वाग्देवी, अंबा या सरस्वती? जिस मूर्ति पर टिका भोजशाला फैसला, वह अभी कहां है; दिलचस्प है कहानी
इस फैसले के केंद्र में जो मूर्ति है, वह भारत में है ही नहीं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है- आखिर यह मूर्ति कहां है? भारत कैसे वापस आएगी? ठीक है, मान लीजिए इन सवालों के जवाब मिल जाते हैं, लेकिन एक दिलचस्प बहस अभी भी बनी हुई है- आखिर ये मूर्ति किस देवी की है?

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भोजशाला को मां वाग्देवी यानी सरस्वती का मंदिर माना है। लेकिन इस फैसले के केंद्र में जो मूर्ति है, वह भारत में है ही नहीं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है- “आखिर यह मूर्ति कहां है?” भारत कैसे वापस आएगी? ठीक है, मान लीजिए इन सवालों के जवाब मिल जाते हैं, लेकिन एक दिलचस्प बहस अभी भी बनी हुई है- “आखिर ये मूर्ति किस देवी की है?” इस मूर्ति को कोई वाग्देवी कहता है, कोई अंबिका और तो कोई मां सरस्वती का रूप मानता है। आखिर यह मूर्ति है किसकी और भोजशाला विवाद में इसकी भूमिका इतनी अहम कैसे हो गई, समझिए पूरी कहानी।
भोजशाला विवाद आखिर क्या है?
कहानी शुरू करने से पहले एक नजर भोजशाला विवाद पर डालते हैं। फैसला आने से पहले तक, हिंदू पक्ष इसे सरस्वती मंदिर मानता रहा है। वहीं मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद मानता रहा। एक तीसरा पक्ष भी है, जो इस परिसर को जैन मंदिर के तौर पर अपना दावा पेश करता रहा। मगर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए इसे मंदिर घोषित कर दिया है। इसके केंद्र में एक मूर्ति है। अब इसी मूर्ति के इर्द-गिर्द बहस जारी है।
- सबसे बड़ा सवाल- यह मूर्ति कहां है?
भोजशाला विवाद के केंद्र में जिस मूर्ति का जिक्र हो रहा है, वह फिलहाल भारत में नहीं बल्कि ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है। बताया जाता है कि 19वीं सदी में अंग्रेजों के शासन के दौरान धार स्थित भोजशाला परिसर में खुदाई हुई थी। हिंदू पक्ष का दावा है कि इसी दौरान यह मूर्ति मिली थी। बाद में इसे इंग्लैंड ले जाया गया।
ब्रिटिश म्यूजियम के रिकॉर्ड के मुताबिक, यह मूर्ति 1886 में लंदन पहुंची थी और 1909 में औपचारिक रूप से म्यूजियम के संग्रह का हिस्सा बनी। करीब चार फीट ऊंची और लगभग 250 किलो वजनी यह प्रतिमा सफेद संगमरमर जैसी पत्थर की बनी हुई है। मूर्ति के नीचे संस्कृत में एक इंस्क्रिप्शन भी मौजूद है, जिसने भोजशाला विवाद को और ज्यादा पेचीदा बना दिया। यही अदालत में बहस का अहम आधार बना।
- वाग्देवी, अंबा या सरस्वती? आखिर कौन सी देवी हैं?
मूर्ति के इंस्क्रिप्शन में विक्रम संवत 1091, यानी करीब 1034-35 ईस्वी का उल्लेख मिलता है। इसमें लिखा है कि राजा भोज से जुड़े एक अधिकारी वररुचि ने पहले “वाग्देवी” की प्रतिमा बनवाई और उसके बाद “अंबा” की एक सुंदर प्रतिमा तैयार करवाई। यहीं से पूरा विवाद शुरू होता है। कुछ इतिहासकारों और हिंदू पक्ष का मानना है कि इंस्क्रिप्शन में जिस “वाग्देवी” का जिक्र है, वही मां सरस्वती की प्रतिमा थी और भोजशाला मूल रूप से सरस्वती मंदिर था। दूसरी तरफ कई विद्वानों और ब्रिटिश म्यूजियम का कहना है कि लंदन में मौजूद प्रतिमा दरअसल जैन देवी “अंबिका” की है, न कि सरस्वती की।
- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मूर्ति को किस देवी का माना
अब सबसे बड़ा सवाल यही बन गया कि इंस्क्रिप्शन में जिन दो नामों- “वाग्देवी” और “अंबा” का जिक्र है, क्या वे दो अलग प्रतिमाएं थीं या फिर एक ही देवी के अलग रूप? मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि “अंबा”, “अंबिका” और “वाग्देवी” को सरस्वती के रूप में देखा जा सकता है। अदालत ने इसी आधार पर माना कि लंदन में रखी प्रतिमा देवी सरस्वती से जुड़ी हुई है। यही इंस्क्रिप्शन भोजशाला फैसले की सबसे अहम कड़ी बन गई।
- क्या मूर्ति लंदन से भारत वापस लौटेगी?
भोजशाला पर आए फैसले के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी यह मूर्ति कभी भारत लौट पाएगी? अदालत ने अपने फैसले में प्रतिमा को वापस लाने का सीधा आदेश तो नहीं दिया, लेकिन इतना जरूर कहा कि इस संबंध में सरकार के पास जो आवेदन और मांगें भेजी गई हैं, उन पर विचार किया जा सकता है।
दरअसल, हिंदू संगठनों और भोजशाला से जुड़े याचिकाकर्ता लंबे समय से यह मांग करते रहे हैं कि मां वाग्देवी या सरस्वती की बताई जाने वाली इस प्रतिमा को भारत वापस लाया जाए और भोजशाला परिसर में स्थापित किया जाए। अदालत में भी इस मुद्दे का जिक्र हुआ था। हालांकि हाई कोर्ट ने यह जिम्मेदारी केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों पर छोड़ दी।
- भाजपा नेता पहले भी मूर्ति वापसी की कर चुके मांग
इस फैसले के बाद अब राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो सकती हैं। भाजपा के कई नेता पहले भी प्रतिमा को वापस लाने की मांग उठा चुके हैं। साल 2022 में शिवराज सिंह चौहान ने भी कहा था कि राज्य सरकार प्रतिमा की वापसी के लिए कोशिशें फिर शुरू करेगी। इससे पहले भारत सरकार की तरफ से यूनेस्को स्तर पर भी प्रतिमा वापसी को लेकर प्रयासों की बात कही जा चुकी है।
फिलहाल भोजशाला परिसर में जिस प्रतिमा की पूजा होती है, वह मूल मूर्ति की रेप्लिका यानी प्रतिकृति बताई जाती है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि असली प्रतिमा अब भी ब्रिटेन में सुरक्षित रखी हुई है। यानी भोजशाला पर अदालत का फैसला आने के बाद भी सबसे बड़ी प्रतीकात्मक लड़ाई अभी बाकी है, क्योंकि ओरिजनल मूर्ति अब भी लंदन में है।
लेखक के बारे में
Ratan Guptaरतन गुप्ता एक डिजिटल हिंदी जर्नलिस्ट/ कॉन्टेंट प्रोड्यूसर हैं। वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान की स्टेट न्यूज टीम के साथ काम कर रहे हैं। वह क्राइम, राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर न्यूज आर्टिकल और एक्सप्लेनर स्टोरीज लिखते हैं।
रतन गुप्ता वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर स्टेट न्यूज टीम में काम करते हैं। इस टीम में हिंदी पट्टी के 8 राज्यों दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात से जुड़ी खबरों की कवरेज करते हैं। उनका लेखन खास तौर से क्राइम, राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित रहता है।
लाइव हिंदुस्तान में बीते 2 साल से काम करते हुए रतन ने ब्रेकिंग न्यूज, राजनीतिक घटनाक्रम और कानून-व्यवस्था से जुड़ी खबरों पर लगातार लेखन किया है। इसके साथ ही वह एक्सप्लेनर स्टोरीज लिखने में भी विशेष रुचि रखते हैं, जहां जटिल मुद्दों को सरल और तथ्यपरक भाषा में पाठकों के सामने रखते हैं।
रतन गुप्ता ने बायोलॉजी में ग्रेजुएशन किया है, जिसके बाद उन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई की है। साइंस बैकग्राउंड होने के कारण उनकी न्यूज और एनालिसिस स्टोरी में साइंटिफिक टेंपरामेंट, लॉजिकल अप्रोच और फैक्ट-बेस्ड सोच साफ दिखाई देती है। वह किसी भी मुद्दे पर रिपोर्टिंग करते समय दोनों पक्षों की बात, मौजूद तथ्यों और आधिकारिक स्रोतों को प्राथमिकता देते हैं, ताकि यूजर तक संतुलित और भरोसेमंद जानकारी पहुंचे।
इसके साथ ही आईआईएमसी की एकेडमिक पढ़ाई ने उन्हें रिपोर्टिंग, न्यूज प्रोडक्शन, मीडिया एथिक्स और पब्लिक अफेयर्स की गहरी समझ दी है। इसका सीधा असर उनके लेखन की विश्वसनीयता और संतुलन में दिखाई देता है।
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