाया किसने, कोई नहीं जानता। हां इसका पेटेंट ए. जे. फिशर के नाम कर दिया गया, जो बाद में गलत सिद्ध हुआ। अमेरिकी पेटेंट ऑफिस के रिकार्ड से पता चलता है कि फिशर से पहले कोई व्यक्ति वाशिंग मशीन के पेटेंट के लिए आवेदन कर चुका था।
 पर जिसको भी इसका श्रेय मिले, एक औरत  होने के नाते मैं कह सकती हूं कि औरतों की मदद के लिए बनी यह सबसे बढि़या चीज है।”
“वह कैसे?”- शालू ने जिज्ञासा से पूछा।
“बेटी, एक वक्त था, औरत का सबसे ज्यादा समय खाना बनाने और कपड़े धोने में बर्बाद होता था। कपड़े घर पर न धुलकर नदी-तालाबों में धोए जाते थे।” इसके लिए पता नहीं औरतें कितनी दूर तक जातीं और आती थीं। पहाड़ी गांवों में तो हर साल सैकड़ों औरतें नदी तक जाने और आने में अपनी जान गवां बैठती थीं। फिर कपड़ों को हाथ से रगड़कर धोना। साबुन में कास्टिक ज्यादा हो, तो हाथ तक कट जाते थे। फिर उन कपड़ों को सुखाना और घर तक लाना, किसी यातना से कम नहीं लगता था।
पर जब से वाशिंग मशीन का आविष्कार हुआ है, यह सब कितना आसान हो गया है। इधर कपड़े डालो और आधे घंटे में उन्हें धोना शुरू कर दो। ऑटोमैटिक मशीन में तो कुछ भी करने की जरूरत नहीं पड़ती।  बस पानी में डिटरजेंट के साथ कपड़े डालो और तय समय में कपड़े धुलकर और सूखकर बाहर आ जाते हैं।
और हाल ही में ऐसी वाशिंग मशीन भी बन चुकी है, जो कपड़े धोने वाले को बताती चलती है कि अब आगे क्या करना है। कपड़े धोने में कम समय लगने से हम औरतों का बहुत समय बचता है, जो हम घर में अपने बच्चों पर खर्च करते हैं।” कहते हुए शालू की मम्मी ने उसे अपने से चिपटा लिया। 
सालू भी मां का प्यार पाकर मुसकरा उठी और जल्दी जल्दी स्कूल के लिए तैयार होने लगी।

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