1942 में ही मस्जिद दी, भोजशाला के नाम पर बार-बार नमाज की जगह मांगना गलत; किसने कहा?
सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम फैसले का स्वागत करते हुए भोजशाला मुक्ति यज्ञ के संयोजक गोपाल शर्मा ने 1942 की एक ऐसी कहानी का जिक्र किया है जिससे विवाद को लेकर एक नई चर्चा छिड़ने की संभावना है। विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ें यह रिपोर्ट…

भोजशाला परिसर के 300 मीटर के दायरे के बाहर नमाज के लिए जगह देने की अपील करते हुए भोजशाला मुक्ति यज्ञ के संयोजक गोपाल शर्मा ने बुधवार को एक ऐसी कहानी सुनाई जिसका जिक्र आम तौर पर नहीं किया जाता है। गोपाल शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम फैसले का स्वागत किया लेकिन यह भी कहा कि भोजशाला के नाम पर बार-बार नमाज के लिए जगह की मांग करना उचित नहीं है। मुस्लिम पक्ष को तो 1942 में ही भोजशाला से बाहर नमाज के लिए मस्जिद दी गई थी।
भोजशाला मुक्ति यज्ञ के संयोजक गोपाल शर्मा ने जिला प्रशासन से अपील है कि वे ऐसा इंतजाम करें जिससे भोजशाला परिसर के 300 मीटर के दायरे के बाहर नमाज पढ़ी जाए। भोजशाला परिसर से आशय 300 मीटर के दायरे में आने वाला पूरा इलाका है। उस 300 मीटर के दायरे के बाहर कहीं भी नमाज पढ़ी जा सकती है। हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं। मेरा मानना है कि हाई कोर्ट ने 15 मई को जो फैसला सुनाया था सर्वोच्च अदालत ने मूल रूप से उसको ही दोहराया है।
भोजशाला में फिर से नमाज क्यों शुरू किया?
ऐतिहासिक घटनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने दावा किया कि 1935 में भोजशाला परिसर के अंदर नमाज पढ़ी जाती थी लेकिन 1938 में तत्कालीन प्रशासन ने इसे रोक दिया था। बाद में 1942 में मस्जिद बनाने के लिए जमीन दी गई थी। यदि नमाज के लिए बाहर व्यवस्था पहले ही कर दी गई थी तो मुस्लिम पक्ष ने भोजशाला के भीतर फिर से नमाज पढ़ना क्यों शुरू किया? वे अब इसके नाम पर दूसरी जगह क्यों मांग रहे हैं?
1942 में दी थी मस्जिद
भोजशाला मुक्ति यज्ञ के संयोजक गोपाल शर्मा ने कहा कि 1942 में धार रियासत के तत्कालीन शासक ने मुस्लिम पक्ष को नमाज पढ़ने के लिए बख्तवार मार्ग पर एक मस्जिद दी थी। यह वहीं मस्जिद है जिसको आज रहमत मस्जिद के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण भोजशाला से बाहर ही नमाज के लिए किया गया था। लेकिन मस्जिद देने के बावजूद वे लोग बार-बार भोजशाला में ही नमाज के लिए चले आते हैं।
भोजशाला के नाम पर बार-बार जगह मांगना गलत
गोपाल शर्मा ने यह भी कहा कि मैं जिला प्रशासन से गुजारिश करता हूं कि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान करें और उनके लिए भोजशाला परिसर के 300 मीटर के दायरे के बाहर कहीं भी नमाज पढ़ने की व्यवस्था करें। हम नमाज पढ़ने के खिलाफ नहीं हैं लेकिन बार-बार भोजशाला परिसर में ही नमाज अदा करने से मंदिर का अपमान होता है। यही नहीं भोजशाला के नाम पर हर बार दूसरी जगह की मांग करना भी गलत है।
कमाल मौला मस्जिद तो जुमा मस्जिद है…
वहीं कमाल मौला मस्जिद नमाज इंतजामिया कमेटी के अध्यक्ष जुल्फिकार पठान ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने केवल एक अंतरिम राहत दी है। सबको सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने गोपाल शर्मा के बयान पर कहा कि जहां तक रहमत मस्जिद की बात है तो हर इलाके में एक मस्जिद होती है जहां दिन में 5 वक्त नमाज पढ़ी जाती है। कमाल मौला मस्जिद तो जुमा मस्जिद है जहां हम जुमे की नमाजं पढ़ते थे।
मामले पर सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले की समीक्षा करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अंतरिम उपाय के तौर पर मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच नमाज पढ़ने के लिए परिसर से सटी एक अलग खुली जगह दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में यह भी कहा था कि ASI उसकी मंजूरी के बिना विवादित परिसर में कोई बदलाव नहीं करेगा।
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Krishna Bihari Singhकृष्ण बिहारी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और स्टेट टीम का हिस्सा (दिल्ली-NCR, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान और गुजरात )
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