1917 में एक भारतीय से लिया कर्ज चुकाएंगे अंग्रेज! MP के शख्स ने UK से मांगा अपना पैसा
मध्य प्रदेश के सीहोर में रहने वाले विवेक रूठिया के दादा ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेश भारतीय सरकार को 35000 रुपये कर्ज दिया था। देश आजाद होने के बाद इस कर्ज को चुकाए बिना ही अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए थे। इस लोन के दावे पर अब ब्रिटेन सरकार की तरफ से जवाब आया है।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेश भारतीय सरकार को कर्ज देने वाले मध्य प्रदेश के सीहोर निवासी रूठिया परिवार के दावे पर 5 महीने बाद ब्रिटेन सरकार की ओर से 5 महीने बाद पहला ऑफिशियल जवाब आ गया है। यह जवाब यूके के 'डेब्ट मैनेजमेंट ऑफिस' (DMO) से भेजा गया है। 63 वर्षीय विवेक रूठिया हाल ही में ब्रिटिश भारत के 109 साल पुराने 'वॉर लोन सर्टिफिकेट' की वजह से चर्चा में आए थे। उनके दादा ने यह कर्ज अंग्रेजों को दिया था।
द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटिश सरकार द्वारा पहले विश्व युद्ध के दौरान सैन्य खर्चों के लिए 'वॉर लोन सर्टिफिकेट' जारी कर कारोबारियों और अमीर नागरिकों से पैसे जुटाए गए थे। इसके बदले उन्हें निश्चित रिटर्न का वादा किया गया था। 1917 के इंडियन वॉर लोन के बदले उन्हें 5.5% की ब्याज दर मिलती थी। रूठिया परिवार ने 4 जून 1917 का जारी किए गए इस वॉर लोन सर्टिफिकेट को एक सदी से भी अधिक समय तक संभाल कर रखा है।
यह अब पैसों का नहीं अब ईगो का मामला : विवेक रूठिया
विवेक रूठिया ने बताया कि हाल ही में यह मामला ब्रिटिश अधिकारियों के ध्यान में लाया गया था। इस पर अब उनके वकील को एक ईमेल मिला, जिसमें ओरिजिनल लोन सर्टिफिकेट और उससे जुड़ी बातचीत की कॉपी मांगी गई है। रूठिया ने कहा, "मैं बहुत खुश हूं, मैंने कभी नहीं सोचा था कि इतने लंबे समय बाद मेरे दावे पर कोई जवाब आएगे। मुझे उम्मीद है कि यह मामला अब किसी तार्किक नतीजे पर पहुंचेगा। अब यह पैसे की बात नहीं रही बल्कि अब यह ईगो का मामला है।''
रूठिया परिवार ने 'वॉर लोन' में 35000 रुपये किए थे इन्वेस्ट
इस वॉर लोन सर्टिफिकेट के मुताबिक, भोपाल की पूर्व रियासत में 'सेठ रामा किशन जसकरण रूठिया' फर्म के सेठ जुम्मा लाल रूठिया ने पहले विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश भारतीय सरकार द्वारा जारी 'इंडियन वॉर लोन' में 35,000 रुपये इन्वेस्ट किए थे। 4 जून 1917 को जारी इस सर्टिफिकेट पर भोपाल में तत्कालीन पॉलिटिकल एजेंट डब्ल्यूएस डेविस के साइन हैं। इन्वेस्टमेंट के करीब दो दशक बाद 1937 में विवेक रूठिया के दादा सेठ जुम्मा लाल रूठिया का निधन हो गया था, जबकि इसके एक दशक बाद देश आजाद होने पर अंग्रेज भी भारत छोड़कर चले गए थे।
बता दें कि, विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई थी और सरकार के लिए युद्ध और सैन्य खर्च उठा पाना भी मुश्किल हो गया था। इसका हल निकालने के लिए कारोबारियो और अमीर परिवारों से कर्ज लिए थे।


