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देवरिया का 13वां आम चुनाव: 1999 में चुनाव जीत जेपीसी चेयरमैन बने श्रीप्रकाश मणि 

1999 में हुए तेरहवें आम चुनाव में भाजपा ने एक बार फिर अच्छी जीत दर्ज की। इन चुनाव में देवरिया संसदीय क्षेत्र में अपने- अपने क्षेत्र के तीन महारथी मैदान में थे। इन तीनों प्रत्याशियों के चलते इस चुनाव पर अन्य जिलों की भी निगाह थी। भाजपा प्रत्याशी श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी ने सपा के मोहन सिंह को हराकर जीत दर्ज की। श्री त्रिपाठी शेयर घोटाले की जांच के लिए बनी संयुक्त संसदीय समिति के चेयरमैन बने। इससे देवरिया राष्ट्रीय पटल पर आ गया। 

1998 के आम चुनाव केन्द्र में अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी। यह सरकार महज तेरह महीने ही चल सकी, जिसके चलते 1999 में मध्यावधि चुनाव हुआ। लोगों में अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व का खासा प्रभाव था। साथ ही उनकी सरकार के असमय गिरने को लेकर रोष भी। इसके चलते इस चुनाव में आमतौर लोगों का झुकाव भाजपा के प्रति था। इस चुनाव में भाजपा ने श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी, सपा ने मोहन सिंह, बसपा ने राजेश कुमार सिंह को ही प्रत्याशी बनाया था। 

कांग्रेस ने पिछले चुनाव के अपने प्रत्याशी को बदल कर पूर्व न्यायधीश व विधिवेत्ता चन्द्रभूषण पाण्डेय को मैदान में उतारा था। तीन बड़े व्यक्तित्वों के मैदान में होने प्रचार अभियान राजनीतिक मूल्यों के साथ चला। भाजपा के श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी 36.28 फीसदी मत पाकर दूसरी बार चुनाव जीतने में सफल रहे। उन्हें 251814 मत मिले थे। इस चुनाव में जीतने के बाद श्री त्रिपाठी ने क्षेत्र में तो कार्य कराए ही, शेयर घोटाले की जांच के लिए बनी संयुक्त संसदीय समिति के चेयरमैन भी बने। 

इस समिति के चेयरमैन के रूप में इनके कार्य की काफी सराहना हुई। दूसरे स्थान पर रहे सपा के मोहन सिंह 209673 (30.21 प्रतिशत) मत मिले थे, जबकि तीसरे स्थान पर रहे बसपा के राजेश कुमार सिंह पिछले चुनाव से अधिक 135019 (19.45 फीसदी)  मत मिले थे। बीते दो चुनावों में जमानत गवाने वाली कांग्रेस इस चुनाव में चन्द्रभूषण पाण्डेय के जरिए अपनी जमानत बचाने में सफल रही। श्री पाण्डेय को 69343 (9.99 फीसदी) मत मिले थे। कुल नौ प्रत्याशियों में पांच की जमानत जब्त हो गई थी। प्रमोद कुमार निषाद को 14492, नेलोपा के खालिक को 6176, चन्नर को 3326, प्रमोद कुमार यादव को 2411 व बेचन मणि त्रिपाठी को 1885 मत मिले थे। 

सलेमपुर में पहली बार बब्बन राजभर ने खोला बसपा का खाता
सलेमपुर संसदीय क्षेत्र में एनडीए की सरकार के तेरह महीने में गिरने का असर नहीं दिखा। यहां चार प्रत्याशियों के बीच मुकाबला सिमटने के कारण वोटों का जबरजस्त बटवारा हुआ, जिसका फायदा मिला। साथ ही जातीय समीकरणों ने चुनाव पर प्रभाव डाला। कम मतों पर चुनाव का फैसला हुआ और बसपा ने पहली जीत दर्ज की। इस जीत ने सलेमपुर व जिले की राजनीति में पार्टी को मजबूती दी, जिसका असर आगे के चुनावों में दिखायी दिया। 

मैदान में 14 प्रत्याशी थी, जिसमें से दस प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी। बसपा ने बब्बन राजभर 170558 (26.80 फीसदी) मत पाकर चुनाव जीत गए। सपा के हरिवंश सहाय दूसरे स्थान पर रहे और उन्हें 161508 (25.38 फीसदी), जनता दल यू के हरिकेवल प्रसाद को 150690 (23.68 फीसदी) तथा कांग्रेस के डा भोला पाण्डेय को 116820 (18.35 फीसदी) मत मिले थे। 

इन चारों प्रत्याशियों के बीच चुनाव सिमटा रहा और अन्य सभी की जमानत जब्त हो गई। भाकपा माले के श्रीराम चौधरी को 12519, अनुरूद्ध को 5942, डा कृष्ण बिहारी पाण्डेय को 3815, के के तिवारी को 3663, कुंजबिहारी को 3489, अरविन्द कुमार त्रिपाठी को 2497, पं नित्यानंद उपाध्याय को 2314, लल्लन को 1355, लाल साहब यादव को 746 व सुरेश को 559 मत मिले थे। 

यह चुनाव प्रत्याशियों के शालीन व मर्यादापूर्ण प्रचार के लिए अब याद है। उस समय मै कांग्रेस प्रत्याशी के साथ और उनके साथ प्रचार में भी रहा। पूरे चुनाव में तीनों प्रत्याशियों ने गरिमा व मर्यादा का पूरा ख्याल रखा तथा कभी किसी के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की। एनडीए की तेरह महीने में ही सरकार गिरने के कारण लोगों में भाजपा व अटल बिहारी बाजपेयी का बोलबाला था। चुनाव के दौरान लग जा रहा था कि भाजपा व उनके प्रत्याशी की स्थिति काफी मजबूत थी। इसके बाद भी हम लोगों ने लगातार लोगों से संपर्क किया। तमाम लोग तो तीनों प्रत्याशियों से प्रभावित थे और कहते थे कि इन लोगों को अलग- अलग क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहिए था।
डा रामभरोसा त्रिपाठी, 75 वर्ष, पूर्व अध्यक्ष नगर पंचायत रुद्रपुर

एनडीए की सरकार तेरह महीने में गिर गई थी। इससे भाजपा खासकर अटल बिहारी बाजपेयी के प्रति लोगों में माहौल बन गया था। तीन दलों से मोहन सिंह, श्रीप्रकाश मणि व चन्द्रभूषण पाण्डेय जैसे लोग प्रत्याशी थे। इस स्थिति में व्यक्तित्व व विचार के आधार निर्णय करना कठिन था। देवरिया संसदीय क्षेत्र के चुनाव में ऐसा अवसर बहुत कम आया है, जब इस तरह के लोग एक साथ चुनावी मैदान में हो। जीतना किसी एक को ही था। भाजपा व अटल बिहारी बाजपेयी के प्रति लोगों का काफी झुकाव था और भाजपा को जीत मिली। अब तो उस तरह का चुनाव कही दिखायी ही नहीं दे रहा है।
डा एच बीएस मनचंदा, 76 वर्ष, प्रमुख होम्योपैथिक चिकित्सक

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  • Web Title:sriprakash mani won 13th election from Deoria