Explainer: एक खाड़ी... दो देश और 2 करेंसी की किस्मत; कुवैती दीनार बनाम ईरानी रियाल की असली कहानी
खाड़ी के दो पड़ोसी देश कुवैत और ईरान तेल के मामले में बहुत अमीर हैं। फिर भी आज एक के पास दुनिया की सबसे मजबूत मुद्रा है, दूसरे की मुद्रा इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है।

फारस की खाड़ी के दो पड़ोसी देश कुवैत और ईरान तेल से अमीर हैं। फिर भी उनकी मुद्राओं में दुनिया का सबसे बड़ा अंतर दिख रहा है। कुवैत का दीनार दुनिया की सबसे मजबूत मुद्राओं में है। एक कुवैती दीनार करीब 3.24 अमेरिकी डॉलर के बराबर है। वहीं ईरानी रियाल खुले बाजार में इतनी गिर चुकी है कि एक डॉलर के लिए करीब 22 लाख रियाल देने पड़ रहे हैं। यानी एक कुवैती दीनार लगभग 71 लाख ईरानी रियाल के बराबर हो गया है। यह फासला सिर्फ इन दो देशों तक नहीं है। बहरीन, ओमान और जॉर्डन की मुद्राएं भी ईरानी रियाल से कहीं ज्यादा मजबूत हैं।
दोनों देश पास हैं, हकीकत दूर
कुवैत और ईरान उत्तरी खाड़ी के पानी से अलग हैं। लेकिन उनकी अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से बहुत अलग हैं। कुवैत की मुद्रा पूरी तरह नियंत्रण में है। देश के पास भारी विदेशी संपत्ति और दशकों से जमा तेल की कमाई है। ईरान पर प्रतिबंध हैं, युद्ध का दबाव है, महंगाई बहुत ज्यादा है और विश्व बाजार तक पहुंच सीमित है। पिछले एक साल में रियाल की कीमत डॉलर के मुकाबले लगभग आधी रह गई। सितंबर की शुरुआत में यह प्रति डॉलर 22 लाख रियाल से भी नीचे चली गई। खाने-पीने और जरूरी सामान की कीमतें खासतौर पर तेजी से बढ़ी हैं।
आम ईरानी की जिंदगी
तेहरान की एक छोटी दुकान में काम करने वाली 21 वर्षीय अजारी कहती हैं कि अब हर छोटी चीज का हिसाब रखना पड़ता है। न्यूज एजेंसी एएफपी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि एक चीज खरीदने के लिए दूसरी चीज छोड़नी पड़ती है। अगर एक दिन टैक्सी ऐप चलाऊं, तो उस दिन दोपहर का खाना नहीं खरीद सकती। चश्मे का लेंस बदलवा लिया तो क्लास नहीं जा पाऊंगी। यहां बताना जरूरी है कि ईरानी अधिकारी लंबे समय से 'प्रतिरोध अर्थव्यवस्था' की बात करते रहे हैं। मतलब बाहर की दुनिया पर निर्भरता कम करना। नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने भी इसी रास्ते पर चलने और कानून बनाने की बात कही है।
कुवैत का दीनार इतना मजबूत क्यों?
अब सवाल उठता है कि कुवैत का दीनार इतना मजबूत क्यों है? दरअसल, कुवैत सेंट्रल बैंक दीनार की कीमत खुद तय करता है। यह दर कई प्रमुख मुद्राओं के एक समूह पर आधारित है। 2007 से यही व्यवस्था चल रही है। इसका मकसद मुद्रा को स्थिर रखना और बाहर से आने वाली महंगाई को रोकना है। आईएमएफ का कहना है कि यह व्यवस्था कुवैत के लिए ठीक है और बाजार का दबाव भी नहीं दिखा है।
कुवैत ने तेल की कमाई बचाकर रखी
1976 में कुवैत ने फ्यूचर जेनरेशन्स फंड बनाया। हर साल सरकारी कमाई का कम से कम 10 प्रतिशत इसमें जाता है। 1982 से कुवैत इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी इस पैसे का प्रबंधन करती है। आईएमएफ के अनुसार 2024 के अंत तक कुवैत की शुद्ध विदेशी संपत्ति 1.287 ट्रिलियन डॉलर थी। यह देश की जीडीपी का करीब 803 प्रतिशत है। इसी बड़े भंडार से दीनार को ताकत मिलती है।
ईरान के पास भी तेल, फिर रियाल क्यों गिर रही?
समस्या तेल की कमी नहीं है। समस्या यह है कि ईरान अपना तेल आसानी से बेचकर डॉलर नहीं ला पाता। अमेरिकी प्रतिबंधों ने ईरान की बैंकों तक पहुंच काट दी है। तेल बेचना और पैसा देश में लाना मुश्किल हो गया है। ईरान चीन जैसे कुछ देशों और छिपे नेटवर्क पर निर्भर रहा है। फरवरी में इजरायल-अमेरिका के संयुक्त हमले के बाद दबाव और बढ़ा। अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी से होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते तेल निर्यात बहुत गिर गया।
रॉयटर्स के अनुसार मार्च में रोज करीब 20 लाख बैरल तेल लोड हो रहा था। अगस्त में यह घटकर करीब 2.20 से 2.55 लाख बैरल रह गया। जब विदेशी मुद्रा कम पड़ती है तो रियाल गिरती है। रियाल गिरने से आयात महंगा होता है। महंगाई बढ़ती है। लोग रियाल छोड़कर डॉलर और सोना रखने लगते हैं। इससे रियाल और कमजोर हो जाती है। रॉयटर्स के अनुसार एक साल पहले एक डॉलर करीब 10 लाख रियाल का था। अब यह 22 लाख से ऊपर है। आधिकारिक औसत महंगाई करीब 70 प्रतिशत पहुंच गई है। खाने की चीजें और तेजी से महंगी हुई हैं और हो रही हैं।
तेल होने से कुछ नहीं होता
मतलब साफ है। तेल होने मात्र से कुछ नहीं हो सकता। तेल तभी काम आता है जब उसे बेचकर पैसा देश में लाया जा सके। कुवैत ने इसके लिए दशकों में मजबूत व्यवस्था बनाई। ईरान दशकों से उन प्रतिबंधों से बचने की कोशिश कर रहा है, जो उसके तेल के पैसे को सामान्य बैंकिंग सिस्टम में आने नहीं देते। जिस कारण रियाल बेहाल है।


