भोजशाला सरस्वती मंदिर है, मस्जिद नहीं; MP हाई कोर्ट में हिंदू पक्ष की बड़ी जीत, अब नहीं होगी नमाज
मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने धार के भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर की धार्मिक प्रकृति के विवाद के मामले में शुक्रवार को फैसला सुनाया दिया है। 12 मई को अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।

मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने धार के भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर विवाद के मामले में शुक्रवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि भोजशाला परिसर वाग्देवी सरस्वती का मंदिर है। मुस्लिम पक्ष के कमाल मौला मस्जिद के दावे को खारिज करते हुए धार में ही मस्जिद के लिए जमीन आवंटन का फैसला सरकार पर छोड़ दिया है।
जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और आलोक अवस्थी की बेंच ने मुस्लिम पक्ष की मांग खारिज करते हुए कहा, 'ढांचे की धार्मिक प्रकृति मंदिर की है और मुस्लिम मस्जिद के लिए वैकल्पिक स्थान के लिए आवेदन कर सकते हैं।'अदालत ने कहा कि विवादित भोजशाला कॉम्पलेक्स और कमाल मौला मस्जिद संरक्षित स्मारक है और परिसर की धार्मिक प्रकृति वाग्देवी सरस्वती मंदिर की है।' हाई कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार और एसआई भोजशाला मंदिर के प्रशासन और प्रबंधन पर फैसला ले।
अदालत ने कहा- यहां मंदिर और संस्कृत अध्ययन केंद्र था
अदालत ने पाया कि इस स्थल पर देवी सरस्वती का मंदिर था और ऐतिहासिक साहित्य इस स्थल को संस्कृत अध्ययन केंद्र के रूप में स्थापित करते हैं। बेंच ने कहा, 'श्रद्धालुओं को मूलभूत सुविधाएं, उचित कानून व्यवस्था और देवता की पवित्रता और निर्मल स्वरूप का संरक्षण संवैधानिक कर्तव्य है। हमने पाया है कि इस स्थल पर हिंदू पूजा-अर्चना की निरंतरता समय के साथ कभी समाप्त नहीं हुई है। ऐतिहासिक साहित्य विवादित क्षेत्र की प्रकृति संस्कृत अध्ययन केंद्र की बताते हैं तो पुरातात्विक संदर्भ देवी सरस्वती के मंदिर के अस्तित्व की ओर संकेत करते हैं।'
ASI का 2003 वाला आदेश रद्द
अदालत ने कहा कि आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया का 2003 का आदेश रद्द किया जाता है जिसके तहत हिंदुओं के पूजा के अधिकार को प्रतिबंधित किया गया था और मुस्लिम समुदाय को नमाज पढ़ने की इजाजत दी गई थी। हाई कोर्ट की इंदौर बेंच के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने इस मामले से संबंधित पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर 6 अप्रैल से नियमित सुनवाई शुरू की थी। सभी पक्षों को सुनने के बाद 12 मई (मंगलवार) को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
हिंदू, मुस्लिम और जैन का दावा
धार की भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता था। जैन समुदाय के एक याचिकाकर्ता ने विवादित परिसर में मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल होने का दावा किया था।
विस्तृत सुनवाई में दस्तावेजों और सबूतों पर विचार
हाई कोर्ट ने विवादित स्मारक से जुड़े अलग-अलग धार्मिक विश्वासों, ऐतिहासिक दावों, कानूनी प्रावधानों की जटिलताओं के साथ ही हजारों दस्तावेजों की पृष्ठभूमि में सुनवाई की है। सुनवाई के दौरान हिंदू, मुस्लिम और जैन समुदायों के याचिकाकर्ताओं ने विस्तृत दलीलें पेश कीं और स्मारक में अपने-अपने समुदाय के लोगों के लिए उपासना का विशेष अधिकार मांगा है। यह स्मारक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित है।
एएसआई ने क्या किया था दावा
एएसआई ने स्मारक के वैज्ञानिक सर्वेक्षण के बाद 2,000 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट में संकेत दिया है कि इस परिसर में धार के परमार राजाओं के शासनकाल की एक विशाल संरचना मस्जिद के मुकाबले पहले से विद्यमान थी और वहां वर्तमान में मौजूद एक विवादित ढांचा मंदिरों के हिस्सों का फिर से इस्तेमाल करते हुए बनाया गया था।
हिंदू-मुस्लिम पक्ष ने क्या कहा?
हिंदू पक्ष का दावा है कि एएसआई को वैज्ञानिक सर्वेक्षण में मिले सिक्के, मूर्तियां और शिलालेख गवाही देते हैं कि यह परिसर मूलत: एक मंदिर था।
हाई कोर्ट में मुस्लिम पक्ष ने दलील दी थी कि एएसआई की सर्वेक्षण रिपोर्ट 'पक्षपातपूर्ण' है और इसे हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ताओं के दावों का समर्थन करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
एएसआई ने आरोपों को नकारा
एएसआई ने इस दलील का खंडन करते हुए अदालत में कहा था कि सर्वेक्षण की वैज्ञानिक प्रक्रिया को विशेषज्ञों की मदद से अंजाम दिया गया है। एएसआई ने कहा कि सर्वेक्षण दल में तीन मुस्लिम जानकार शामिल थे और सर्वेक्षण के दौरान इस समुदाय के प्रतिनिधि भी मौके पर मौजूद थे।
हाई कोर्ट के आदेश पर हुआ था सर्वेक्षण
हाई कोर्ट ने 11 मार्च 2024 को एएसआई को भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था। एएसआई ने 22 मार्च 2024 से इस परिसर का सर्वेक्षण शुरू किया था। एएसआई ने 98 दिनों के विस्तृत सर्वेक्षण के बाद 15 जुलाई 2024 को उच्च न्यायालय में अपनी रिपोर्ट पेश की थी।
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