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हिंदी दिवसः हिंदी को राजभाषा का दर्जा देने के बड़े पैरोकार- सेठ गोविंद दास

SETH GOVIND DAS

भारत में हिंदी को बढ़ावा देने में सेठ गोविंद दास का योगदान अतुलनीय है। यहां तक कि हिंदी के सवाल पर उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस की नीति से अलग जाकर संसद में हिंदी का जोरदार समर्थन किया। ‘महाकौशल केसरी’ सेठ गोविंद दास साहित्यकार के साथ-साथ सफल राजनेता भी थे। वह 1923 में केंद्रीय सभा के लिए चुने गए। साथ ही 1947 से 1974 तक, जब तक जीवित रहे, कांग्रेस के टिकट पर जबलपुर के सांसद भी रहे। साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें 1961 में भारत के तीसरे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया गया था। 

सेठ गोविंद दास का जन्म जबलपुर के बहुत समृद्ध माहेश्वरी परिवार में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई थी। वह 26-27 साल की उम्र में ही केंद्रीय सभा के लिए चुने गए। सेठ गोविंद दास ने स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा और उन्होंने अपने वैभवशाली जीवन का परित्याग कर दिया। सरकार से बगावत के कारण उन्हें पैतृक संपत्ति से उत्तराधिकार भी गंवाना पड़ा। 

सेठ गोविंद दास ने बहुत कम उम्र से ही साहित्य रचना शुरू कर दी थी। हिंदी में उन्होंने 100 से ज्यादा पुस्तकें लिखीं। उनके लेखन में भारतीय पौराणिक और ऐतिहासिक दृष्टि के साथ सामाजिक दृष्टि का समावेश भी था। सेठ गोविंद दास के साहित्य पर पहला प्रभाव तिलिस्मी उपन्यास चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति के लेखक देवकीनंदन खत्री का पड़ा। चंद्रकाता से प्रभावित होकर ही उन्होंने चंपावती, कृष्णलता और सोमलता जैसे चर्चित उपन्यास लिखे। बाद में अंग्रेजी नाटककार शेक्सपीयर से प्रेरणा लेकर सेठ गोविंद दास ने सुरेंद्र-सुंदरी, कृष्णकामिनी, होनहार और व्यर्थ संदेह नामक उपन्यासों की रचना की। 

सेठ गोविंद दास की साहित्यिक यात्रा उपन्यासों से शुरू हुई। फिर उनकी रुचि कविता में भी जगी। अपने उपन्यासों में भी उन्होंने जगह-जगह काव्य का प्रयोग तो किया ही, अलग से भीवाणासुर-पराभव नाम का काव्य रचा। 1917 में उनका पहला नाटक विश्व प्रेम छपा, जिसका मंचन भी हुआ। सेठ गोविंद दास हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति भी रहे। उन्होंने ‘बिहार राष्ट्रभाषा परिषद’ के नौवें वार्षिकोत्सव में सभापति के रूप में भाषण देते हुए हिंदी विरोधियों की धज्जियां उड़ा दी थीं। वह ऐतिहासिक भाषण आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उस समय था। अपने भाषण में उन्होंने इस विडंबना को रेखांकित किया कि कैसे अपने ही देश में हिंदी को राजभाषा बनाने के लिए याचना करनी पड़ती है। 

अपने कई भाषणों में उन्होंने भारत के शिक्षाविदों, प्रशासकों और नेताओं की इस बात पर भी ऐतराज जताया कि वे अंग्रेजी को ही सर्वस्व मान बैठे हैं। उन्होंने पूरे तर्क के साथ इसका खंडन किया कि अंग्रेजी भारत को जोड़ने वाली भाषा है। हिंदी के अद्वितीय सेवक सेठ गोविंद दास जब तक जीवित रहे, हिंदी के उत्थान में लगे रहे। 

भारत में हिंदी के उत्थान के लिए जिन लोगों ने अपना पूरा जीवन लगा दिया, उनमें सेठ गोविंद दास का नाम अनन्य है। उन्होंने स्वतंत्रता के पहले और बाद में भी हिंदी के उत्थान के लिए काफी काम किया। वह भारत की राजभाषा के रूप में हिंदी के जबर्दस्त समर्थक थे। अपने भाषणों में उन्होंने इस बात को पूरे दमखम के साथ रेखांकित किया कि हिंदी में नए शब्दों के निर्माण की स्वाभाविक क्षमता है।

मुख्य बातेंः

-16 अक्तूबर 1896 को जबलपुर के समृद्ध माहेश्वरी परिवार में उनका जन्म हुआ    
-हिंदी में 100 से ज्यादा पुस्तकों की रचना की, जिनमें उपन्यास, काव्य संग्रह और नाटक तीनों शामिल हैं    
-1923 में सेठ गोविंद दास केंद्रीय सभा के लिए चुने गए, साल 1947 से 1974 तक वह जबलपुर लोकसभा सीट से सांसद रहे    
-स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सभी आंदोलनों में हिस्सा लिया, कई बार जेल भी गए     
-हिंदी के सवाल पर संसद में मजबूती से हिंदी का पक्ष लिया, राजभाषा का दर्जा दिलाने में अहम भूमिका रही 
-1961 में भारत सरकार ने उन्हें देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मभूषण से नवाजा    
-हिंदी में पहले-पहल मोनो ड्रामा उन्होंने ही लिखे, विकास उनका स्वप्न नाटक है तो नवरस उनका नाटय़-रुपक है     
-18 जून 1974 को मुंबई में सेठ गोविंद दास का निधन हो गया

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  • Web Title:seth govind das: most prominent supporter of hindi in indian histroy