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9 साल में छोड़ा शाही महल,31 की उम्र में लंदन में मौत; मुश्किल में घिरे ईरान की राजकुमारी की कहानी रुला देगी

9 साल में छोड़ा शाही महल,31 की उम्र में लंदन में मौत; मुश्किल में घिरे ईरान की राजकुमारी की कहानी रुला देगी

संक्षेप:

लीला पहलवी का जन्म 27 मार्च 1970 को तेहरान के भव्य महल में हुआ था। शाह मोहम्मद रजा पहलवी और महारानी फराह की लाड़ली सबसे छोटी बेटी थीं। उनकी आंखों में बचपन की चमक थी, परिवार की गोद में वे सुरक्षित महसूस करती थीं।

Jan 14, 2026 10:20 pm ISTDevendra Kasyap लाइव हिन्दुस्तान, तेहरान
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ईरान आज फिर उथल-पुथल में है। विरोध-प्रदर्शन, सुप्रीम लीडर की सत्ता पर सवाल, अमेरिका की धमकियां और निर्वासित राजकुमार रजा पहलवी की पुकार; सब कुछ पुराने घावों को फिर से हरा कर रहा है। इन सबके बीच याद आती है एक ऐसी बेटी की, जो उस शाही परिवार की सबसे छोटी, सबसे नाजुक और सबसे मासूम थी; नाम था लीला पहलवी। एक ऐसी लड़की, जिसने बचपन में महल देखे, लेकिन जिंदगी में सिर्फ निर्वासन, अकेलापन और दर्द ही पाया।

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लीला पहलवी का जन्म 27 मार्च 1970 को तेहरान के भव्य महल में हुआ था। शाह मोहम्मद रजा पहलवी और महारानी फराह की लाड़ली सबसे छोटी बेटी थीं। उनकी आंखों में बचपन की चमक थी, परिवार की गोद में वे सुरक्षित महसूस करती थीं। दरबार की चमक-दमक, प्राइवेट टीचर, फारसी कहानियां, भाई-बहनों का प्यार... बचपन में सब कुछ था, जो हर बच्चा चाहता है, लेकिन ये खुशियां बस कुछ सालों की मेहमान थीं।

और रातों-रात ईरान से भागना पड़ा

लीला का बचपन राजमहल में बीत रहा था, तभी जनवरी 1979 आया। ईरानी सड़कों पर लोग उतर आए थे। सड़कों पर नारे गूंज रहे थे शाह मुर्दाबाद। इस क्रांति की आग ने सब कुछ लील लिया। महज 9 साल की लीला को रातों-रात परिवार के साथ भागना पड़ा। मां-बाप, भाई-बहन, सब रोते हुए, डरते हुए ईरान छोड़कर चले गए। उस छोटी सी उम्र में ही उन्होंने समझ लिया था कि अब घर नहीं रहेगा, अब वे राजकुमारी नहीं, बस एक शरणार्थी हैं।

इसके बाद शुरू हुआ शाही परिवार का अनंत सफर। कभी मिस्र, मोरक्को, बहामास, मैक्सिको, अमेरिका, पनामा। हर जगह बस थोड़े दिन। इन सबके बीच राजनीतिक दबाव, हत्या के खतरे और नई जगह की तलाश। पिता शाह कैंसर से जूझ रहे थे। 27 जुलाई 1980 को काहिरा में उनकी मौत हो गई। उस वक्त लीला सिर्फ 10 साल की थीं। पिता की मौत ने उनके दिल में एक ऐसा छेद छोड़ दिया, जो कभी नहीं भरा। वापसी की सारी उम्मीदें मर गईं।

अंदर से टूटती रहीं लीला

अमेरिका में बसने के बाद भी वे अंदर से टूटती रहीं। इस दौरान पढ़ाई अच्छी हुई। न्यूयॉर्क में यूनाइटेड नेशंस स्कूल, राय कंट्री डे स्कूल। फारसी, अंग्रेजी, फ्रेंच... सब बोलती थीं। बाहर से लगता था कि सुंदर, शाही खानदान की बेटी हैं, उन्होंने पेरिस में मॉडलिंग भी की। लेकिन अंदर से वे टूट रही थीं। क्रॉनिक फटीग, गहरा अवसाद, एनोरेक्सिया से शरीर कमजोर होता गया, आत्मा और भी। नींद की गोलियां, दवाएं... ये सब दर्द को दबाने की कोशिश थीं, लेकिन दर्द बढ़ता ही गया।

दोस्त बताते थे कि लीला अकेले रोती थीं। वे खुद को बेबस महसूस करती थीं। न ईरान में घर, न निर्वासन में सुकून। भाई रजा पहलवी राजनीति में सक्रिय रहे, लेकिन लीला चुपचाप, एकांत में जीती रहीं। ध्यान आकर्षित करने से डरती थीं, क्योंकि वो अतीत उनका अपना नहीं था, वो सिर्फ बोझ था।

10 जून 2001 को मौत

और फिर वो काला दिन आया- 10 जून 2001। लंदन का लियोनार्ड होटल। 31 साल की लीला अपने कमरे में अकेली मृत मिलीं। जांच में पता चला कि सेकोनल (एक नींद की दवा) की ओवरडोज और कोकीन के कारण मौत हुई, जिसे आत्महत्या करार दिया गया। लेकिन ये सिर्फ मौत नहीं थी, ये सालों के दर्द का अंत था। एक छोटी सी बच्ची, जो कभी घर लौट नहीं पाई, जो कभी ठीक से हंस नहीं पाई। लीला को ईरान से दूर पेरिस में दफनाया गया था। और त्रासदी यहीं नहीं रुकी। 10 साल बाद 2011 में भाई प्रिंस अली रजा ने भी आत्महत्या कर ली।

Devendra Kasyap

लेखक के बारे में

Devendra Kasyap
देवेन्द्र कश्यप, लाइव हिंदुस्तान में चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर। पटना से पत्रकारिता की शुरुआत। महुआ न्यूज, जी न्यूज, ईनाडु इंडिया, राजस्थान पत्रिका, ईटीवी भारत और नवभारत टाइम्स ऑनलाइन जैसे बड़े संस्थानों में काम किया। करीब 11 साल से डिजिटल मीडिया में कार्यरत। MCU भोपाल से पत्रकारिता की पढ़ाई। पटना व‍िश्‍वविद्यालय से पॉलिटिकल साइंस से ग्रेजुएशन। फिलहाल लाइव हिन्दुस्तान में नेशनल, इंटरनेशनल डेस्क पर सेवा दे रहे हैं। और पढ़ें

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