बेटे की हत्या के आरोप में जेल गई थी मां, MP हाई कोर्ट से मिली बड़ी राहत; अब दोषमुक्त
गुना में बेटे हत्या के आरोपों पर दर्ज एफआईआर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने गुना सीजेएम कोर्ट द्वारा मां पर हत्या और सबूत छुपाने के मामले में लिए गए संज्ञान को भी रद्द कर दिया है।

मध्य प्रदेश के गुना में अपने बेटे अभ्युदय की हत्या के आरोपों सजा काट रही माँ अलका जैन को लेकर हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। बेटे हत्या के आरोपों पर दर्ज एफआईआर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने गुना सीजेएम कोर्ट द्वारा मां पर हत्या और सबूत छुपाने के मामले में लिए गए संज्ञान को भी रद्द कर दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा है कि बिना ठोस सबूत के आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्याय का उल्लंघन है। इस आदेश के बाद अलका जैन अपने बेटे की हत्या के आरोपों से पूरी तरह से मुक्त हो गई हैं।
क्या था पूरा मामला
14 साल के अभ्युदय जैन का शव 14 फरवरी 2025 को घर के बाथरूम में मिला था। पुलिस ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर उसकी मां अलका जैन को हत्या का आरोपी माना था। 22 फरवरी को इस मामले में कोतवाली थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। 8 मार्च को पुलिस ने अलका जैन को गिरफ्तार किया और 17 जून को उन्हें जमानत मिली थी।
IG के निर्देश पर हुआ था SIT का गठन
अभ्युदय के पिता अनुपम जैन पुलिस की शुरुआती पड़ताल से संतुष्ट नहीं थे, जिसके बाद आईजी के निर्देश पर शिवपुरी डीएसपी अवनीत शर्मा के नेतृत्व में एक एसआईटी बनाई गई थी। एसआईटी ने भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों से मेडिको लीगल राय मांगी, जिसमें यह सामने आया कि अभ्युदय की मौत फांसी पर लटकने से हुई थी। इसी आधार पर एसआईटी ने मां अलका को बेकसूर मानते हुए 5 मई को कोर्ट में अपनी खारिजी रिपोर्ट पेश की थी।
SIT की रिपोर्ट हो गई थी निरस्त
9 मई 2025 को गुना की सीजेएम मधुलिका मुले ने एसआईटी की रिपोर्ट को निरस्त कर दिया था। कोर्ट ने खुद ही मामले में हत्या और साक्ष्य छुपाने की धाराओं में संज्ञान लेते हुए अलका जैन के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने का आदेश दिया था। इसी आदेश के खिलाफ अलका जैन ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी, जिस पर 9 फरवरी को सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने मंगलवार को कहा तथ्यों को देखते हुए कहा कि यह स्पष्ट है कि निचली अदालत के निष्कर्ष अनुमानों और अटकलों पर आधारित हैं, न कि कानूनी रूप से मान्य और निर्णायक साक्ष्यों पर। उपरोक्त तथ्यों और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के मद्देनजर, न्यायालय का यह मत है कि किसी भी ठोस सबूत के अभाव में और एसआईटी रिपोर्ट और अंतिम रिपोर्ट में याचिकाकर्ता को दोषमुक्त किए जाने के बावजूद, उसके विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही जारी रखना विधि का दुरुपयोग होगा और न्याय का उल्लंघन होगा।
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