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अगली लड़ाई बीएमसी चुनाव: क्या अपना गढ़ बरकरार रख पाएगी उद्धव सेना

सवाल यह है कि आगामी दो से तीन माह में होने वाले बीएमसी चुनाव में उद्धव ठाकरे फिर वापसी कर पाएंगे या नहीं? ऐसा इसलिए क्योंकि बीएमसी चुनाव शिवसेना का गढ़ रहा है।

अगली लड़ाई बीएमसी चुनाव: क्या अपना गढ़ बरकरार रख पाएगी उद्धव सेना
Gaurav Kalaलाइव हिन्दुस्तान,मुंबईTue, 05 Jul 2022 05:58 PM
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महाराष्ट्र में शिवसेना से बगावत करने वाले विधायक एकनाथ शिंदे प्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुके हैं। उनके साथ शिवसेना के 40 विधायक भी उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ चुके हैं। इस वक्त नाम के शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अपने राजनीतिक करियर के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। सवाल यह है कि आगामी दो से तीन माह में होने वाले बीएमसी चुनाव में उद्धव ठाकरे फिर वापसी कर पाएंगे या नहीं? ऐसा इसलिए क्योंकि बीएमसी चुनाव शिवसेना का गढ़ रहा है। लेकिन उद्धव पर एंटी हिन्दुत्व का टैग थोपने के बाद शिंदे और भाजपा गठबंधन ने बड़ी चोट दे दी है, जो आने वाले वक्त में उद्धव के लिए और मुश्किल खड़ी करने वाला है, जानिए कैसे...

महाराष्ट्र की राजनीतिक में जून का महीना ऐतिहासिक रहा। कभी उद्धव ठाकरे के करीबी एकनाथ शिंदे ने शिवसेना को तोड़ दिया और सीधा पार्टी प्रमुख पर ही सवाल खड़े कर दिए। खुद को बाला साहेब ठाकरे का असली शिवसैनिक बताकर शिंदे ने कई मौकों पर कहा कि उद्धव ठाकरे ने एंटी हिन्दुत्व पार्टियों से गठबंधन करके शिवसेना के उसूलों के खिलाफ काम किया। शिंदे का इसमें संदर्भ एनसीपी और कांग्रेस के साथ महा विकास अघाड़ी सरकार के लिए था। शिंदे ने कहा कि पिछले ढाई साल में उनका दम घुट रहा था। ये एक महीने का नहीं बल्कि लंबे वक्त का दर्द था, जो लगातार बागी हो रहे शिवसेना के विधायकों के स्पष्ट होता है।

उद्धव ठाकरे के लिए सब कुछ खत्म?
शिवसेना के विधायकों को अपने साथ लेकर भाजपा के साथ गठबंधन करके एकनाथ शिंदे ने महाराष्ट्र की कमान संभाली। शिवसेना की ओर से जारी व्हिप के बावजूद शिवसेना के विधायकों ने शिंदे के समर्थन में मत दिया और विधानसभा के विशेष सत्र में उद्धव को लगातार दो झटके दिए। पहला स्पीकर चुनाव में जीत और फिर फ्लोर टेस्ट को आसानी से पास करना। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे के लिए सबकुछ खत्म हो चुका है। कईयों ने तो उद्धव के राजनीतिक करियर के अंत की भी भविष्यवाणी की है। यह भविष्यवामी इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि कुछ महीनों में बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के चुनाव होने हैं। 

बीएमसी चुनावों पर राजनीतिक उथल-पुथल का असर
उद्धव ठाकरे, शिवसेना पार्टी और दलबदल 42 विधायकों पर भविष्य के चुनाव में क्या असर होगा? बीएमसी चुनाव नजदीक हैं। हालांकि अभी इसकी घोषणा नहीं हुई है। लेकिन संभव है कि कुछ महीनों में यह चुनाव होंगे। वर्तमान परिदृश्य पर करीब से नजर डालें तो इस वक्त उद्धव सेना बैकफुट पर चल रही है। दूसरी ओर शिंदे और भाजपा के पास बीएमसी चुनाव में भी मात देने का सुनहरा मौका है। एक तरफ उद्धव ठाकरे काफी समय से बीमार चल रहे हैं। सीएम रहते भी उन्होंने कई बार घर से ही कामकाज संभाला था। ऐसे में उम्मीद बनती दिख रही है कि जल्द ही आदित्य ठाकरे पार्टी की कमान संभाल सकते हैं। 

शिंदे गुट का दांव
शिवसेना के शिंदे के नेतृत्व वाले धड़े के नए व्हिप प्रमुख भरत गोगावले ने विश्वास मत के दौरान व्हिप का उल्लंघन करने वाले शिवसेना विधायकों (उद्धव ठाकरे समर्थित) को अयोग्य घोषित करने के लिए नोटिस जारी किया था। लेकिन इस लिस्ट से व्हिप ने आदित्य का नाम हटा दिया। इसके पीछे तर्क गिया गया कि यह शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे के सम्मान में है।

दलबदलुओं की वापसी?
हो सकता है कि दलबदलुओं के लिए 'पार्टी वापसी' होने की संभावना हो, क्योंकि उनका सामना निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं से होगा। वास्तव में, एमवीए के तीन दलों में से, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने पिछले बीएमसी चुनावों से पहले सीटों के बंटवारे के कारण स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा था। ऐसे में इस बार भी क्या शिवसेना अकेले चुनाव लड़कर अपनी वापसी सुनिश्चित कर पाएगी, ये देखने वाली बात होगी। 

उद्धव को शिवसैनिकों का समर्थन
दलबदल का शिवसेना पार्टी या उसके पार्षदों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है। यह सब मुंबई शहर के बारे में है। जब से बगावत शुरू हुई और उद्धव के पद को खतरा हुआ, तब से उन्हें शिवसैनिकों से अपार समर्थन मिला है। शिंदे गुट की बगावत के बाद से उद्धव कई बार कार्यकर्ताओं से लेकर नेताओं तक के साथ बैठक कर चुके हैं। ये बैठकें दर्शाती हैं कि उद्धव शिवसेना को एकजुट करने में जुटे हैं। अब वे शिवसेना में और टूट किसी भी कीमत पर नहीं चाहते।

कोरोना काल में किए कार्य आएंगे काम
जिस तरह से उद्धव ठाकरे ने सीएम रहते कई विकास कार्य किए। उसने बीएमसी चुनाव में उनकी राह आसान कर दी है। कोरोना काल में महाराष्ट्र सरकार ने टीकाकरण से लेकर, अस्पतालों में बेहतर व्यवस्थाओं पर जोर दिया। सूत्र बताते हैं कि ये वे सभी कारण हैं, जिसने उद्धव की बीएमसीप चुनाव में बड़ी जीत को पहले ही तय कर दिया था। राजनीतिक पंडित भी मानते हैं कि चुनाव में बागियों का उतना असर नहीं होने वाला।

आरे मेट्रो परियोजना पर तकरार
उद्धव सरकार के वक्त आरे मेट्रो परियोजना को रद्द किया गया था। यह परियोजना पूर्व सीएम देवेंद्र फडणवीस सरकार के वक्त लाई गई थी। दिलचस्प बात यह है कि पूर्व शहरी विकास मंत्री शिंदे आरे में मेट्रो कारशेड के लिए जमीन रद्द करने के फैसले में शामिल थे। हालांकि, जब उन्होंने नए सीएम के रूप में शपथ ली, तो उन्होंने तुरंत घोषणा की कि आरे में कारशेड का निर्माण किया जाएगा। 

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