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यूपी की जीत से और कद्दावर होकर उभरे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 

यूपी में भाजपा की प्रचंड जीत से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और कद्दावर होकर उभरे हैं। अंतिम चरण के चुनाव से कुछ दिन पहले उन्होंने ‘हिन्दुस्तान’ से बातचीत में स्वीकार किया था कि उप्र की 80 सीटों के चुनाव परिणाम केन्द्र के साथ-साथ उप्र सरकार का भी रिपोर्ट कार्ड होंगे। इस रिपोर्ट कार्ड में जो भी नंबर चढ़े हैं, उन्हें कमाने में योगी की बड़ी भूमिका मानी जा रही है। दरअसल केन्द्र की जिन योजनाओं ने इस जीत की आधारशिला रखी, उन्हें लागू करने में उप्र अव्वल रहा। यह काम बिना प्रदेश सरकार की सख्त मॉनीटरिंग के मुमकिन नहीं था।

उप्र और बाकी प्रदेशों की परिस्थितियों में बड़ा अंतर था। भाजपा के सामने सपा-बसपा जैसा व्यापक जनाधार वाला गठबंधन और कहीं नहीं था। अंकगणित के नजरिए से महागठबंधन अपराजेय स्थिति में था। इसके बावजूद भाजपा ने उसे परास्त कर दिया। विश्लेषक मान रहे हैं कि इसके पीछे मोदी के नाम और काम का जादू तो है ही, योगी की मशक्कतें भी हैं। उप्र में योगी मतदाताओं को यह संदेश देने में कामयाब रहे कि महागठबंधन लोगों को जातियों में बांट रहा है और भाजपा उनके दुख-दर्द बांट रही है। 

उप्र में लाखों लोगों को घर, करोड़ों घरों को टॉयलेट, गैस और बिजली, किसान सम्मान निधि पहुंचाने का काम आसान नहीं था। सुस्त नौकरशाही के भरोसे यह काम छोड़ दिए जाते तो शायद योजनाएं अगले कुछ सालों तक भी इस स्थिति में न पहुंचतीं। अंतिम सिरे तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए योगी ने प्राय: सुबह 6 बजे से रात 12 बजे तक काम किया। उनकी समीक्षा बैठकों से नौकरशाह दबाव में रहे। बैठकों के लिए अफसरों को तैयारी करनी पड़ी और तैयारी के लिए फील्ड पर काम कराना पड़ा। अंतत: योजनाएं अधिकतम परिणाम देने वाली बन गईं। इससे गरीबों के बीच सरकार की छवि बेहतर हुई। योगी इसके सूत्रधार बने।

उधर गठबंधन का सारा जोर केवल आलोचना और जातीय गुणा-गणित में लगा रहा। जिन जातियों का हितैषी बन कर गठबंधन चुनावी समर में उतरा, उन जातियों के बड़े हिस्से के समर्थन के बिना भाजपा ऐसा प्रदर्शन नहीं कर सकती थी। जाहिर है, हर जाति के गरीबों ने गठबंधन पर भरोसा नहीं किया।
 
आलोचना से बिना डरे सख्त कदम उठाए
उप्र में मुख्यमंत्री बनते ही योगी ने जो शुरुआती सख्त कदम उठाए, उनकी तीखी आलोचना भी हुई। योगी सियासी घेराबंदी में फंस कर भी रुके नहीं। फैसलों को उन्होंने कड़ाई से लागू किया। मसलन एंटी रोमियो स्क्वायड गठन पर उनका विरोध हुआ। लेकिन छेड़छाड़ की यातना भुगतने वाले करोड़ों परिवारों के दिलों में उप्र सरकार ने जगह बना ली। इसी तरह अवैध बूचड़खानों पर सख्ती से रोक ने कुछ लोगों को परेशान किया तो बड़ी आबादी ने इसे सराहा। कुंभ जैसे बड़े आयोजनों की भव्यता अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुई। इसका क्रेडिट भी योगी के खाते में गया। माना जा रहा है कि कुंभ की भव्यता देख कर वापस लौटे लोगों ने एक तरह से योगी के ब्रांड एंबेसडर जैसा काम किया। 
 
प्रदेश को मथ डाला तो मिले परिणाम
योगी ने सत्ता संभालने के पहले साल में ही पूरे प्रदेश को मथ डाला। हर जिले में उनके दौरे हो गए। अफसरशाही को अहसास हो गया कि उनके कामकाज की सख्त स्क्रीनिंग हो रही है। इससे तंत्र एक्टिव हुआ। गन्ने का बकाया भुगतान, नहरों में पानी, खाद-बीज वितरण में पारदर्शिता और खरीद-केन्द्रों में पहले की तुलना में बेहतर व्यवस्था ने किसानों के मन में जगह बनाई। योगी को किसानों से संबंधित हर मुद्दे के आंकड़े जुबानी याद रहते हैं। अफसरों को समीक्षा बैठक में इसीलिए पसीना आ जाता है। इसका असर योजनाओं के क्रियान्वयन पर पड़ रहा है।
 
कानून-व्यवस्था और बिजली का मुद्दा गायब
यह उप्र में शायद पहला मौका था जब कानून-व्यवस्था और बिजली संकट का मुद्दा उठा ही नहीं। एनकाउंटर को लेकर निशाने पर आई योगी सरकार ने सियासी हमलों के बावजूद अपराध पर जीरो टालरेंस की नीति दृढता से लागू रखी। 75 अपराधी पुलिस की गोलियों का शिकार बने। सैकड़ों जेल भेजे गए। जिन अपराधियों से इलाके कांपते थे, उन्हें जान बचाने के लिए भागते देख कर जनता ने राहत की सांस ली। इसी तरह बिजली की स्थिति में बड़ा सुधार हुआ। आलोचना की कोई गुंजाइश न मिलने पर अखिलेश यादव को भी कहना पड़ा, ‘बिजली अच्छी है तो इस वजह से कि मेरी सरकार ने इसके लिए बहुत काम किया था। उसका परिणाम आता, तब तक सरकार बदल गई। अब क्रेडिट भाजपा सरकार ले रही है।’
 
बिना थके धुआंधार प्रचार
चुनाव प्रचार में भी योगी ने रिकार्ड बना दिए। उन्होंने मोदी और अमित शाह के बाद देश में सबसे ज्यादा रैलियां कीं। वह अकेले मुख्यमंत्री हैं, जिसने अपने प्रदेश के बाहर भी नौ राज्यों में 30 से अधिक रैलियां कीं। अपने प्रदेश में उन्होंने 140 से ज्यादा सभाएं करके माहौल बनाया

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  • Web Title:Yogi Adityanath emerges from the victory of UP