भोजशाला में अचानक कब और कैसे 'प्रकट' हो गई वाग्देवी सरस्वती की मूर्ति!
भोजशाला परिसर में वाग्देवी सरस्वती की मूर्ति अचानक पाए जाने के बाद जहां एक तरफ भक्तों में खुशी दिखी तो एएसआई की बेचैनी सुरक्षा को लेकर बढ़ गई। सवाल यह उठ रहा है कि पुलिस और एएसआई के अधिकारियों को कुछ पता कैसे नहीं चला।

भोजशाला पर हाई कोर्ट के फैसले के बाद मध्य प्रदेश के धार में गतिविधियां तेज हो गईं हैं। वाग्देवी सरस्वती का मंदिर करार दिए जाने के बाद से भोजशाला में हिंदू श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। इस बीच रविवार को उस वक्त हलचल तेज हो गई जब अचानक मंदिर में अष्टधातु की प्रतिमा 'प्रकट' हो गई। वाग्देवी की मूर्ति देखकर जहां श्रद्धालुओं में खुशी की लहर दौड़ गई तो इमारत आर्किलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) के अधिकारियों की चिंता बढ़ गई। कड़ी सुरक्षा के बीच किसने और कैसे मूर्ति को स्थापित किया, यह सवाल खड़ा हो गया। कई घंटों बाद शाम को अधिकारियों ने मूर्ति को हटा दिया।
भोजशाला में ना सिर्फ वाग्देवी की मूर्ति स्थापित की गई थी, बल्कि यहां अक्षत-फूल आदि होने से पता चला कि पूजा-पाठ और अनुष्ठान भी किया गया है। भोजशाला पर आए हाई कोर्ट के फैसले में सदियों तक विवादित रहे स्थल को मंदिर बताया गया है। अदालत ने माना कि मौजूदा ढांचे के स्थान पर पहले वाग्देवी सरस्वती का मंदिर था। खुदाई में एसआई को ऐसे कई वैज्ञानिक साक्ष्य मिले थे। हालांकि, इसे अभी एसआई के संरक्षण में ही रखा गया है और सरकार को इसके प्रबंधन पर फैसला लेने को कहा गया है। भोजशाला परिसर में बाहरी सुरक्षा पुलिस के हवाले है, जबकि परिसर के अंदर देखभाल की जिम्मेदारी एएसआई की है।
किसने रखी मूर्ति, क्यों किसी को पता नहीं चला
भोजशाला परिसर में मूर्ति रखे जाने के बाद कई गंभीर सवाल सुरक्षा को लेकर खड़े हो गए हैं। अधिकारियों को अभी तक यह नहीं पता चल सका है कि मूर्ति को किसने और कब रखा। किसी व्यक्ति या संगठन ने मूर्ति स्थापित करने का दावा नहीं किया है। पुलिस सीसीटीवी फुटेज देखकर यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि आखिर कब और कैसे मूर्ति को यहां लाया गया और क्यों किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी।
HC के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी गई चुनौती
सुप्रीम कोर्ट में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए एक नई याचिका दायर की गई है। हिंदू समुदाय भोजशाला को देवी सरस्वती का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम समुदाय 11वीं शताब्दी के इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद कहता है। मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित विवादित परिसर एएसआई द्वारा संरक्षित है। जेब्रान अंसारी नामक एक व्यक्ति ने उच्च न्यायालय के 15 मई के आदेश को चुनौती दी है। इससे पहले, मस्जिद के कार्यवाहक काजी मोइनुद्दीन ने उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी थी। हिंदू पक्ष ने पहले ही उच्चतम न्यायालय में एक कैविएट दायर कर कहा है कि भोजशाला परिसर विवाद मामले में उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ किसी भी अपील पर बिना उसका पक्ष सुने कोई आदेश पारित न किया जाए। हाई कोर्ट ने एएसआई के सात अप्रैल, 2003 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया है, जिसमें मुसलमानों को भोजशाला परिसर के अंदर हर शुक्रवार को नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी।
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