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मदद : विकलांगता के खिलाफ वीर की लड़ाई

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पांच साल की उम्र में एक कार दुर्घटना में वीर अग्रवाल के पैर में फ्रैक्चर हो गया था। तीन महीने तक उसे बिस्तर पर रहना पड़ा था। इलाज के दौरान उसे काफी दर्द का सामना करना पड़ा। लेकिन वह अब शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को अपने पैरों पर खड़े होने में मदद कर रहा है और वह भी मुफ्त में। 


तुम बच्चों में से ज्यादातर डॉक्टर,इंजीनियर या एक अंतरिक्ष यात्री बनाना चाहते होंगे। मगर मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कॉॅम्प्लेक्स के अमेरिकन स्कूल ऑफ बॉम्बे में पढ़ने वाले नौवीं कक्षा के छात्र वीर अग्रवाल पढ़ाई के साथ-साथ विकलांगों की बेहतरी के लिए भी काम कर रहे हैं। कुछ महीने पहले एक खबर आई थी कि 14 वर्ष के एक लड़के ने ऑनलाइन क्राउड फंडिंग प्लेटफॉर्म के जरिए 14 लाख रुपये जुटाए हैं और इन पैसों से वह आर्थिक रूप से कमजोर विकलांगों के लिए कृत्रिम पैर और व्हीलचेयर मुहैया करा रहा है, तो सभी काफी हैरान हुए थे। आज वीर के प्रयासों की बदौलत ही आर्थिक रूप से वंचित 300 विकलांग अब फिर से चल पा रहे हैं। वीर ने साबित किया कि यदि हम पर्याप्त रूप से दृढ़ हैं, तो कोई भी सपना या महत्वाकांक्षा हमारी पहुंच से बाहर नहीं है। 


कहां से मिली प्रेरणा
कहते हैं न, हर घटना के पीछे कोई-न-कोई कहानी होती है। एक दर्दनाक कहानी वीर से भी जुड़ी है। जब वीर पांच साल के थे, तो एक सड़क दुर्घटना में उनकी जांघ की हड्डी बुरी तरह से फैक्चर हो गयी थी, जिससे उन्हें तीन महीने से अधिक समय तक बिस्तर पर रहना पड़ा। उनकी जांघ में एक धातु की छड़ डाली जानी थी, जो काफी दर्दनाक स्थिति थी। वीर कहते हैं, ‘आज भी जब मैं अपने शरीर के निशान को देखता हूं तो मैं सिहर जाता हूं। बचपन का वो दर्द कुछ समय के लिए था, लेकिन शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को देखता हूं तो उनका दर्द मुझे ज्यादा बड़ा लगता है। मुझे मेरे दर्द ने ही इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। मैंने उस स्थिति का गंभीरता से शोध किया, जिसका सामना विकलांग लोगों को करना पड़ता था। 


वीर कहते हैं, ‘जब मैंने पहली बार क्राउड फंडिंग के लिए vheltowalk.org  पर एक अपील पोस्ट की थी, तो एक महीने के भीतर ही 16 डोनर मिल गए। एक बार राशि एकत्र होने के बाद सबसे पहले मैंने महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में काम करने वाली एक चैरिटेबल संस्था से संपर्क किया, जो ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही है। इस संस्था व अपने माता-पिता की मदद से एक शिविर का आयोजन किया गया, जहां से मुझे विकलांगों की जानकारी मिली। जब मैंने जयपुर फुट के बारे में जाना, तो वहां भी गया और वहीं से मुझे आगे बढ़ने का रास्ता मिल गया। यहीं पर विकलांगों को कृत्रिम अंग मुहैया करवाता हूं।’ अब तो वीर के लिए, जरूरतमंदों, विशेष रूप से विकलांगों की मदद करना ही मुख्य उद्देश्य बन चुका है। 

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  • Web Title:story of a child and Disability