अवैध धर्मांतरण से हुई शादी से जन्मा बच्चा किस धर्म का होगा? महाराष्ट्र सरकार ला रही कानून
महाराष्ट्र विधानसभा में 'धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026' पेश। नए एंटी-कन्वर्जन कानून में अवैध धर्मांतरण पर 10 साल की जेल, 7 लाख जुर्माना और बच्चे का धर्म मां के अनुसार तय करने जैसे सख्त प्रावधान हैं। जानिए इस बिल की हर जरूरी बात।
महाराष्ट्र विधानसभा में शुक्रवार को 'धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026' पेश किया गया। राज्य में अवैध और सामूहिक धर्मांतरण के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए लाए गए इस प्रस्तावित कानून में कई ऐसे प्रावधान हैं, जो हाल के वर्षों में अन्य राज्यों द्वारा बनाए गए धर्मांतरण विरोधी कानूनों से भी ज्यादा सख्त और विस्तृत हैं। यदि यह विधेयक पारित हो जाता है, तो महाराष्ट्र धार्मिक धर्मांतरण को विनियमित करने वाला देश का 10वां राज्य बन जाएगा। इससे पहले झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक और राजस्थान ऐसे कानून बना चुके हैं।
बच्चे के धर्म और अधिकारों से जुड़ा अहम नियम
यह इस विधेयक का सबसे अनूठा पहलू है, जो इसे अन्य राज्यों के कानूनों से अलग बनाता है।
बच्चे का धर्म: यदि कोई विवाह अवैध धर्मांतरण के माध्यम से हुआ है, तो उस विवाह से पैदा होने वाले बच्चे का धर्म वही माना जाएगा जो विवाह से पहले उसकी मां का धर्म था।
उत्तराधिकार और भरण-पोषण: धर्म के निर्धारण के बावजूद, बच्चे को दोनों माता-पिता की संपत्ति में कानूनी रूप से उत्तराधिकार का अधिकार होगा। इसके अलावा, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 के तहत बच्चा भरण-पोषण का भी हकदार होगा।
कस्टडी: जब तक अदालत कोई अन्य निर्देश न दे, बच्चे की कस्टडी मां के पास ही रहेगी।
धर्मांतरण के लिए तय की गई कानूनी प्रक्रिया
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, धर्म बदलने की इच्छा रखने वाले किसी भी व्यक्ति को अब एक सख्त प्रक्रिया से गुजरना होगा। धर्म बदलने से कम से कम 60 दिन पहले जिलाधिकारी को लिखित नोटिस देना होगा। इसमें उम्र, पेशा, वर्तमान धर्म और अपनाए जाने वाले धर्म की जानकारी देनी होगी। नोटिस मिलने के बाद जिलाधिकारी या पुलिस यह जांच करेगी कि यह धर्मांतरण स्वेच्छा से हो रहा है या किसी दबाव/धोखे से। धर्मांतरण के बाद, धर्म बदलने वाले व्यक्ति और समारोह आयोजित करने वाली संस्था दोनों को 60 दिनों के भीतर जिला प्रशासन को एक घोषणा पत्र सौंपना होगा। ऐसा न करने पर धर्मांतरण अमान्य माना जा सकता है।
'अवैध' धर्मांतरण और 'प्रलोभन' की नई और व्यापक परिभाषा
विधेयक में प्रलोभन, धोखा, जबरदस्ती या शादी का झांसा देकर किए गए धर्मांतरण को अवैध माना गया है। इसकी परिभाषाओं का दायरा काफी बढ़ा दिया गया है। इसमें अब केवल पैसा, नौकरी, मुफ्त शिक्षा या दैवीय चमत्कार ही शामिल नहीं हैं, बल्कि एक धर्म को दूसरे से श्रेष्ठ बताना या दूसरे धर्म के रीति-रिवाजों को बुरा साबित करना भी 'प्रलोभन' के दायरे में आएगा। इसमें दैवीय नाराजगी का डर दिखाना, सामाजिक बहिष्कार, जान-माल की धमकी, या किसी भी तरह का शारीरिक और मानसिक दबाव शामिल है। अपनी धार्मिक पहचान छिपाकर या धोखा देकर शादी करना अवैध होगा। केवल धर्मांतरण के लिए की गई शादी को अदालत शून्य घोषित कर सकती है।
सजा और जुर्माने के सख्त प्रावधान
यह अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होगा, जिसकी जांच सब-इंस्पेक्टर या उससे ऊपर के रैंक का अधिकारी करेगा।
सामान्य मामले: 7 साल तक की जेल और 1 लाख रुपये का जुर्माना।
कमजोर वर्ग (महिला, नाबालिग, SC/ST): अगर धर्मांतरण इनका किया जाता है, तो जुर्माना बढ़कर 5 लाख रुपये हो जाएगा।
सामूहिक धर्मांतरण: दो या अधिक लोगों का एक साथ धर्मांतरण कराने पर 7 साल की जेल और 5 लाख रुपये का जुर्माना।
बार-बार अपराध करने पर 10 साल तक की जेल और 7 लाख रुपये तक का जुर्माना। अगर कोई संस्था इसमें शामिल पाई जाती है, तो उसका रजिस्ट्रेशन रद्द किया जा सकता है और उसकी सरकारी फंडिंग रोकी जा सकती है।
शिकायत कौन कर सकता है? धर्म बदलने वाला व्यक्ति खुद, उसके माता-पिता, भाई-बहन, या खून, शादी या गोद लेने से जुड़ा कोई भी रिश्तेदार एफआईआर (FIR) दर्ज करा सकता है। पुलिस इस मामले में स्वतः संज्ञान भी ले सकती है।
यह साबित करने की जिम्मेदारी कि धर्मांतरण बिना किसी दबाव या लालच के स्वेच्छा से हुआ है, उस व्यक्ति या संस्था पर होगी जिसने धर्मांतरण कराया है। पीड़ित लोगों के पुनर्वास और उनकी सुरक्षा के लिए भी विधेयक में प्रावधान किए गए हैं।
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