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Hindi News मध्य प्रदेशपक्षकार मुस्लिम नहीं, कोर्ट आए बिना नहीं हो सकता है तलाक; हाई कोर्ट समझाया क्यों ऐसा

पक्षकार मुस्लिम नहीं, कोर्ट आए बिना नहीं हो सकता है तलाक; हाई कोर्ट समझाया क्यों ऐसा

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि पति और पत्नी के बीच आपस में अलगाव के समझौते की कोई कानूनी वैधता नहीं है। कहा कि पक्षकार मुस्लिम नहीं हैं, इसलिए कोर्ट में आए बिना तलाक नहीं हो सकता।

पक्षकार मुस्लिम नहीं, कोर्ट आए बिना नहीं हो सकता है तलाक; हाई कोर्ट समझाया क्यों ऐसा
madhya pradesh court
Subodh Mishraलाइव हिन्दुस्तान,भोपालSun, 02 Jun 2024 10:13 PM
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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि पति और पत्नी के बीच आपस में अलगाव के समझौते की कोई कानूनी वैधता नहीं है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जज जस्टिस गुरपाल सिंह अहलूवालिया की अगुवाई वाली एकल पीठ के समक्ष एक ऐसा मामला आया, जिसमें एक पत्नी द्वारा पति और ससुराल वालों के खिलाफ दर्ज कराए गए एफआईआर को रद्द करने की गुजारिश की गई थी।  

मामले के अनुसार, 21 अप्रैल 2022 में शादी करने के कुछ महीने बाद पत्नी ने आरोप लगाया कि उसे उसके पति और ससुराल वाले दहेज के लिए उसे ताने देते थे। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, पत्नी ने 2023 में एफआईआर दर्ज कराई कि पति और ससुराल वालों की क्रूरता और उत्पीड़न के कारण उसे अपने माता-पिता के साथ रहने को मजबूर होना पड़ रहा है। पुलिस ने पति और ससुराल वालों के खिलाफ आईपीसी की धारा 498-ए, 506 और 34 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत एफआईआर दर्ज की।

इसके बाद पति और उसके माता-पिता ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के समक्ष पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर को चुनौती देते हुए याचिका दायर की। याचिका में बताया गया कि पति और पत्नी के बीच आपसी समझौते के तहत 22 जून 2022 को तलाक हो गया। एफआईआर 20 दिसंबर 2022 को दर्ज की गई। इसलिए उन्होंने चुनौती दी कि एफआईआर दर्ज करने के समय पति और पत्नी के बीच किसी तरह का कोई संबंध नहीं था। याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में यह भी कहा कि पत्नी ने सहमति व्यक्त की थी कि वह आवेदक के खिलाफ कोई न्यायिक कार्रवाई नहीं करेगी।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जज जस्टिस गुरपाल सिंह अहलूवालिया ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की इस दलील पर भरोसा नहीं किया जा सकता कि दोनों पक्षों ने अलग-अलग तलाक के लिए समझौता किया है। कोर्ट ने कहा कि अलगाव के समझौते की कानून की नजर में कोई पवित्रता नहीं है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि दोनों पक्षों के बीच कोई तलाक हुआ है। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि यदि कोई तलाक हुआ भी है तो भी तलाक से पहले शिकायतकर्ता के साथ की गई क्रूरता के संबंध में आईपीसी की धारा 498-ए के तहत एफआईआर दर्ज की जा सकती है, लेकिन वर्तमान मामले में ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं हुई, क्योंकि दोनों पक्षों के बीच कोई तलाक नहीं हुआ।

कोर्ट ने उल्लेख किया कि पक्षकार धर्म से मुस्लिम नहीं हैं, इसलिए न्यायालय में आए बिना आपसी सहमति से तलाक नहीं हो सकता। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के वकील द्वारा उठाए गए तर्क को भी उल्लेखित किया, जिसमें कहा गया कि पत्नी ने कोई न्यायिक कार्रवाई नहीं करने पर सहमति व्यक्त की थी। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए इसे गलत और अनुबंध अधिनियम की धारा 28 के प्रावधानों के विपरीत बताया।

कोर्ट ने कहा कि वह किसी व्यक्ति को कानूनी कार्रवाई करने से रोकने के लिए विशिष्ट राहत अधिनियम की धारा 41 के तहत कोई निषेधाज्ञा नहीं दे सकता। कोर्ट ने पाया कि एफआईआर में लगाए गए आरोपों सहित मामले के सभी प्रासंगिक तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हस्तक्षेप करने के लिए कोई सबूत नहीं है। कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।