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Hindi News महाराष्ट्रदिलचस्प हुआ 'औरंगाबाद' सीट पर सियासी खेल, कभी था शिवसेना का गढ़; आज है AIMIM का मजूबत किला

दिलचस्प हुआ 'औरंगाबाद' सीट पर सियासी खेल, कभी था शिवसेना का गढ़; आज है AIMIM का मजूबत किला

औरंगाबाद कभी अविभाजित शिवसेना का गढ़ हुआ करता था मगर मौजूदा वक्त में यहां ओवैसी की पार्टी से इम्तियाज जलील सांसद हैं। वहीं यहां की छह विधानसभी सीटों पर 5 में शिंदे की शिवसेना और भाजपा का कब्जा हैं।

दिलचस्प हुआ 'औरंगाबाद' सीट पर सियासी खेल, कभी था शिवसेना का गढ़; आज है AIMIM का मजूबत किला
Himanshu Tiwariलाइव हिन्दुस्तान,मुंबईSat, 27 Apr 2024 04:50 PM
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महाराष्ट्र की सियासत के साथ-साथ राज्य के बीचों-बीच स्थित संभाजीनगर (पुराना नाम औरंगाबाद) हमेशा से केंद्र में रहा है। यह गढ़ कभी अविभाजित शिवसेना का हुआ करता था मगर मौजूदा वक्त में यहां ओवैसी की पार्टी से इम्तियाज जलील सांसद हैं। इस जिले में विधानसभा की स्थिति की बात करें तो छह में से एक सीट उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ने नाम है, बाकी की पांच सीटों शिंदे की शिवसेना और भाजपा के हाथ में है। हालांकि, लोकसभा चुनाव के लिए इस सीट का चुनावी समीकरण दिलचस्प हो गए हैं।

कांग्रेस और एनसीपी (शरदचंद्र पवार) की सहयोगी शिवसेना (यूबीटी) ने चार बार के सांसद चंद्रकांत खैरे पर भरोसा जताया है। खैरे 2019 में एआईएमआईएम के इम्तियाज जलील से सिर्फ 4,492 वोटों से हार गए थे। वहीं शिंदे सेना ने कैबिनेट मंत्री संदीपनराव भूमरे को मैदान में उतारा है, जो पैठण से विधायक हैं। मगर इस सीट का सिरमौर कौन बनेगा यह स्थिति मराठा और ओबीसी वोटर्स द्वारा ही साफ हो सकेगी। शिंदे की शिवसेना के लिए फिलहाल यह सीट इसलिए मुश्किल है क्योंकि मराठा आरक्षण और विरोध के बाद राज्य सरकार द्वारा उन्हें दी गई रियायत ने ओबीसी के एक खास वर्ग को नाराज कर दिया। उन्हें आरक्षण में अपना हिस्सा खोने का डर है। इससे दोनों समुदायों के बीच दरार पैदा हो गई है। जो मराठवाड़ा क्षेत्र में एक प्रमुख मुद्दा हो सकता है।

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के लिए इस सीट पर प्रतिष्ठा की लड़ाई है। पिछले लोकसभा चुनाव में हैदराबाद के बाहर यह उनकी पार्टी की पहली जीत थी। जिसे ओवैसी की पार्टी ने नाक का सवाल बना लिया है। इसके अलावा दोनों शिवसेना में बहुत कुछ दांव पर है। यह विभाजन के बाद  मुंबई के बाहर दोनों गुटों की पहली चुनावी परीक्षा है। जहां 1990 के दशक की शुरुआत से ही बाल ठाकरे ने अपने पैर जमाए लिए थे।

शिंदे की सेना के उम्मीदवार भुमरे को इस बात भी नुकसान हो सकता है कि वह औरंगाबाद से नहीं आते हैं। उनका बाहरी होना उनके लिए प्रतिकूल प्रभाव बना सकता है। इसके अलावा माना जाता है कि राज्य के अन्य हिस्सों की तरह, यहां भी जमीनी स्तर पर शिवसेना कार्यकर्ता आज भी उद्धव ठाकरे के साथ हैं। औरंगाबाद के महत्व को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने भाजपा के साथ बातचीत कर इस सीट को पाने में लंबी और कड़ी मेहनत की। उन्होंने नामांकन दाखिल करने के दिन यहां एक रैली को संबोधित करते हुए भूमरे के प्रति अपना भरोसा जताया। शिंदे ने आरक्षण मुद्दे पर अपनी सरकार के प्रति मराठाओं के गुस्से को शांत करने के लिए भूमरे के लिए समर्थन जुटाने के लिए मराठा नेता विनोद पाटिल से भी मुलाकात की।

वहीं ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ओबीसी, दलित और पिछड़े वर्गों के समर्थन को बनाए रखने के लिए भी कड़ी मेहनत कर रही है। पिछली बार प्रकाश अंबेडकर के विकास बहुजन अगाड़ी (वीबीए) के साथ गठबंधन का उन्हें काफी फायदा मिला था। मगर इस बार दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं। यहां बताता जरूरी है कि इस बार वीबीए, एमवीए के साथ गठबंधन करने की योजना में थी, मगर यह योजना भी विफल रही।