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हिंदी दिवस 2018: राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद- हिंदी और देवनागरी लिपि के अस्तित्व की लड़ाई लड़ने वाले

raja shiv prasad

ब्रिटिश हुकूमत में अंग्रेजी और उर्दू के वर्चस्व के बीच हिंदी व देवनागरी लिपि के अस्तित्व की लड़ाई लड़ने वालों में राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। वह हिंदी के समर्थन में उस दौर में उतरे, जब यह खुद को स्थापित करने की जद्दोजहद में जुटी थी। देश में ब्रिटिश राज होने के कारण एक तरफ अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार का अभियान चल रहा था तो दूसरी ओर अदालती और राजकीय कामकाज में उर्दू पसंदीदा भाषा के रूप में उभरने लगी थी। 

बताते हैं कि तब हिंदी के जानकार भी फारसी में किताबें लिखने लगे थे। इससे राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद को देवनागरी लिपि का अस्तित्व खतरे में नजर आने लगा। 1868 में उन्होंने फारसी लिपि के स्थान पर देवनागरी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए लिपि संबंधी प्रतिवेदन ‘मेमोरेंडम कोर्ट कैरेक्टर इन द अपर प्रॉविंस ऑफ इंडिया’ पेश किया। इसे हिंदी के प्रचार-प्रसार की दिशा में उनका पहला उल्लेखनीय प्रयास माना जाता है।

बाद में उन्होंने हिंदी को लोगों के बीच पहुंचाने के लिए ‘बनारस अखबार’ नाम का हिंदी समाचार पत्र निकालने की पहल भी की। हिंदी पाठ्यपुस्तकों के अभाव के बीच इस भाषा को स्कूलों में प्रवेश दिलाने में भी राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद का योगदान बेहद अहम माना जाता है। उन्होंने न सिर्फ साहित्य, इतिहास, भूगोल जैसे विषयों की देवनागरी लिपि में 35 से अधिक किताबें लिखीं, बल्कि दूसरे लेखकों को भी इसके लिए प्रेरित किया। राजा भोज का सपना, आलसियों का कोड़ा, बैताल पच्चीसी, इतिहास तिमिर नाशक उनकी यादगार किताबों में शुमार हैं।

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