
BMC चुनाव में डॉन की बेटियों का कैसा रहा अंजाम, अरुण गवली को लगा डबल झटका
महाराष्ट्र निकाय चुनाव में एनडीए गठबंधन ने बाजी मार ली है। बीएमसी चुनाव में भी उसने परचम फहराया है। हालांकि बीएमसी चुनाव में कई लोगों को झटका लगा है। ऐसा ही एक नाम है, अरुण गवली का।
महाराष्ट्र निकाय चुनाव में एनडीए गठबंधन ने बाजी मार ली है। बीएमसी चुनाव में भी उसने परचम फहराया है। हालांकि बीएमसी चुनाव में कई लोगों को झटका लगा है। ऐसा ही एक नाम है, अरुण गवली का। गैंगस्टर से राजनेता बने अरुण गवली की दोनों बेटियां, गीता और योगिता गवली बीएमसी चुनाव में मैदान में उतरी थीं। लेकिन दोनों में एक को भी सफलता नहीं मिली। गीता और योगिता अपने पिता की बनाई पार्टी, अखिल भारतीय सेना के बैनर तले चुनाव लड़ रही थीं।
कौन कहां से हारा
गीता गवली को बायकुला के वार्ड 212 में समाजवादी पार्टी के अमरीन शहजान अब्रहानी ने हराया। वहीं, योगिता गवली को वार्ड नंबर 207 में भाजपा के रोहिदास लोखंडे के हाथों शिकस्त का सामना करना पड़ा। इन दोनों हार से मुंबई में गवली परिवार की सियासी प्रतिष्ठा को काफी धक्का लगा है। बता दें कि चुनाव से पहले दोनों बहनें काफी आशान्वित थीं। एनडीटीवी के मुताबिक उन्होंने कहा था कि लोग हमें डॉन की बेटी नहीं, बल्कि डैडी की बेटी की रूप में देखते हैं।
कुख्यात डॉन रहा है अरुण गवली
गौरतलब है कि अरुण गवली 1970 के समय में मुंबई अंडरवर्ल्ड का कुख्यात डॉन था। वह और उसके भाई किशोर, ‘बायकुला कंपनी’ का हिस्सा थे। इस आपराधिक गैंग ने सेंट्रल मुंबई स्थित बायकुला, परेल और सात रास्ता में अपराध को अंजाम दिया। अरुण गवली ने 1988 में गैंग की कमान संभाल ली और अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद इब्राहिम गैंग से टक्कर लेने लगा। यह टक्कर 80 के दशक के आखिर और 90 के दशक में खूब चली।
बनाई खुद की पार्टी
1980 में अरुण गवली को शिवसेना के बालासाहेब ठाकरे का वरदहस्त मिल गया। लेकिन मध्य 1990 में शिवसेना से दूरी बढ़ने के बाद उसने खुद की राजनीतिक पार्टी बनाई। इसके बाद चिंचपोकली से 2004 से 2009 तक विधायक रहा। साल 2008 में शिवसेना पार्षद की हत्या के आरोप में अरुण गवली को जेल हुई। 17 साल बाद सितंबर के अंत में वह जेल से बाहर आया।

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