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Hindi News मध्य प्रदेशचीतों के खाने पर किचकिच; कूनो में हड़ताल पर कर्मचारी, धार्मिक मान्यताएं आ रहीं आड़े

चीतों के खाने पर किचकिच; कूनो में हड़ताल पर कर्मचारी, धार्मिक मान्यताएं आ रहीं आड़े

धार्मिक मान्यताओं का हवाला देते हुए ट्रैकर्स की ड्यूटी पर तैनात किए गए ग्रामीणों ने जानवरों को मारने के मुद्दे पर समझौता करने से इनकार कर दिया है। साथ ही उन्होंने अपने लिए बीमे की मांग की है।

चीतों के खाने पर किचकिच; कूनो में हड़ताल पर कर्मचारी, धार्मिक मान्यताएं आ रहीं आड़े
cheetahs at kuno national park
Sourabh Jainलाइव हिंदुस्तान,भोपालTue, 18 Jun 2024 05:13 PM
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मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित चीतों के घर यानी कूनो नेशनल पार्क में इन दिनों स्थिति थोड़ी तनावपूर्ण चल ही है। दरअसल चीतों की निगरानी और उन्हें ट्रैक करने के लिए नौकरी पर रखे गए करीब 30 ग्रामीणों ने हड़ताल करते हुए काम बंद कर दिया है। उनका कहना है कि वे चीतों को देने के लिए खुद किसी जानवर को नहीं मारेंगे, साथ ही उन्होंने अपने लिए बीमा सुरक्षा की मांग भी की है। इस मामले को लेकर वे सीएम ऑफिस से भी सम्पर्क कर चुके हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार पार्क के आसपास के इलाके की बेहतर समझ होने की वजह से इन ग्रामीणों को जो कि ज्यादातर ग्रामीण यादव और गु्र्जर समुदाय से हैं, को नौकरी पर रखा गया था, और अब इन्होंने अपनी धार्मिक मान्यताओं का हवाला देते हुए चीतों को देने के लिए बकरों और भैंसों को मारने से मना कर दिया है। साथ ही उन्होंने कथित तौर पर इसके लिए पार्क अधिकारियों द्वारा दिए जाने वाले प्रशिक्षण को भी लेने से इनकार कर दिया है।

कर्मचारियों की इस अप्रत्याशित हड़ताल ने चीतों की निगरानी करने के लिए बनी इस योजना को अटका दिया है। जिसके चलते पार्क के अधिकारी फिलहाल इस समस्या का वैकल्पिक समाधान खोजने के लिए प्रयास कर रहे हैं, वे टेंडर के माध्यम से लाइसेंस प्राप्त विक्रेताओं से पहले से कटे हुए मांस की खरीद को आउटसोर्स करने पर विचार कर रहे हैं। 

ट्रैकर्स को करीब 9000 रुपए महीना तनख्वाह मिलती है, और वे अलग-अलग शिफ्ट में काम करते हैं। ग्रामीण अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। उनके प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कार्यालय से संपर्क किया और मुख्यतः दो मांगों को लेकर हस्तक्षेप करने को कहा। वे बीमा कवरेज और जानवरों को मारने की जिम्मेदारी से मुक्ति चाहते हैं। हालांकि वे मुख्यमंत्री से नहीं मिल सके, लेकिन उनके ओएसडी एसके तिवारी के सामने अपनी बात रखने में सफल रहे। जिसके बाद उन्होंने संबंधित अधिकारियों से इस मामले में आगे पूछताछ की है।

इस बारे में जानकारी देते हुए एक अधिकारी ने बताया कि 'ट्रैकर्स ने काम करना बंद कर दिया है और वे चार दिन पहले कूनो आ गए। पार्क या वन्यजीव मुख्यालय के सामने इस मुद्दे को उठाने की बजाय वे मांग को लेकर सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय चले गए।' हड़ताल से चीतों पर पड़ने वाले असर को लेकर उन्होंने कहा, 'वर्तमान में, अधिकांश चीते सुरक्षित बाड़ों में हैं और हमारे मौजूदा कर्मचारी उनका प्रबंधन कर सकते हैं। ग्रामीणों की अनुपस्थिति चीता ट्रैकिंग और निगरानी को ज्यादा प्रभावित नहीं करेगी।'

इस बारे में टीओआई से बात करते हुए एक ट्रैकर ने कहा, 'हम हड़ताल पर हैं और पार्क अधिकारियों से कोई जवाब नहीं मिला है। हमारी मांगें स्पष्ट हैं कि हम चीतों को देने के लिए जानवरों को नहीं मार सकते। इसके अलावा पार्क में अपने काम से जुड़े किसी भी खतरे से बचने के लिए हम व्यापक बीमा चाहते हैं, जिसमें जंगली जानवरों से मुठभेड़ या ट्रैकिंग गतिविधियों के दौरान लगी चोटें शामिल हैं और उनकी मुख्य आपत्ति चीते को खिलाने के लिए जानवरों को मारने और काटने से है।' वैसे ग्रामीणों ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं हो जातीं, वे काम पर नहीं लौटेंगे।