BMC चुनाव में ‘परिवार’ की अनोखी जीत; तीन दलों के टिकट पर उतरे तीन सदस्य, तीनों को फतह
महाराष्ट्र में बीएमसी चुनाव के परिणाम आ रहे हैं। यहां पर एक चौंकाने वाला चुनाव परिणाम आया है। एक परिवार के तीन सदस्यों ने तीन पार्टियों के सिंबल पर चुनाव लड़ा था और तीनों ने ही चुनाव जीत लिया है।

महाराष्ट्र में बीएमसी चुनाव के परिणाम आ रहे हैं। यहां पर एक चौंकाने वाला चुनाव परिणाम आया है। एक परिवार के तीन सदस्यों ने तीन पार्टियों के सिंबल पर चुनाव लड़ा था और तीनों ने ही चुनाव जीत लिया है। चुनाव परिणाम की यह हैरान करने वाली कहानी सामने आई है ठाणे नगर निगम के चुनाव में। यहां पर म्हात्रे परिवार के तीन सदस्य तीन प्रतिद्वंद्वी दलों से चुनावी मैदान में उतरे थे। अब चुनाव परिणाम सामने आने के बाद लोग इनकी जीत पर आश्चर्य जता रहे हैं।
अलग-अलग दलों से मैदान में
महाराष्ट्र के ठाणे नगर निगम में प्रहलाद म्हात्रे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के टिकट से चुनाव लड़ रहे थे। वहीं, उनके ही परिवार की रेखा म्हात्रे शिवसेना के टिकट पर तो एक अन्य सदस्य रवीन म्हात्रे ने भाजपा के टिकट पर जीत हासिल की। हालांकि मनसे के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले प्रहलाद म्हात्रे के लिए इस लिहाज से बुरा अनुभव रहा क्योंकि, ठाणे के नगर निकाय चुनाव में भाजपा और शिवसेना गठबंधन ने बाजी मारी है।
इस बार ऐसा था गठबंधन
बता दें कि पुणे एक वक्त में अविभाजित शिवसेना और डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे का गढ़ हुआ करता था। इस बार यहां पर भाजपा और शिंदे गुट की शिवसेना संयुक्त रूप से मैदान में उतरे थे। वहीं, महायुति गठबंधन के एक अन्य दल, अजित पवार की एनसीपी अकेले ही चुनाव लड़ने उतरी थी। 131 सीटों वाले ठाणे नगर निकाय में शिंदे सेना ने 87 और भाजपा ने 40 सीटों पर चुनाव लड़ा था। दूसरी तरफ 20 साल बाद एकजुट होने के बाद उद्धव और राज ठाकरे एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतरे थे। ठाणे में दोनों भाइयों ने शरद पवार की एनसीपी से हाथ मिलाया था। हालांकि भाजपा और शिवसेना की आंधी में वो उड़ गए। कांग्रेस ने 96 सीटों पर अकेले ही चुनाव लड़ा था।
शिंदे का रहा है प्रभुत्व
अगर बात साल 2017 की करें तो तब अविभाजित शिवसेना ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में 131 में 67 सीटें जीती थीं। तब एनसीपी 34 सीटों के साथ दूसरे और 23 सीटों के साथ भाजपा तीसरे नंबर पर रही थी। हालांकि तब भी शिंदे ही यहां आगे थे, क्योंकि शिवसेना के 67 में से 66 पार्षद उनका ही समर्थन कर रहे थे। अभी तक की बात करें तो 1987-1993 को छोड़ दिया जाए तो अविभाजित शिवसेना का ठाणे में प्रभुत्व रहा है। इसकी सबसे अहम वजह, बालासाहेब ठाकरे और आनंद दिघे का यहां पर प्रभाव रहा है।
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