भोजशाला का संघर्ष; खाईं लाठियां, जेल भी गए, कौन हैं अशोक जैन और 95 साल के विमल गोधा?
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा भोजशाला को वाग्देवी मंदिर मानने के फैसले से आंदोलनकारियों में भारी खुशी है। 11वीं सदी से जुड़े इस विवाद में 95 वर्षीय विमल गोधा समेत कई योद्धाओं ने लाठीचार्ज और गिरफ्तारियां झेलीं। इस रिपोर्ट में विमल गोधा की कहानी…

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा भोजशाला को वाग्देवी मंदिर मानने के फैसले से आंदोलनकारियों में भारी खुशी है। इस आंदोलन से जुड़े 95 वर्षीय योद्धा विमल गोधा और अशोक जैन ने अपने पुराने संघर्षों को याद किया। उन्होंने बताया कि कैसे 1993 से 2003 के बीच पुलिस लाठीचार्ज, गिरफ्तारियों और पाबंदियों के बावजूद उन्होंने संघर्ष जारी रखा। 11वीं सदी में राजा भोज द्वारा निर्मित यह स्थल संस्कृत शिक्षा और मां सरस्वती का केंद्र था जो बाद में विवादित हो गया। वर्तमान में कानूनी लड़ाई जीतने के बाद अब आंदोलनकारियों का मुख्य लक्ष्य लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम से मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा को वापस भारत लाना है।
पांचवीं कक्षा से भोजशाला से जुड़ाव
95 वर्षीय विमल गोधा की आंखों में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच के फैसले को लेकर अलग ही चमक दिखाई दी। उन्होंने कहा कि मेरी जिंदगी में ही अदालत का बड़ा फैसला आ गया है। मेरे लिए यह बड़े सौभाग्य की बात है। उन्होंने और उनके साथियों ने भोजशाला को एक मंदिर साबित करने के लिए बहुत लंबी लड़ाई लड़ी है। गोधा उन लोगों में शामिल हैं जिन्होंने भोजशाला को मां सरस्वती यानी वाग्देवी का मंदिर मानने के लिए संघर्ष किया था। इस आंदोलन में 'भोज उत्सव समिति' ने बहुत काम किया और इसके संरक्षक अशोक कुमार जैन ने ही भोजशाला में हनुमान चालीसा पढ़ना शुरू करवाया था।
दिग्विजय सिंह की सरकार में हुआ था टकराव
विमल गोधा बताते हैं कि मैंने खूब अत्याचार झेला। मैं 5वीं कक्षा से भोजशाला जा रहा हूं और आज भी हर मंगलवार आरती में शामिल होता हूं। वर्ष 1993 से 2003 के बीच दिग्विजय सिंह की अगुवाई वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार और आंदोलनकारियों के बीच लगातार टकराव की स्थिति बनी रही। उस दौरान धारा-144 लागू करना, एहतियाती गिरफ्तारियां करना और बाहरी संतों के प्रवेश पर रोक लगाना आम बात थी। शांति भंग करने के आरोप में बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं पर कई मामले दर्ज किए गए थे।
2003 के लाठीचार्ज को किया याद
विमल गोधा ने वर्ष 2003 की बसंत पंचमी को याद करते हुए कहा कि उस दिन भारी पुलिस फोर्स तैनात की गई थी। आंदोलनकारी भोजशाला में पूजा करना चाहते थे लेकिन उन्हें रोक दिया गया। अलग-अलग रास्तों से भोजशाला पहुंचने के लिए चार समूह बनाए गए थे। इस आंदोलन में महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और लाठीचार्ज का सामना किया। आंदोलन के बाद हिंदुओं को हर मंगलवार भोजशाला में आरती की अनुमति मिली थी।
बसंत पंचमी मनाने पर भी होने लगता था बवाल
भोजशाला के योद्धा के तौर पर पहचान रखने वाले अशोक कुमार जैन ने बताया कि वह 1965 से आंदोलन से जुड़े हैं। बचपन में स्कूल से सीधे भोजशाला पहुंच जाते थे। उस दौर में पूजा और बसंत पंचमी मनाने पर भी विवाद की स्थिति बन जाती थी। अशोक जैन के अनुसार, साल 1992 में साध्वी ऋतंभरा के आह्वान के बाद भोजशाला में हर मंगलवार हनुमान चालीसा पाठ शुरू किया गया। बाद में इस पर रोक लगने के बाद आंदोलन और तेज हो गया।
लाठीचार्ज में महिलाओं पर भी हुए थे हमले
अशोक जैन 2003 के लाठीचार्ज को याद करते हुए वे बताते हैं कि उस दिन बसंत पंचमी थी। हम भोजशाला में पूजा करना चाहते थे लेकिन दिग्विजय सिंह की सरकार ने हमें रोकने के लिए फोर्स लगा दी। हमने चार टीमें बनाईं ताकि अलग-अलग रास्तों से भोजशाला में किसी तरह दाखिल हो सकें। लेकिन पुलिसकर्मियों ने लाठीचार्ज कर दिया। पुलिस ने महिलाओं को भी नहीं छोड़ा। इस आंदोलन और हिंदू समाज के आक्रोश का ही नतीजा था कि हिंदुओं को हर मंगलवार को भोजशाला में आरती करने की मंजूरी मिली। 4 अप्रैल 2003 को एएसआई के आदेश के बाद नियमित पूजा-अर्चना का रास्ता खुला।
रिपोर्ट- हेमंत
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