जिस कानून से रुक जाते हैं मंदिर-मस्जिद विवाद, भोजशाला में वह क्यों नहीं चला?

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इस फैसले से एक कानूनी बहस फिर उठ खड़ी हुई है- क्या भोजशाला केस में Places of Worship Act को नजरअंदाज कर दिया गया है? अब समझिए आखिर ऐसा क्या हुआ कि इस एक्ट की ढाल इस केस में काम न आई। समझिए पूरा कानूनी दांव-पेच।

जिस कानून से रुक जाते हैं मंदिर-मस्जिद विवाद, भोजशाला में वह क्यों नहीं चला?

भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर अब देवी सरस्वती के मंदिर के तौर पर जाना जाएगा। ये फैसला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सुनाया है। इस फैसले से एक कानूनी बहस फिर उठ खड़ी हुई है- "क्या भोजशाला केस में Places of Worship Act को नजरअंदाज कर दिया गया है?" अगर आप इस एक्ट के बारे में नहीं जानते हैं, तो पहले इसे जानिए, फिर पूरी बहस को समझते हैं।

पहले इस कानून को समझिए

Places of Worship Act कहता है- "15 अगस्त 1947 को किसी धार्मिक स्थल की जो स्थिति थी, उसे बदला नहीं जा सकता। साथ ही किसी स्थल के धार्मिक स्वरूप को अदालत में चुनौती देने पर भी रोक लगाई गई।" ऐसा करने की वजह एकदम साफ थी- इतिहास से जुड़े विवाद दोबारा न उभरें और समाज में हर वर्ग-समुदाय के बीच शांति बनी रहे। अब समझिए आखिर ऐसा क्या हुआ कि इस एक्ट की ढाल इस केस में काम न आई। समझिए पूरा कानूनी दांव-पेच।

इसलिए सीधे-सीधे लागू नहीं हुआ कानून

इस कानून का एक सेक्शन है, जिसके चलते सारा खेल बदल गया। कानून के सेक्शन 4(3)(ए) में एक खास तरह की छूट दी गई है। लिखा है- अगर किसी धार्मिक स्थल का विवाद या उसका स्वरूप “प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक” या पुरातात्विक स्थल से जुड़ा है, और वह आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) या प्राचीन स्मारक कानून के दायरे में आता है, तो उस पर इस कानून की रोक सीधे-सीधे लागू नहीं होगी। इसी कारण भोजशाला केस इस कानून के दायरे से बाहर रहा।

जानिए सुनवाई में खंडपीठ ने क्या कहा

जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने कहा कि इस कानून की धारा 4(3) स्पष्ट रूप से उन स्मारकों को इस कानून के दायरे से बाहर रखती है, जो 1958 के कानून के तहत संरक्षित हैं। भोजशाला परिसर को 1904 से संरक्षित स्मारक माना गया है और इस पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का नियंत्रण है। ऐसे में 1991 का कानून यहां लागू नहीं किया जा सकता।

संपत्ति के मालिकाना हक का विवाद नहीं

अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में संपत्ति के मालिकाना हक का विवाद नहीं है, बल्कि पूजा और प्रार्थना के मौलिक अधिकार का प्रश्न है। यही वजह रही कि कोर्ट ने इसे “सूट” यानी दीवानी मुकदमे की श्रेणी में नहीं माना। अदालत ने कहा कि याचिकाएं संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर की गई थीं, जिनका उद्देश्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों को लागू कराना है। इसलिए इस कानून की रोक इन याचिकाओं पर लागू नहीं हो सकती।

अब मुस्लिम पक्ष नमाज अदा नहीं करेगा

फैसले में हाई कोर्ट ने ASI की 7 अप्रैल 2003 की उस व्यवस्था को भी आंशिक रूप से रद्द कर दिया, जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को परिसर में नमाज की अनुमति दी गई थी। अदालत ने कहा कि परिसर का धार्मिक चरित्र देवी वाग्देवी यानी सरस्वती मंदिर का है, इसलिए ASI का वह आदेश टिक नहीं सकता।

आने वाले समय में बन सकता कानूनी बहस का आधार

यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इस कानून की संवैधानिक वैधता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहले से कई याचिकाएं लंबित हैं। ऐसे में भोजशाला पर आया यह निर्णय भविष्य में अन्य धार्मिक विवादों में भी कानूनी बहस का बड़ा आधार बन सकता है।

Ratan Gupta

लेखक के बारे में

Ratan Gupta

रतन गुप्ता एक डिजिटल हिंदी जर्नलिस्ट/ कॉन्टेंट प्रोड्यूसर हैं। वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान की स्टेट न्यूज टीम के साथ काम कर रहे हैं। वह क्राइम, राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर न्यूज आर्टिकल और एक्सप्लेनर स्टोरीज लिखते हैं।


रतन गुप्ता वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर स्टेट न्यूज टीम में काम करते हैं। इस टीम में हिंदी पट्टी के 8 राज्यों दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात से जुड़ी खबरों की कवरेज करते हैं। उनका लेखन खास तौर से क्राइम, राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित रहता है।


लाइव हिंदुस्तान में बीते 2 साल से काम करते हुए रतन ने ब्रेकिंग न्यूज, राजनीतिक घटनाक्रम और कानून-व्यवस्था से जुड़ी खबरों पर लगातार लेखन किया है। इसके साथ ही वह एक्सप्लेनर स्टोरीज लिखने में भी विशेष रुचि रखते हैं, जहां जटिल मुद्दों को सरल और तथ्यपरक भाषा में पाठकों के सामने रखते हैं।


रतन गुप्ता ने बायोलॉजी में ग्रेजुएशन किया है, जिसके बाद उन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई की है। साइंस बैकग्राउंड होने के कारण उनकी न्यूज और एनालिसिस स्टोरी में साइंटिफिक टेंपरामेंट, लॉजिकल अप्रोच और फैक्ट-बेस्ड सोच साफ दिखाई देती है। वह किसी भी मुद्दे पर रिपोर्टिंग करते समय दोनों पक्षों की बात, मौजूद तथ्यों और आधिकारिक स्रोतों को प्राथमिकता देते हैं, ताकि यूजर तक संतुलित और भरोसेमंद जानकारी पहुंचे।


इसके साथ ही आईआईएमसी की एकेडमिक पढ़ाई ने उन्हें रिपोर्टिंग, न्यूज प्रोडक्शन, मीडिया एथिक्स और पब्लिक अफेयर्स की गहरी समझ दी है। इसका सीधा असर उनके लेखन की विश्वसनीयता और संतुलन में दिखाई देता है।

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