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50 साल से हक की गुहार लगा रहीं विधवा के लिए ₹33 की पेंशन ही सहारा

50 साल से हक की गुहार लगा रहीं विधवा के लिए ₹33 की पेंशन ही सहारा

संक्षेप:

मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक 79 साल की बुजुर्ग महिला के साथ तारीख पर तारीख की हैरान करने वाली घटना देखने को मिली है। महिला ने हक की लड़ाई के लिए अपने जीवन के कीमती 50 साल गवां दिए फिर भी उनको हक नहीं मिल पाया है।

Oct 30, 2025 11:06 pm ISTKrishna Bihari Singh लाइव हिन्दुस्तान, ग्वालियर
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मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक 79 साल की बुजुर्ग महिला के साथ तारीख पर तारीख की हैरान करने वाली घटना सामने आई है। महिला ने हक की लड़ाई के लिए अपने जीवन के कीमती 50 साल गवां दिए लेकिन फिर भी उसे उसका हक नहीं मिल पाया है। ग्वालियर की मिथिलेश श्रीवास्तव आधी सदी से अपनी पेंशन के लिए लड़ रही हैं। मिथिलेश को अदालत से तारीखें, समन और खोखले भरोसे के अलावा कुछ नहीं मिला है।

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बता दें कि 79 साल की मिथिलेश श्रीवास्तव के पति शंकरलाल श्रीवास्तव ने 23 साल तक मध्य प्रदेश पुलिस में सेवाएं दी। नवंबर 1971 में शंकरलाल श्रीवास्तव ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया था 1985 में उनका निधन हो गया। इसके बाद उनकी विधवा मिथिलेश ने अपने पति की पेंशन, ग्रेच्युटी और रिटायरमेंट लाभों का दावा किया। लेकिन विभाग से उनको बड़ा धोखा मिला। विभाग में उनका माला लटक गया।

एनडीटीवी इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, विभाग के जवाब के लिए मिथिलेश ने काफी इंतजार किया। थक-हार कर उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने ​​2005 में सिविल कोर्ट से जीत हासिल की। इस फैसले के बाद भी विभाग की लापरवाही बरकरार रही। विभाग की ओर से उनको भुगतान नहीं किया गया। विभाग पेचीदगियों और गायब दस्तावेजों का हवाला देकर उनके मामले को लटकाए रखा।

मिथिलेश के लिए न्याय की लड़ाई काफी लंबी चली। आखिरकार यह मामला जब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच के सामने आया तो जज भी हैरान रह गए। मामले में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति ने तंज कसते हुए सरकारी वकील से कहा कि ये केस तो हमारी और आपकी उम्र से तो बड़ा है। यह सुनिश्चित करें कि इस मामले में अब और देरी ना हो। अदालत ने अगली तारीख नवंबर के दूसरे हफ्ते की दी है।

आलम यह इतनी लंबी लड़ाई के लिए उनके बुढापे की केवल 33 रुपये प्रति माह की अस्थायी पेंशन ही सहारा रही है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि नवंबर तक निर्देश का पालन नहीं किया जाता तो श्योपुर के पुलिस अधीक्षक को देरी के बारे में स्पष्टीकरण देने के लिए कोर्ट में हाजिर होना पड़ेगा। अदालत के लहजे में उस व्यवस्था के प्रति गहरी निराशा झलक रही थी। 50 सालों के इस संघर्ष में सरकारें और पीढ़ियां बीत गईं लेकिन मिथिलेश को इंसाफ नहीं मिला।

Krishna Bihari Singh

लेखक के बारे में

Krishna Bihari Singh
पत्रकारिता में करीब 14 वर्षों से केबी उपनाम से पहचान रखने वाले कृष्ण बिहारी सिंह लाइव हिन्दुस्तान में कार्यरत हैं। वह लोकमत, राष्ट्रीय सहारा, अमर उजाला और दैनिक जागरण अखबार में विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं। उन्होंने साल 2019 में जागरण डॉट कॉम से डिजिटल मीडिया में कदम रखा। मूलरूप से यूपी के मऊ जिले से ताल्लुक रखने वाले केबी महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली में पत्रकारिता कर चुके हैं। लॉ और साइंस से ग्रेजुएट केबी ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में एमफिल किया है। वह भारतीय राजनीति और वैश्विक मामलों के साथ जन सरोकार और क्राइम की खबरों पर पैनी नजर रखते हैं। और पढ़ें
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