क्या है ASI का 23 साल पुराना वह आदेश, भोजशाला पर फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने जिसे कर दिया रद्द

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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 11 मार्च, 2024 को ASI को भोजशाला मंदिर-कमल मौला मस्जिद परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था। ASI ने उस साल 22 मार्च को सर्वेक्षण शुरू किया और 98 दिनों के विस्तृत सर्वेक्षण के बाद, 15 जुलाई 2024 को अपनी रिपोर्ट हाई कोर्ट में जमा कर दी थी।

क्या है ASI का 23 साल पुराना वह आदेश, भोजशाला पर फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने जिसे कर दिया रद्द

मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला के मंदिर या मस्जिद होने को लेकर MP हाई कोर्ट का फैसला शुक्रवार को आ गया। अपने फैसले में उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने भोजशाला को वाग्देवी का मंदिर माना है। सालों पुराने इस केस में फैसला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि ASI के सर्वेक्षण के दौरान वहां से मिले ऐतिहासिक सबूत स्थापित करते हैं कि यह स्मारक परमार राजवंश के राजा भोज से जुड़ा रहा है। हाई कोर्ट ने कहा कि भोजशाला परिसर का धार्मिक स्वरूप यह दर्शाता है कि यह देवी सरस्वती का मंदिर है, साथ ही वहां संस्कृत शिक्षण केंद्र व देवी सरस्वती के मंदिर होने के भी साफ संकेत मिले हैं। अपने फैसले में हाई कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के 23 साल पुराने दिए एक आदेश को भी आंशिक रूप से रद्द कर दिया, जिसके बाद अब मुस्लिम धर्म के लोग भोजशाला में नमाज नहीं पढ़ सकेंगे और अब वहां सिर्फ हिंदू धर्म के लोगों को ही पूजा पाठ की इजाजत होगी।

हाई कोर्ट ने ASI के जिस आदेश को रद्द किया, उसे एजेंसी ने 7 अप्रैल 2003 को दिया था, और उसमें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने हिंदुओं को हर मंगलवार को सूर्योदय से सूर्यास्त तक भोजशाला में पूजा करने और मुस्लिमों को हर शुक्रवार को भोजशाला परिसर में नमाज अदा करने की इजाजत दी थी। हालांकि आज दिए अपने फैसले में इस आदेश को आंशिक रूप से रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने मुस्लिमों को परिसर में नमाज पढ़ने की दी गई इजाजत वापस ले ली।

हिंदू पक्ष ने ASI के आदेश को दी थी अदालत में चुनौती

हिंदू पक्ष ने ASI के इसी आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, और परिसर में पूजा करने के विशेष अधिकार की मांग की थी। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने 11 मार्च, 2024 को ASI को भोजशाला मंदिर-कमल मौला मस्जिद परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था। ASI ने उस साल 22 मार्च को सर्वेक्षण शुरू किया और 98 दिनों के विस्तृत सर्वेक्षण के बाद, 15 जुलाई 2024 को अपनी रिपोर्ट हाई कोर्ट में जमा कर दी थी।

ASI की सर्वे रिपोर्ट से मिले बेहद अहम सबूत

ASI ने स्मारक का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने के बाद, अपनी करीब 2100 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट में बताया था कि धार की भोजशाला में परमार राजाओं के शासनकाल का बना एक विशाल ढांचा मस्जिद से पहले का था, और मौजूदा विवादित ढांचा मंदिर के हिस्सों का दोबारा इस्तेमाल करके बनाया गया था। हिंदू पक्ष ने दावा किया कि ASI को अपने वैज्ञानिक सर्वेक्षण के दौरान मिले सिक्के, मूर्तियां और शिलालेख यह साबित करते हैं कि यह परिसर मूल रूप से एक मंदिर था।

मुस्लिम पक्ष ने रिपोर्ट को बताया था पक्षपातपूर्ण

हालांकि, मुस्लिम पक्ष ने अदालत में तर्क दिया कि ASI की सर्वेक्षण रिपोर्ट पक्षपातपूर्ण थी और हिंदू याचिकाकर्ताओं के दावों का समर्थन करने के लिए तैयार की गई थी। इस बात का खंडन करते हुए, ASI ने अदालत को बताया कि वैज्ञानिक सर्वेक्षण की प्रक्रिया विशेषज्ञों की मदद से पूरी की गई थी, जिसमें मुस्लिम समुदाय के तीन विशेषज्ञ भी शामिल थे।

6 अप्रैल से हाई कोर्ट में शुरू हुई थी नियमित सुनवाई

हाई कोर्ट की इंदौर बेंच के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने इस साल 6 अप्रैल को इस मामले से जुड़ी पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर नियमित सुनवाई शुरू की। साथ ही लंबी सुनवाई के दौरान अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं, ऐतिहासिक दावों, जटिल कानूनी प्रावधानों और विवादित स्मारक से जुड़े हजारों दस्तावेजों की पृष्ठभूमि में सभी पक्षों को सुनने के बाद, बेंच ने 12 मई को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

सुनवाई के दौरान, हिंदू, मुस्लिम और जैन समुदायों के याचिकाकर्ताओं ने विस्तृत तर्क पेश किए और स्मारक पर अपने-अपने समुदायों के लिए पूजा के विशेष अधिकार मांगे। हिंदू समुदाय भोजशाला को वाग्देवी (देवी सरस्वती) को समर्पित एक मंदिर मानता रहा है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को 'कमल मौला मस्जिद' कहता आया है। वहीं जैन समुदाय के एक याचिकाकर्ता का दावा था कि यह विवादित परिसर मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल है। हालांकि कोर्ट ने अब हिंदू पक्ष के दावे को मानते हुए परिसर को देवी सरस्वती का मंदिर घोषित कर दिया है। (एजेंसी इनपुट के साथ)

Sourabh Jain

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Sourabh Jain

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