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नंबर सत्ताईस

पोट्रेट-सुदर्शन मल्लिक

आनंद प्रकाश जैन को सर्वाधिक ख्याति बाल साहित्यकार और ‘पराग' के संपादक के रूप में मिली, लेकिन वह एक समर्थ कथाकार और उपन्यासकार भी थे। उन्होंने कठपुतली के धागे, तीसरा नेत्र, पलकों की ढाल, तांबे के पैसे और कुणाल की आंखें जैसे ऐतिहासिक उपन्यास लिखे, तो अंतर्मुखी और आठवीं भांवर जैसे उपन्यास लिखकर साबित किया कि सामाजिक विसंगतियों के प्रति भी वे अत्यंत सजग थे। उनके कई कहानी संग्रह भी प्रकाशित हुए। 15 अगस्त 1927 को मुजफ्फरनगर के शाहपुर कस्बे में जन्मे इस महान साहित्यकार के जन्मदिन के बहाने प्रस्तुत है उनके चर्चित उपन्यास घास और फूस का एक रोचक अंश- 

सादे गले का कुरता पहने, सिर पर गांधी टोपी लगाए, पैरों में सफेद लट्ठे का चूड़ीदार पाजामा और कपड़े के सफेद जूते धारण किए और औसत दर्जे का युवक, ऊपर लगे साइनबोर्डों पर नजर डालता हुआ, व्यस्त भाव से चला आ रहा था। जुलाई के आरंभिक दिन थे। वह दिल्ली का चहल-पहल से भरा, लंबा-चौड़ा एक बाजार था और दिल्ली के बाजारों में मनुष्य के जीवन धारण से लेकर त्याग देने तक के प्राय: सभी संस्कारों के सम्पन्न होने की सुविधाएं मिल जाती हैं।

और अंत में उस युवक की दृष्टि एक गली के ऊपर अर्द्धगोलाकार लगे एक साइनबोर्ड पर टिक गई, जिस पर उपर्युक्त नाम के शब्द प्राय: मिट चले थे। उसने चैन की एक सांस ली और गली के भीतर चला गया।

हवेली जैसे एक मकान के फाटक के सामने उसी तरह का एक दूसरा साइनबोर्ड मिला। बाहर स्टूल पर एक वृद्ध पुरुष बैठा था। सिर पर सफेद रंग का दुपट्टा, तन पर खादी का कुरता और पैरों में चमरौधे। युवक जब पास पहुंचा तो वह चूने और तंबाकू के मिश्रण को हथेली पर फटकारकर निचले होंठ के नीचे दबा रहा था।

‘यही सीताचरण कन्या महाविद्यालय है?' युवक ने पूछा। ‘हूं।' वृद्ध ने उत्तर दिया।

‘इस समय प्रिंसिपल साहब मिल सकते हैं?'

‘हूं।' वृद्ध का उत्तर था।

‘तो उनसे मिलवा दो, भैया।'

‘क्यों?' मुंह ऊपर करके खैनी को होंठों से बाहर न निकलने देने का सफल प्रयास करते हुए वृद्ध ने पूछा।

‘उन्होंने एक अध्यापक के लिए समाचार-पत्र में विज्ञापन दिया था। उसी के सिलसिले में मुझे उनसे मिलना है।'

बिना कुछ बोले ही वृद्ध खड़ा हो गया। उस समय उस युवक ने देखा कि उसका शरीर डीलडौल में उससे तिगुना नहीं तो दोगुना जरूर है और उसमें जान भी कम नहीं है। एक बार तेज नजरों से युवक को घूरकर वह भीतर चला गया और युवक ने एक मिनट के लगभग इंतजार किया। फिर वह घुटनों तक खादी की धोती हिलाता हुआ आता दिखाई दिया।

‘चलो', उसने दूर से ही कहा, ‘घंटे भर में तीन बेर खैनी फटकार चुका हूं, मगर मुंह में रखते ही कोई-न-कोई आ टपकता है। अध्यापक बनेंगे। खैनी का सारा मजा किरकिरा हो जाता है। चलो!'

युवक को बड़ा संकोच हुआ। बिना कुछ बोले वह वृद्ध के पीछे-पीछे उस हवेलीनुमा महाविद्यालय की इमारत में घुस गया... सामने प्रिंसिपल का कमरा था... 

‘कहिए, क्या नाम है आपका? कहां से आ रहे हैं आप?' रुखाई से प्रिंसिपल ने पूछा।

‘जी, मेरा नाम रजनीकांत है और मैं अभी तो दिल्ली से ही आ रहा हूं, मगर कल मेरठ से आया था।'

‘हूंऽऽ', कुछ विचारते हुए से प्रिंसिपल महोदय ने ‘हूं' पर लंबा जोर दिया और बोले, ‘तो आपका नाम रजनीकांत है!'

मन-ही-मन युवक घबरा गया। यह प्रश्न इस तरह पूछा गया था मानो रजनीकांत किसी छंटे हुए अपराधी का नाम हो। फिर भी उसने हर प्रश्न का उत्तर देना ही उचित समझा और बोला, ‘जी।'

प्रिंसिपल को गंभीर मुद्रा में देखकर युवक ने फिर कहा,‘जी, एक अध्यापक के लिए जो आवश्यकता महाविद्यालय की ओर से परसों के समाचार-पत्रों में निकली थी, उसके लिए मैं सेवाएं प्रस्तुत करने के लिए आया हूं।'

‘हूं... तो अध्यापक बनना चाहते हैं आप?'

रजनीकांत नाम का वह बेचारा युवक ऊपर से नीचे तक सिहर गया। कुछ क्रोध भी आया। मुंह गरम हो गया। कुछ समझ में नहीं आया कि आखिर किस तरह के आदमी से वास्ता पड़ा है! हर बात दोहराकर पूछता है।

‘क्या पास किया है आपने?' उसकी चिंतनतंद्रा को भंग करते हुए प्रिंसिपल साहब ने पूछा।

‘जी, मैंने केवल बीए, साहित्यरत्न किया है।'

‘हूं...केवल बीए, साहित्यरत्न किया है?'

‘जी।'.

‘हूं! आपको मालूम है कि परसों से अब तक यहां छब्बीस आदमी यह स्थान पाने के लिए आ चुके हैं और आप सत्ताईसवें हैं?'

‘जी नहीं,' युवक ने सफलता की आशा छोड़कर तनिक पक्के शब्दों में कहा, ‘मगर मुझे प्रसन्नता है कि उन छब्बीस व्यक्तियों की अपेक्षा मेरी संख्या उस व्यक्ति के अधिक निकट है, जिसे आप यह स्थान देने का सौभाग्य प्रदान करेंगे।'

‘हूं! और आपको मालूम है कि मैं चालीस साल से लड़कियों को पढ़ाने का काम करता चला आ रहा हूं, सात साल से यहां प्रिंसिपल हूं और आज तक किसी ने मेरा कान पकड़कर यहां से निकाल-बाहर नहीं किया?'

‘जी नहीं, यह भी मालूम नहीं है।' युवक ने कहा, ‘मगर इसके लिए मैं आपको बधाई अवश्य देता हूं।'

‘हूं! बधाई देते हैं आप! आप जानते हैं कि उन छब्बीस आदमियों से मैंने सीधे क्षमा मांग ली है कि मैं उन्हें अपने यहां अध्यापक पद पर नियुक्त नहीं कर सका? उनमें एमए साहित्यरत्न, साहित्याचार्य, शास्त्री आदि अनेक डिग्रियां प्राप्त लोग भी थे। आखिर क्यों? क्या वे आदमी नहीं थे? क्या उन्होंने पढ़ने-लिखने के स्थान पर घास काटी थी?'.

‘जी।'

क्यामतलब? क्या आप यह कहना चाहते हैं कि उन्होंने घास काटी थी?' तमककर प्रिंसिपल साहब ने पूछा।

‘जी, अवश्य काटी होगी, तभी तो आप उन्हें अपने यहां अध्यापक के पद पर नियुक्त नहीं कर सके।' रजनीकांत ने कहा।

‘क्यों जी, आप में ऐसी क्या खूबी है कि आपको इस महाविद्यालय में अध्यापक के पद पर नियुक्त किया ही जाना चाहिए?' प्रिंसिपल साहब ने सधे हुए शब्दों में पूछा।

‘मुझमें?' युवक कुछ घबराकर बोला, ‘जी, मुझमें कोई खास खूबी नहीं है, प्रिंसिपल साहब। अगर होती तो आपकी कुरसी पर मैं होता। अपने बारे में अगर कुछ कहा जा सकता है तो यही कि मैंने यह बीए साहित्यरत्न लड़कियों को पढ़ा-पढ़ाकर ही पास किया है। तरह-तरह की लड़कियों से मेरा वास्ता पड़ा है और शायद मैं औरों की बनिस्बत ज्यादा अच्छी तरह समझ सकता हूं कि लड़कियों को किस तरह पढ़ाया जाता है?'

प्रिंसिपल साहब आंखें फाड़े, गरदन आगे किए युवक की बातें सुनते रहे। उसकी बात खत्म होते ही पूछा, ‘कैसी-कैसी लड़कियों से आपका वास्ता पड़ा है?'

‘हूं!' अब युवक ने प्रिंसिपल साहब का लहजा अपनाते हुए कहा, ‘कैसी-कैसी लड़कियों से मेरा वास्ता पड़ा है? तो समझ लीजिए कि प्रभाकर की एक छात्रा को अपने ट्यूटर के गालों पर चपत लगाने की आदत थी।'

‘ऐं!' प्रिंसिपल साहब सीधे हो गए, ‘अध्यापक के गालों पर चपत लगाने की आदत थी! क्या मतलब?'

‘मतलब यह कि बिलकुल मार ही न देती थी, बल्कि मुंह से कहा करती थी: ‘चांटा लगा दूंगी'। और यह बात वह इस विचित्र मुद्रा से कहती थी कि आप उस पर क्रोध नहीं कर सकते थे। घर के सब बच्चे उससे छोटे थे और वे उसे प्यार से ‘दीदी' कहा करते थे। मां सीधी थी, तो पिता जरूरत से ज्यादा भोले। वह सब पर स्नेहपूर्ण शासन करती थी और बच्चों ने अपनी शैतानियों से ही उसे यह कहने की आदत डाल दी थी। पहले दिन तो कुछ नहीं, मगर उससे अगले दिन से ऐसा लगा मानो कोई बात ही नहीं हुई थी। पर उठते-उठते मैंने उसकी पुस्तकों में सबसे नीचे रखी एक पुस्तक निकालकर देखना चाहा तो उसने उस पर हाथ रखकर मुझे रोक दिया और फिर वही बात कही। कहते ही उसके हाथ ढीले पड़ गए। पुस्तक मैंने देखी। वह एक उपन्यास था: शरत् बाबू का ‘देवदास' और ‘बड़ी बहन'। मैं हंस पड़ा और चला आया।'

‘ऐंऽऽ! हंस पड़े और चले आए! आपने उसके मुंह पर एक तमाचा रसीद नहीं किया?'

‘क्यों? किसलिए?' युवक ने पूछा।.

‘इसलिए कि उसने ऐसी नामाकूल बात कही, जो...जो एक अध्यापक से कभी भी कहनी उचित नहीं... ऐं?'

‘जी नहीं,' युवक ने कहा, ‘मुझे यह जानना बाकी था न कि उस लड़की की जबान पर यह बात क्यों चढ़ गई है, और धीरे-धीरे यह बात मैंने जान ली। दो साल से वह लड़की फेल होती आ रही थी, जबकि एक-न-एक ट्यूटर उसके लिए लगा रहता था। मुझे अनुभव हुआ कि इस लड़की को बड़ा भाई नहीं, बल्कि बेटा बनकर पढ़ाने की जरूरत है।'

‘बेटा बनकर! क्या मतलब?' प्रिंसिपल साहब ने फिर चौंककर पूछा।

युवक हंस पड़ा, फिर बोला, ‘यह जो हमारा देश है, प्रिंसिपल साहब, इसमें अविवाहित लड़कियों के भीतर भी असीम मातृत्व का भाव उत्पन्न हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। उन माताओं को यदि आप बेटा बनकर न पढ़ाएं तो फिर नहीं पढ़ा सकते।' 

‘ओह! नहीं पढ़ा सकते? सचमुच नहीं पढ़ा सकते! अपने चालीस वर्षों में मैंने किसी ऐसी मां को नहीं पढ़ाया। हो सकता है, ऐसी कोई छात्रा मुझे पढ़ाने को मिली हो, मगर...मगर मैं नहीं पहचान सका। बहुत सुंदर! मास्टरजी, बहुत सुंदर!' और इसके साथ ही उन्होंने चिक की तरफ मुंह करके एक गुजरते हुए सज्जन को पुकारा, ‘अरे, भई त्यागीजी, जरा सुनिए तो!'

चिक हटाकर कोट-पतलून पहने एक सज्जन ने भीतर प्रवेश किया। आंखों पर चश्मा नहीं था, मगर वे कुछ मिची-मिची थीं। रंग पक्का, मुंह पर एक मुस्कान, इकहरा बदन, कपड़े अनफिट से, भीतर घुसते ही बोले, ‘आपने बुलाया, प्रिंसिपल साहब?'

‘जी हां, मैंने ही बुलाया है, जनाब। इनसे मिलिए, आप हैं रजनीकांत बाबू, महाविद्यालय के नए अध्यापक।'

रजनीकांत बाबू ने चौंककर प्रिंसिपल साहब को देखा। विश्वास नहीं हुआ कि यह आदमी इतनी जल्दी परास्त हो जाएगा।

त्यागीजी ने सिर से लेकर पैर तक नवीन अध्यापक का निरीक्षण किया और हंसकर बोले, ‘ओह! नंबर सत्ताईस!'

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