रसोई गैस की भारी किल्लत से बेपटरी हुई खान-पान व्यवस्था; महाराष्ट्र के होटलों पर लटके ताले
सबसे बुरा असर ठाणे जिले में देखने को मिल रहा है, जहाँ रिपोर्टों के अनुसार लगभग 60 प्रतिशत होटल गैस की अनुपलब्धता के कारण बंद हो गए हैं। पारंपरिक मालवणी और सिंधुदुर्ग व्यंजन परोसने वाले ढाबों ने लकड़ी के चूल्हे जलाना शुरू कर दिया है।

LPG Gas Cylinder Shortage: महाराष्ट्र के प्रमुख शहरों में रसोई गैस की भारी किल्लत ने खाद्य उद्योग और आम आदमी की जेब पर गहरा प्रहार किया है। मुंबई, पुणे, ठाणे और सोलापुर जैसे शहरों में कॉमर्शियल सिलेंडरों की कमी के कारण न केवल खाने-पीने की वस्तुओं के दाम बढ़ गए हैं, बल्कि कई छोटे-बड़े होटल बंद होने की कगार पर पहुँच गए हैं। राजधानी मुंबई में स्थिति काफी चिंताजनक है। 'करी रोड' जैसे व्यस्त इलाकों में नाश्ते के स्टाल मालिकों ने एलपीजी सिलेंडर खत्म होने के बाद केरोसिन स्टोव और कोयले की भट्टियों का सहारा लेना शुरू कर दिया है। वैकल्पिक साधनों के उपयोग से लागत बढ़ गई है, जिसका सीधा असर ग्राहकों पर पड़ा है। वेंडर बताते हैं कि जो नाश्ता पहले किफायती था, अब उसके दाम बढ़ा दिए गए हैं।
सबसे बुरा असर ठाणे जिले में देखने को मिल रहा है, जहाँ रिपोर्टों के अनुसार लगभग 60 प्रतिशत होटल गैस की अनुपलब्धता के कारण बंद हो गए हैं। पारंपरिक मालवणी और सिंधुदुर्ग व्यंजन परोसने वाले कई ढाबों ने होटलों के बाहर लकड़ी के चूल्हे जलाकर खाना बनाना शुरू कर दिया है। होटल मालिकों ने आरोप लगाया है कि बाजार में सिलेंडरों की कालाबाजारी चरम पर है और एक सिलेंडर 5,000 से 6,000 रुपये तक में बेचा जा रहा है।
बड़े पैमाने पर छंटनी का खतरा
पुणे में मेस सर्विस और 'रोटी-सब्जी' केंद्रों पर संकट मंडरा रहा है। आईटी कंपनियों और अस्पतालों में भोजन की आपूर्ति करने वाले बड़े वेंडर इस किल्लत से प्रभावित हुए हैं, जिससे हजारों कर्मचारियों का दैनिक भोजन बाधित हो रहा है। सोलापुर में कई प्रसिद्ध होटलों ने अपने मेन्यू से मुख्य व्यंजनों को हटा दिया है क्योंकि उनके पास पर्याप्त ईंधन नहीं है। व्यवसायियों ने चेतावनी दी है कि यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी, तो उन्हें बड़े पैमाने पर छंटनी करनी पड़ सकती है।
तत्काल हस्तक्षेप की मांग
होटल एसोसिएशन और छोटे व्यापारियों ने सरकार और गैस एजेंसियों से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उनकी मुख्य मांगें आपूर्ति को स्थिर करना और कालाबाजारी पर नकेल कसना है। फिलहाल, वैकल्पिक ईंधन के बढ़ते इस्तेमाल और बढ़ती महंगाई ने राज्य की खाद्य अर्थव्यवस्था को संकट में डाल दिया है।
लेखक के बारे में
Pramod Praveenप्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।
अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।


