
इंदौर में दूषित जल कांड पर HC सख्त, सरकार ने माना अब तक 16 की मौत
इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल से हुई मौतों को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर मंगलवार को हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में सुनवाई हुई।
इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल से हुई मौतों को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर मंगलवार को हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत के सामने यह स्वीकार किया कि अब तक दर्ज 28 मौतों में से 16 मौतें दूषित पानी से जुड़ी पाई गई हैं। इस के बाद हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए विस्तृत और निष्पक्ष जांच के निर्देश दिए। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की पीठ ने कहा कि यह साफ किया जाना आवश्यक है कि शेष मौतों के पीछे क्या कारण रहे और उन्हें दूषित पानी से अलग क्यों माना गया। अदालत ने अगली सुनवाई में प्रत्येक मौत से जुड़ा विस्तृत आधार और प्रमाण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।
'लगातार शिकायतें चिंताजनक'
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि भागीरथपुरा से लगातार आ रही दूषित पानी की शिकायतें अत्यंत चिंताजनक और अलार्मिंग हैं। साथ ही यह भी संज्ञान लिया गया कि महू सहित अन्य क्षेत्रों से भी गंदे पानी की शिकायतें सामने आ रही हैं। पीठ ने दो टूक कहा कि नागरिकों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना शासन की मूल जिम्मेदारी है और इसमें किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार्य नहीं है। हाईकोर्ट ने शासन द्वारा पेश की गई रिपोर्ट पर असंतोष जताते हुए उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए।
अदालत ने निर्देश दिए कि रिपोर्ट को प्रमाणित करने के लिए अधिक ठोस, वैज्ञानिक और प्रामाणिक दस्तावेज पेश किए जाएं। न्यायमूर्ति शुक्ला ने यह भी पूछा कि अंतरिम राहत के रूप में गठित समिति अपने सुझावों को निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से कैसे लागू करेगी।
‘वर्बल ऑटोप्सी’ पर आपत्ति
कोर्ट ने रिपोर्ट में उपयोग किए गए वर्बल ऑटोप्सी शब्द पर भी आपत्ति दर्ज की। पीठ ने कहा कि इस प्रक्रिया की चिकित्सकीय और विधिक मान्यता संदिग्ध है। अदालत के अनुसार रिपोर्ट में मौतों के कारण स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं हैं और तर्कों के समर्थन में पर्याप्त सामग्री भी नहीं है।
रिपोर्ट --हेमंत





