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Hindi News महाराष्ट्रउसे जेल में कैसे रखा, नाबालिग भी सदमे में है; पुणे पोर्श कांड के आरोपी को लेकर HC ने पूछे सवाल

उसे जेल में कैसे रखा, नाबालिग भी सदमे में है; पुणे पोर्श कांड के आरोपी को लेकर HC ने पूछे सवाल

नाबालिग आरोपी को लेकर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने ये भी माना कि मारे गए दो लोगों के परिवार अभी भी उनकी मौत की खबर से मानसिक और शारीरिक आघात का सामना कर रहे हैं। यह घटना 19 मई की है।

उसे जेल में कैसे रखा, नाबालिग भी सदमे में है; पुणे पोर्श कांड के आरोपी को लेकर HC ने पूछे सवाल
Amit Kumarलाइव हिन्दुस्तान,मुंबईFri, 21 Jun 2024 06:39 PM
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अपने पिता की ढाई करोड़ रुपये की पोर्श सुपरकार से दो लोगों को कुचलने वाले नाबालिग को लेकर बंबई उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को बड़ी टिप्पणी की। उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने कहा कि नशे में धुत पुणे के जिस लड़के ने दो लोगों को कुचला, उसने दुर्घटना तो की, लेकिन वह संभवतः सदमे में था और इसलिए यह मानना ​​स्वाभाविक है कि उसकी भी मानसिक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा होगा। न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजूषा देशिहैपांडे की खंडपीठ ने कहा कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि दुर्घटना दुर्भाग्यपूर्ण थी। अदालत ने कहा, "दो लोगों की जान चली गई। सदमा था लेकिन बच्चा (किशोर) भी सदमे में था।" 

मरने वाले कौन थे?

नाबालिग आरोपी को लेकर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने ये भी माना कि मारे गए दो लोगों के परिवार अभी भी उनकी मौत की खबर से मानसिक और शारीरिक आघात का सामना कर रहे हैं। यह घटना 19 मई की है जब किशोर कथित तौर पर नशे की हालत में बहुत तेज गति से पोर्श कार चला रहा था। उसकी कार जब पुणे के कल्याणी नगर इलाके में एक मोटरसाइकिल से टकरा गई, जिसमें दो सॉफ्टवेयर इंजीनियर- अनीश अवधिया और अश्विनी कोष्टा की मौत हो गई।

अदालत आरोपी की बुआ की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें लड़के की रिहाई की मांग की गई थी। ‘पुणे पोर्श कार दुर्घटना’ के आरोपी किशोर की एक चाची ने उसे (किशोर को) "अवैध" हिरासत में रखने का दावा करते हुए बम्बई उच्च न्यायालय का रुख किया है और उसकी तत्काल रिहाई की मांग की है। महिला ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करके 17-वर्षीय किशोर की तत्काल रिहाई की मांग की है, जिसे फिलहाल पुणे के एक सुधार गृह में रखा गया है। 

उसे कैसे जेल में रखा गया है- कोर्ट

याचिका में कहा गया है कि इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को चाहे जिस नजरिए से देखा जाए, यह एक दुर्घटना थी और जिस व्यक्ति के वाहन चलाने के बारे में कहा जा रहा है वह नाबालिग था। दस जून को दायर की गई याचिका शुक्रवार को न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आई। सुनवाई के बाद पीठ ने अपना आदेश मंगलवार तक के लिए सुरक्षित रख लिया है। सुनवाई के दौरान पीठ ने पुलिस से यह भी सवाल किया कि पोर्श दुर्घटना मामले में नाबालिग आरोपी को जमानत देने के आदेश को कानून के किस प्रावधान के तहत संशोधित किया गया और उसे कैसे "जेल" में रखा गया है। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका यह सुनिश्चित करने के लिए दायर की जाती है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अदालत के समक्ष पेश किया जाए और अदालत यह निर्धारित करे कि हिरासत कानूनी है अथवा गैर-कानूनी।

पीठ ने शुक्रवार को याचिका पर दलीलें सुनते हुए कहा कि आज तक, पुलिस ने जेजेबी (किशोर न्याय बोर्ड) द्वारा पारित जमानत आदेश को रद्द करने के लिए उच्च न्यायालय के समक्ष कोई आवेदन दायर नहीं किया है। इसके बजाय, जमानत आदेश में संशोधन की मांग करते हुए एक आवेदन दायर किया गया था। एचसी ने कहा, इस आवेदन के आधार पर, जमानत आदेश में संशोधन किया गया, लड़के को हिरासत में ले लिया गया और एक अवलोकन गृह में भेज दिया गया। अदालत ने कहा, "यह किस तरह की रिमांड है? रिमांड करने की शक्ति क्या है? यह किस तरह की प्रक्रिया है जहां किसी व्यक्ति को जमानत दी गई है और फिर उसे हिरासत में लेकर रिमांड पारित किया जाता है।"

पुणे के किशोर को कैसे जमानत मिली, फिर उसे रिमांड पर लिया गया

पुणे के किशोर को उसकी गिरफ्तारी के 15 घंटे के भीतर ही जमानत मिल गई थी। जमानत देते हुए जेजेबी ने उसे सड़क सुरक्षा पर 300 शब्दों का निबंध लिखने का आदेश दिया था। जमानत आदेश के कारण लोगों में रोष फैल गया और पुलिस ने आदेश में संशोधन करने की मांग की। इसके बाद जमानत आदेश को संशोधित कर दिया गया और लड़के को किशोर सुधार गृह भेज दिया गया। पिछले हफ्ते किशोर की बुआ ने हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। उन्होंने दावा किया कि किशोर बोर्ड का रिमांड आदेश लागू कानूनों का "पूरी तरह उल्लंघन" है।

जमानत आदेश संशोधित किया गया है, रद्द नहीं किया गया है: याचिकाकर्ता

आज की सुनवाई में याचिकाकर्ता ने जमानत आदेश में संशोधन के खिलाफ दलील दी। बुआ की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता आबाद पूंडा ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम की धारा 104 के तहत जमानत पर रिहा नाबालिग आरोपी को तब तक पर्यवेक्षण गृह में भेजने की अनुमति नहीं है, जब तक कि पहले का आदेश रद्द नहीं कर दिया जाता। पूंडा ने कहा कि इस मामले में लड़के के जमानत आदेश में संशोधन किया गया है, रद्द नहीं किया गया है। वकील ने कहा, "जेजे एक्ट के तहत किशोरों को जमानत देना बुनियादी नियम है। लेकिन अगर आप किसी को जेल में डालना चाहते हैं, तो पहले आपको जमानत रद्द करनी होगी। जब पुलिस ने धारा 104 के तहत आवेदन दिया, तो किशोर बोर्ड ने पहले के आदेश में संशोधन किया। नाबालिग को केवल तभी निगरानी गृह भेजा जा सकता है, जब जमानत खारिज हो जाए..." पूंडा ने जेजे एक्ट की धारा 39 पर भी सवाल उठाया, जिसके अनुसार नाबालिग आरोपी को केवल तभी निगरानी गृह भेजा जा सकता है, जब जमानत खारिज हो जाए। उन्होंने बताया, "इस मामले में जमानत खारिज नहीं की गई..." 

उन्होंने लड़के के दादा की गिरफ्तारी का मुद्दा भी उठाया, जिसकी खुद की कस्टडी में किशोर को जमानत पर रिहा किया गया था। हालांकि, दादा अब उन आरोपों के चलते जेल में हैं, जिनमें ड्राइवर को फर्जी बयान दर्ज कराने की धमकी देना शामिल है। वकील ने कहा, "धारा 104 के अनुसार लड़के को परिवार के अन्य सदस्यों के पास भेजा जा सकता है... आप किसी व्यक्ति को जमानत पर होने पर निगरानी गृह में नहीं भेज सकते... उसे 14 दिनों के लिए भेजा गया था (बाद में हिरासत बढ़ा दी गई) और इसलिए उसकी स्वतंत्रता पर रोक लगा दी गई है... इसलिए यह याचिका दायर की गई है।" पूंडा ने पुलिस द्वारा घटना को "जघन्य" बताए जाने का उल्लेख करते हुए कहा, "भले ही यह एक जघन्य अपराध हो... मेरी जमानत रद्द किए बिना मुझे सलाखों के पीछे नहीं रखा जा सकता।"
 
अभियोजन पक्ष की ओर से पेश हुए अधिवक्ता हितेन वेनेगावकर ने कहा कि किशोर के शराब के नशे में होने सहित कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण किशोर बोर्ड ने अपना आदेश संशोधित किया है। उन्होंने तर्क दिया कि मूल आदेश अधिकारियों द्वारा अपराध के तथ्यों की रिपोर्ट न करने के कारण पारित किया गया था। यह संदर्भ उन पुलिस अधिकारियों की ओर था, जिन्होंने पहले तो कंट्रोल रूम को मौतों की सूचना न देकर घटना की गंभीरता को कम करने का प्रयास किया और फिर खून में शराब स्तर की जांच में देरी की। उन्होंने आज कहा, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे अपने लोगों ने 19 मई को किशोर बोर्ड के समक्ष तथ्य प्रस्तुत नहीं किए।"