भोजशाला केस: ASI सर्वे की वीडियोग्राफी बनेगी अहम कड़ी, क्या बोला मुस्लिम पक्ष?
भोजशाला विवाद में हाईकोर्ट ने एएसआई को आदेश दिया है कि वह 98 दिनों के सर्वे की पूरी वीडियोग्राफी मुस्लिम पक्ष को सौंपे। अदालत ने साक्ष्यों की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए 27 अप्रैल की समयसीमा तय की है।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भोजशाला मामले में एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को निर्देश दिया है कि वह 96 दिनों तक चले पूरे सर्वे की वीडियोग्राफी को गूगल ड्राइव जैसे सुरक्षित डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड करे। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की पीठ ने कहा कि मुस्लिम पक्ष और अन्य वादी इस फुटेज को देख सकें ताकि वे सर्वे रिपोर्ट पर अपनी आपत्तियां दर्ज कर सकें। एएसआई को यह प्रक्रिया 27 अप्रैल तक पूरी करनी होगी। सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष ने दलील दी कि संरचना में मस्जिद के स्पष्ट तत्व मौजूद हैं और खुदाई के दौरान मिले विभिन्न अवशेषों के सच को समझने के लिए वीडियोग्राफी तक पहुंच आवश्यक है। यह आदेश मामले की कानूनी दिशा तय करने में निर्णायक माना जा रहा है।
अदालत ने एक अहम और निर्णायक आदेश देते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को 98 दिनों तक चले सर्वे की पूरी वीडियोग्राफी मुस्लिम पक्ष को सौंपने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि 27 अप्रैल तक हर हाल में सभी पक्षों को वीडियो क्लिप्स उपलब्ध कराई जाएं ताकि वे अपनी दलीलें सीधे सबूतों के आधार पर पेश कर सकें। इस आदेश को मामले की दिशा तय करने वाला कदम माना जा रहा है।
बता दें कि भोजशाला परिसर के स्वामित्व को लेकर विवाद चल रहा है। मामले में कमाल मौला वेलफेयर ट्रस्ट की याचिका पर डबल बेंच सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपनी दलीलें रखीं।
क्या बोला मुस्लिम पक्ष?
सलमान खुर्शीद ने कहा कि एएसआई सर्वेक्षण रिपोर्ट पर आपत्तियां, वीडियोग्राफिक रिकॉर्ड से ही सामने सकती हैं। इस वजह से प्रतिवादी की इन तक पहुंच होनी चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का भी हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि हाईकोर्ट को वीडियोग्राफी से होने वाली आपत्तियों पर भी विचार करना चाहिए।
क्या बोले ASI के वकील?
इस मांग पर आपत्ति जताते हुए एएसआई के वकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश में केवल हाईकोर्ट की ओर से सामग्री को देखने की बात कही गई थी। उन्होंने यह भी कहा कि वीडियोग्राफी का काम 96 दिनों तक चला था। इस फुटेज को साझा करने या दिखाने में अभी समय लगेगा।
सर्वेक्षण की पूरी वीडियोग्राफी प्रतिवादियों को देने के आदेश
हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने ASI को निर्देश दिया कि वह सर्वेक्षण की पूरी वीडियोग्राफी को गूगल ड्राइव लिंक या किसी सुरक्षित क्लाउड सेवा पर अपलोड करे और इसकी पहुंच प्रतिवादियों के वकीलों तथा अदालत दोनों को दे। अदालत ने इसके लिए डेड लाइन भी तय कर दी। अदालत ने कहा कि प्रक्रिया 27 अप्रैल तक पूरी हो जानी चाहिए।
सिविल कोर्ट का मामला
पीटीआई-भाषा की रिपोर्ट के मुताबिक, इससे पहले, एक हस्तक्षेपकर्ता के वकील ने सोमवार को अपनी दलीलों में कहा कि हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से दायर याचिका सुनवाई के लायक ही नहीं है। विवादित स्वामित्व के दावे इसे सिविल कोर्ट का मामला बनाते हैं, न कि रिट अदालत का केस... वकील अशर वारसी ने गुजारिश की कि वह पक्षों को दीवानी सुनवाई या वक्फ न्यायाधिकरण की सुनवाई का निर्देश दे।
हिंदू मंदिर नहीं
वारसी ने दावा किया कि यह संरचना हिंदू मंदिर नहीं है। यहां मंदिर के मुख्य हिस्से जैसे कि गर्भ गृह, शिखर, मंडप, अंतराला और गोपुरम नहीं हैं। यहां मस्जिद की पहचान बताने वाले तत्व जैसे मिहराब, किबला, खुला आंगन और मीनार मौजूद हैं। वकील ने ब्रिटिश म्यूजियम के दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि वहां रखी वागदेवी की मूर्ति भोजशाला की नहीं है। यह परमार काल के सिटी पैलेस के खंडहरों की है।
(रिपोर्ट- हेमंत, पीटीआई-भाषा के इनपुट के साथ)
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