Explainer: एकनाथ शिंदे की बढ़ती ताकत से बदलेगा महाराष्ट्र का खेल, BJP-शिवसेना गठबंधन में आएगा नया ट्विस्ट?

लाइव हिन्दुस्तान, मुंबई
Follow us on Google News
share

Maharashtra Politics: महाराष्ट्र की राजनीति इन दिनों तूफान की आंधी झेल रही है। सत्ताधारी गठबंधन के अंदर गहरी खींचतान और विपक्षी शिवसेना यूबीटी में चल रही अंदरूनी बगावत के बीच अब एक बड़ा राजनीतिक भूकंप आने वाला है?

Eknath Shinde

महाराष्ट्र की राजनीति इन दिनों चरम पर है। सत्ताधारी गठबंधन के अंदर गहरे घात-प्रतिघात और विपक्षी शिवसेना (UBT) में चल रही अंदरूनी खींचतान के बीच एक बड़ा राजनीतिक भूचाल आने वाला है। शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसद अब औपचारिक रूप से एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय के लिए पूरी तरह तैयार हैं। इन सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को अपना पत्र सौंप दिया है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि यह प्रक्रिया अब मात्र औपचारिकता रह गई है और अगले सप्ताह के अंदर ही पूरी हो सकती है। इस दल-बदल के बाद लोकसभा में शिंदे गुट की ताकत बढ़कर 13 हो जाएगी। महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में यह बदलाव कई समीकरणों को उलट-पुलट कर देगा। शिंदे की शिवसेना की संख्या कांग्रेस के बराबर (13) पहुंच जाएगी, जबकि भाजपा की सीटें घटकर मात्र 9 रह जाएंगी और वह राज्य में तीसरे स्थान पर खिसक जाएगी।

महाराष्ट्र राजनीति पर दूरगामी और गहरे असर की आशंका

सियासी पंडितों का मानना है कि यह घटनाक्रम महाराष्ट्र की राजनीति पर सिर्फ अल्पकालिक नहीं, बल्कि लंबे समय तक असर डालने वाला साबित होगा। भाजपा, जो पिछले कई वर्षों से राज्य में खुद को 'बड़े भाई' के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही थी, इस विकास से काफी नाराज और असहज बताई जा रही है। हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों में भी यह तनाव साफ दिखा। 288 नगर परिषदों और नगर पंचायतों के अध्यक्ष पदों के बंटवारे में भाजपा को 117 पद मिले, जबकि शिंदे गुट को 53 और एनसीपी को 37 पद प्राप्त हुए। भाजपा ने 29 नगर निगमों में से अधिकांश में महापौर पद पर कब्जा जमाया, जिसमें देश की सबसे बड़ी नगरपालिका बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) का महापौर पद भी शामिल है। इसके बावजूद एकनाथ शिंदे ने अपने पारंपरिक गढ़ ठाणे और कल्याण-डोंबिवली में अपना दबदबा बरकरार रखा है, जो उनके बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।

'ऑपरेशन टाइगर' को भाजपा का खुला समर्थन

सूत्रों का दावा है कि शिवसेना (UBT) के इन छह सांसदों के विद्रोह को भाजपा का पूरा समर्थन प्राप्त है। इस पूरे अभियान को ‘ऑपरेशन टाइगर’ नाम दिया गया है। भाजपा ने शिंदे गुट को हरी झंडी दे दी है, खासकर आगामी मानसून सत्र के दौरान महिला आरक्षण से जुड़े परिसीमन संबंधी महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन विधेयक को दो-तिहाई बहुमत से पास कराने के मकसद से। शिवसेना स्थापना दिवस के ठीक एक दिन बाद महाराष्ट्र पहुंचे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एकनाथ शिंदे का मनोबल बढ़ाते हुए साफ ऐलान किया कि अब सिर्फ एक शिवसेना बची है।

मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा कि पहले शिंदे गुट कहना पड़ता था, अब कोई दूसरा गुट नहीं रहा। अमित शाह के इस बयान पर रविवार को उद्धव ठाकरे ने तीखा पलटवार किया। मुंबई में आयोजित एक बड़ी रैली को संबोधित करते हुए उद्धव ठाकरे ने कहा कि मेरे नेतृत्व वाली शिवसेना ही असली और एकमात्र शिवसेना है। कोई दूसरी शिवसेना नहीं है।

शिंदे की मजबूत दावेदारी

वर्तमान में शिंदे गुट के पास केंद्र सरकार में केवल एक राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) का पद है, जिस पर प्रतापराव जाधव आयुष मंत्रालय संभाल रहे हैं। 13 सांसदों के साथ अब शिंदे गुट तेलुगु देशम पार्टी (16 सांसद) और जनता दल यूनाइटेड (12 सांसद) की बराबरी कर लेगा। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, एकनाथ शिंदे कैबिनेट रैंक का पद और कम से कम एक पूर्ण राज्य मंत्री पद की मांग जरूर करेंगे। चर्चा है कि तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों को भी इसी फॉर्मूले के तहत पद दिए जा सकते हैं।

फडणवीस-शिंदे के बीच बढ़ते मतभेद

महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के बीच समय-समय पर मतभेद की खबरें आती रहती हैं। सूत्र बताते हैं कि दिल्ली की यात्राओं के दौरान शिंदे भाजपा की उच्च कमान के सामने इन मुद्दों को लगातार उठाते रहे हैं। उनके समर्थक 2024 में मुख्यमंत्री पद न मिलने से काफी निराश थे। लेकिन अब बढ़ती संसदीय ताकत के साथ शिंदे की सौदेबाजी की क्षमता निश्चित रूप से मजबूत होने वाली है।

शिंदे का दोतरफा फोकस

एकनाथ शिंदे का लक्ष्य केवल केंद्र तक सीमित नहीं है। वे राज्य स्तर पर पार्टी को मजबूत करने की रणनीति पर भी पूरी तरह सक्रिय हैं। उनके बेटे सांसद श्रीकांत शिंदे पूरे महाराष्ट्र के 160 विधानसभा क्षेत्रों का व्यापक दौरा कर रहे हैं। पार्टी ने स्थानीय निकाय चुनावों में पूरी ताकत झोंक दी है। बृहन्मुंबई नगर निगम सहित मुंबई, ठाणे और ग्रामीण इलाकों में बड़े पैमाने पर पार्षदों के दल-बदल की अटकलें जोरों पर हैं। शिंदे ऐसे नेताओं को मौका देना चाहते हैं जो परिणाम देते हों। यही वजह है कि शिवसेना स्थापना दिवस पर बेटे की पदोन्नति की मांग को उन्होंने साफ खारिज करते हुए कहा था कि पदोन्नति प्रदर्शन पर निर्भर करेगी।

बागी सांसदों की शर्तें और भविष्य की तस्वीर

दूसरी ओर सभी छह बागी सांसद इस शर्त पर शिंदे गुट में शामिल हो रहे हैं कि उन्हें 2029 के लोकसभा चुनाव में पार्टी टिकट मिलेगा। सूत्रों का दावा है कि भाजपा भी इस व्यवस्था पर सहमत है। अगर ऐसा हुआ तो 2029 में शिवसेना 25 सीटों का दावा कर सकती है, जो शिंदे के बढ़ते प्रभाव को स्पष्ट रूप से दर्शाएगा। बता दें कि इन छह सांसदों में से तीन ने 2024 में शिंदे गुट के उम्मीदवारों को हराकर जीत दर्ज की थी। हिंगोली से नागेश पाटिल-अष्टिकर ने 2 लाख 16 हजार वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। अन्य सीटों पर भी भारी अंतर से जीत हासिल हुई थी।

दूसरी ओर सियासी पंडितों का मानना है कि यह दल-बदल महाराष्ट्र की राजनीति को नई दिशा दे सकता है। शिंदे गुट की बढ़ती ताकत, भाजपा के साथ गठबंधन की नई समीकरण और उद्धव ठाकरे की शिवसेना पर पड़ने वाला दबाव, ये सब 2029 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों की रूपरेखा पहले से तय करने वाले साबित हो सकते हैं। अब सवाल यह है कि यह भूचाल महाराष्ट्र की सत्ता के समीकरणों को कितना हिलाएगा?

Devendra Kasyap

लेखक के बारे में

Devendra Kasyap

देवेन्द्र कश्यप पिछले 13 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अगस्त 2025 से वह लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं। संस्थान की होम टीम का वह एक अहम हिस्सा हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर उनकी पैनी नजर रहती है। वायरल कंटेंट के साथ-साथ लीक से हटकर और प्रभावशाली खबरों में उनकी विशेष रुचि है।

देवेन्द्र ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत वर्ष 2013 में महुआ न्यूज से की। करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने बिहार की राजधानी पटना में रिपोर्टिंग की। इस दौरान राजनीति के साथ-साथ क्राइम और शिक्षा बीट पर भी काम किया। इसके बाद उन्होंने जी न्यूज (बिहार-झारखंड) में अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 2015 में ईनाडु इंडिया के साथ डिजिटल मीडिया में कदम रखा। इसके बाद राजस्थान पत्रिका, ईटीवी भारत और नवभारत टाइम्स ऑनलाइन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्य किया।

मूल रूप से बिहार के भोजपुरी बेल्ट रोहतास जिले के रहने वाले देवेन्द्र कश्यप ने अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा पटना से प्राप्त की। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की और MCU भोपाल से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में प्रवास कर रहे हैं।

और पढ़ें

Hindi Newsमहाराष्ट्र न्यूज़शिंदे की बढ़ती ताकत से बदलेगा महाराष्ट्र का खेल, BJP-SS गठबंधन में आएगा ट्विस्ट?