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27 मई, 2020|2:33|IST

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गज्जू की वापसी

‘मेरी मां भी न! पता नहीं क्यों ऐसा करती हैं? खुद तो कभी स्कूल गईं नहीं और चाहती हैं कि मैं पढ़-लिखकर बड़ा जानवर बनूं।... अरे भई! मैं तो पैदाइशी ही बड़ा हूं। और कितना बड़ा बनूंगा?’ गज्जू हाथी सोचते-सोचते जंगल से बाहर जाने वाले रास्ते पर बढ़ा चला जा रहा था। तभी अचानक तेज शोर से उसका ध्यान टूटा, तो उसने अपने आप को बहुत से बच्चों से घिरा हुआ पाया। 
गज्जू शायद जंगल को पार करके किसी शहर में घुस आया था। उसने घबराकर  इधर-उधर देखा, तो अपने आप को एक दर्जी की दुकान के सामने खड़ा पाया। दर्जी को देखते ही डर के मारे उसकी घिग्घी बंध गई। उसे मां की सुनाई वह कहानी याद आ गई, जिसमें एक दर्जी मजाक-मजाक में हाथी की सूंड़ में सूई चुभो देता है। गज्जू ने घबराकर अपनी सूंड़ को ऊपर की तरफ उठा लिया। उसकी यह हरकत देखकर बच्चे जोर-जोर से तालियां बजाने लगे। अब तो गज्जू की हालत और भी ज्यादा खराब हो गई। वह डर के मारे भागने लगा।
थोड़ी देर पहले अपने जिस बड़े शरीर को लेकर गज्जू खुद पर घमंड कर रहा था, वही अब उसके लिए मुसीबत बन गया था। वह चिड़िया-कबूतर होता, तो पत्तों में छिप जाता। चूहा-खरगोश होता, तो किसी बिल में घुस जाता, मगर इस विशालकाय शरीर को लेकर कहां जाता वह? भारी शरीर के कारण उससे भागा भी नहीं जा रहा था।  
तभी उसे सामने एक बाड़ा दिखाई दिया। गज्जू ने उसका दरवाजा धकेलकर खोला और भीतर घुसकर उसे वापस बंद कर दिया। अब बच्चे दरवाजे की दूसरी तरफ थे। थोड़ी ही देर में रात हो गई और बच्चों का शोर बंद हो गया, तो गज्जू ने भी चैन की सांस ली। अब उसे मां की याद आ रही थी और भूख भी बहुत जोर से लगी थी।
रोते-रोते गज्जू सो गया। सुबह जब उसकी आंखें खुलीं, तो अपने सामने केलों का ढेर देखकर वह खुश हो गया। उसने इधर-उधर देखा, कोई नहीं था। फिर क्या था! गज्जू ने जी भरकर केले खाए।
‘घर से बाहर रहना इतना भी बुरा नहीं है। मां तो जब देखो, तब गन्ने थमा दिया करती थीं। और ये केले! बस, गप से खा लो।’ सोचते हुए गज्जू को अब जंगल से भागने के अपने फैसले पर ज्यादा अफसोस नहीं हो रहा था। 
तभी गज्जू को एक मूंछों वाला आदमी आता दिखाई दिया। वह डरकर एक कोने में सिमट गया। उस आदमी ने प्यार से गज्जू की पीठ सहलाई, तो वह थोड़ा सहज हुआ। यह रामसिंह था। उसने प्यार करते-करते गज्जू के पैरों को जंजीरों के साथ मजबूत खंबे से बांध दिया। गज्जू समझ गया कि उसे बंदी बना लिया गया है।
रामसिंह कुछ दिन गज्जू के साथ प्यार से पेश आया। फिर धीरे-धीरे सख्त होता चला गया। दरअसल रामसिंह गज्जू को शहर में होने वाली आलीशान शादियों में दूल्हे की सवारी के लिए काम में लेना चाहता था। इस काम के लिए वह गज्जू को खास प्रशिक्षण देने लगा था, ताकि उसे गज्जू से अच्छी आमदनी हो सके। गज्जू को अब वापस जंगल की याद आने लगी।
आज गज्जू को खूब सजाया जा रहा था। रामसिंह उसे पहली बार शादी में लेकर जाने वाला था। गज्जू को बरात तक ले जाया गया। उसके ऊपर दूल्हे को बैठाया गया। बैंड बाजे के तेज शोर से गज्जू के कानों के परदे फटने लगे। नाचने वाली भीड़ के पैरों से उड़ती मिट्टी उसकी आंखों में गिरकर उसे और भी बेचैन कर रही थी। रामसिंह ने जब हंटर मारकर उसे आगे बढ़ने का इशारा किया, तो उसके सब्र का बांध टूट गया। गज्जू ने गुस्से में आकर जोर से चिंघाड़ मारी और दूल्हे को अपनी सूंड़ में लपेट लिया। यह दृश्य देखकर बरातियों को जैसे सांप सूंघ गया। 
मगर गज्जू जान की कीमत समझता था। उसने अपनी सूंड़ को आराम से नीचे किया और धीरे से दूल्हे को वहां खड़ी एक कार के ऊपर रख दिया। सब लोग दूल्हे की तरफ लपके। 
गज्जू को तो इसी मौके का इंतजार था। उसने आव देखा न ताव, बस एक दिशा में सरपट भागना शुरू कर दिया। आज उसके पांवों में हवा की सी तेजी आ गई थी। रामसिंह कुछ दूर तो उसके पीछे आया, मगर गज्जू का गुस्सा देखकर ठिठक गया। गज्जू तब तक भागता रहा, जब तक अचेत होकर गिर न पड़ा।
“मेरा बच्चा! कहां चला गया था तू?” मां की आवाज सुनकर गज्जू ने आंखें खोलीं, तो देखा कि उसके पापा उसे होश में लाने के लिए अपनी सूंड़ में पानी भरकर बौछार कर रहे हैं। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह सचमुच शहर के दलदल से बच निकला है।
“गज्जू! तुम्हें शहर कैसा लगा?” उसकी बहन गामिनी ने पूछा, तो गज्जू डरकर अपनी मां से लिपट गया और धीरे से शहर में टीवी पर सुना गाना दोहरा दिया, “अपने तो अपने होते हैं... बाकी सब सपने होते हैं।”
“अरे! यह तो शहर जाकर कवि बन गया। ” गामिनी ने भाई की चुटकी ली, तो सब जानवर हंस पड़े।