Parties are fighting for winning lok sabha seats of western Uttar Pradesh - लोकसभा चुनाव 2nd Phase: पश्चिमी यूपी पर कब्जे के लिए दलों के बीच कांटे की टक्कर 1 DA Image
16 दिसंबर, 2019|7:59|IST

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लोकसभा चुनाव 2nd Phase: पश्चिमी यूपी पर कब्जे के लिए दलों के बीच कांटे की टक्कर

आगरा: त्रिकोणीय जंग के बीच दलित वोटों के बंटवारे पर टिका है परिणाम
आगरा: त्रिकोणीय जंग के बीच दलित वोटों के बंटवारे पर टिका है परिणाम

लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आठ संसदीय सीटों पर प्रत्याशियों का भविष्य तय होगा। आगरा, फतेहपुर सीकरी, हाथरस और मथुरा में दलों के बीच कांटे की टक्कर है। पिछले चुनाव में इन सभी सीटों पर भाजपा का कब्जा था। लेकिन इस बार भाजपा के सामने इन सीटों पर कब्जा बनाए रखने की बड़ी चुनौती है। फतेहपुर सीकरी और मथुरा सीट पर ग्लैमर का तड़का लगा है तो दलितों की राजधानी कही जाने वाली ताजनगरी आगरा में वोटों का ध्रुवीकरण अहम होगा। स्टार प्रचारक प्रचार के अंतिम समय तक पूरी ताकत झोंक रहे हैं। पेश है चारों सीटों पर टीम हिन्दुस्तान की रिपोर्ट-

आगरा: त्रिकोणीय जंग के बीच दलित वोटों के बंटवारे पर टिका है परिणाम

आगरा लोकसभा सीट कभी कांग्रेस का गढ़ होती थी, लेकिन पिछले दो दशक से इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी जीतती रही है। कांग्रेस की जीत का आलम यह था कि 1952 से 1971 तक यह संसदीय सीट उसके पास रही। उसके बाद यहां के मतदाताओं का रुख बदला और उन्होंने कांग्रेस को नकार दिया। इसके बाद यहां से लोकदल के अजय सिंह, भाजपा के भगवान शंकर रावत, सपा के राज बब्बर और फिर भाजपा के रामशंकर कठेरिया संसद पहुंचे।

आगरा के मतदाताओं में करीब 37 फीसदी मतदाता दलित और मुस्लिम हैं। खास बात यह है दलित बहुल होने के बावजूद यहां से बसपा आज तक खाता नहीं खोल पाई है। ऐसे में इस सीट पर दलित वोटों का बंटवारा भी परिणाम पर निर्णायक असर डाल सकता है।

इस बार रामशंकर कठेरिया का टिकट काट कर भाजपा ने प्रदेश काबीना मंत्री प्रोफेसर एस.पी. सिंह बघेल पर दांव खेला है। कठेरिया को इटावा से टिकट दिया गया है। बघेल को यहां से उतारकर भाजपा बड़े वर्ग के वोट को अपनी ओर करने की कोशिश कर रही है। इस बार चुनावी रण में नौ प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। कांग्रेस ने प्रीता हरित और बसपा-सपा गठबंधन ने मनोज कुमार सोनी पर दांव खेला है। मौजूदा सूरत में इस सीट पर त्रिकोणात्मक संघर्ष दिखाई दे रहा है। परिणाम और जीत की दिशा तय करने में वैश्यों के साथ-साथ दलित और मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की अहम भूमिका होगी। सभी नौ सीटों पर भाजपा के विधायक है, इसलिए अपने गढ़ को बचाने के लिए भाजपा कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यहां चुनावी जनसभा कर चुके हैं।

आगरा में 2014 लोकसभा चुनाव के आंकड़े- 

                       2014
फतेहपुर सीकरी : भाजपा के लिए इस बार कड़ी चुनौती
फतेहपुर सीकरी : भाजपा के लिए इस बार कड़ी चुनौती

फतेहपुर सीकरी लोकसभा सीट 2009 में पहली बार अस्तित्व में आई थी। यहां अब तक दो लोकसभा चुनाव हो चुके हैं। यहां के मतदाताओं ने एक बार यह सीट बसपा को सौंपी तो दूसरी बार भाजपा उम्मीदवार को जिताकर संसद पहुंचाया। इस बार यहां मुख्य रूप से तीन प्रत्याशियों के बीच मुकाबला है।

2009 में बसपा की सीमा उपाध्याय ने कांग्रेस के प्रत्याशी राज बब्बर को चुनाव मैदान में पराजित किया था। उसके बाद 2014 के चुनाव नतीजे भाजपा के पक्ष में गए। तब भाजपा के चौधरी बाबूलाल ने बसपा की सीमा उपाध्याय को भारी अंतर से हराकर जीत दर्ज की थी। साल 2014 में कांग्रेस-आरएलडी गठबंधन में इस सीट से ठाकुर अमर सिंह चुनाव मैदान में कूदे थे, लेकिन वह चौथे स्थान पर रहे थे।

भाजपा ने इस बार राजकुमार चाहर को चुनाव मैदान में उतारा है। जबकि कांग्रेस से राज बब्बर चुनाव मैदान में हैं। गठबंधन से श्रीभगवान शर्मा ‘गुड्डू पंडित' चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सभा कर चुके हैं। कांग्रेस के लिए जन अधिकार मंच के अध्यक्ष बाबू सिंह कुशवाह ने सभा की है। गठबंधन दल ने भी मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिशें की हैं।

कुल मिलाकर फतेहपुर सीकरी में भाजपा, कांग्रेस और गठबंधन प्रत्याशी के बीच कांटे का मुकाबला होने की उम्मीद है।

फतेहपुर सीकरी में 2014 लोकसभा चुनाव के आंकड़े-

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हाथरस : ठाकुर-जाट वोटों का ध्रुवीकरण अहम
हाथरस : ठाकुर-जाट वोटों का ध्रुवीकरण अहम

हाथरस (सुरक्षित) सीट पर छह बार से भाजपा का कब्जा रहा है। अब वह यहां से सातवीं बार जीत सुनिश्चित करना चाहती है। इस सीट पर हार-जीत में जाट और ठाकुर मतदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। 18 अप्रैल को होने जा रहे चुनाव में फिलहाल मुकाबला त्रिकोणीय दिख रहा है, लेकिन गठबंधन और भाजपा कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

हाथरस सीट पर वर्ष 1991 से लगातार भाजपा का कब्जा रहा है। इस बार भाजपा ने अपने सांसद राजेश दिवाकर का टिकट काटकर इगलास विधायक राजवीर दिलेर को दिया है। राजवीर हाथरस सीट से लगातर चार बार सांसद रहे किशनलाल दिलेर के पुत्र हैं। सपा-बसपा-रालोद गठबंधन में यह सीट इस बार सपा के खाते में गई है। सपा ने रामजीलाल सुमन को उतारा है। कांग्रेस ने त्रिलोकीराम दिवाकर पर दांव खेला है। पिछले चुनाव में भाजपा के राजेश दिवाकर ने 5,44,277 वोट लेकर बसपा के मनोज सोनी को लगभग सवा तीन लाख मतों से हराया था। सपा के रामजीलाल सुमन को 1.80 लाख वोट मिले थे।

मजेदार बात यह है कि 1996 में यहां से रालोद उम्मीदवार जीता था और तब भाजपा-रालोद में गठबंधन था। इस बार गठबंधन भाजपा के सामने ताल ठोक रहा है। रालोद भी गठबंधन के साथ है। ऐसे में भाजपा की राह आसान नहीं है। भाजपा नेता और केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह और प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यहां सभाएं कर चुके हैं। सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी जनता की नब्ज टटोल चुके हैं।

रामजीलाल सुमन को गठबंधन की सामाजिक इंजीनियरिंग पर भरोसा है जबकि भाजपा मोदी-योगी के सहारे जीत का परचम एक बार फिर लहराने की तैयारी में है। लोकसभा के अंतर्गत आने वाले पांच विधानसभा क्षेत्रों में से चार पर भाजपा काबिज है। जातिगत आधार पर मतदाताओं की बात करें तो इगलास व सादाबाद क्षेत्र में जाट, सिकंदरा राऊ तथा छर्रा क्षेत्र में ठाकुर मतदाता बहुतायत में हैं। चूंकि बसपा लगातार इस क्षेत्र में दूसरे नंबर पर रही है, ऐसे में गठबंधन उम्मीदवार मानकर चल रहे हैं कि उनकी स्थिति मजबूत है। दलित वोट के साथ मुस्लिम, यादव गठजोड़ उन्हें जीत की दहलीज तक ले जा सकता है।

हाथरस में 2014 लोकसभा चुनाव के आंकड़े-

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मथुरा : जातीय समीकरण ही नैया पार लगाएंगे
मथुरा : जातीय समीकरण ही नैया पार लगाएंगे

मथुरा लोकसभा सीट भाजपा प्रत्याशी और अभिनेत्री हेमा मालिनी के कारण इस बार भी चर्चा में है। लेकिन ग्लैमर की सपनीली दुनिया उनकी वोटों की फसल को इस बार कितना पका पाएगी, फिलहाल कहना मुश्किल होगा। यहां जाटों के साथ-साथ ब्राह्मण और क्षत्रिय वोट निर्णायक स्थिति में हैं। हालांकि दलों के गुणा-भाग इस सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले की बात कर रहे हैं।

पिछले 20 वर्ष के चार लोकसभा चुनावों का रिकार्ड देखा जाए तो कान्हा की नगरी ने किसी को दूसरी बार सांसद नहीं चुना है। हर बार अपना मत बदल दिया है। 1999 के चुनाव में भाजपा के चौधरी तेजवीर सिंह ने रालोद के रामेश्वर सिंह को पराजित कर चुनाव जीता। उसके बाद 2004 में चुनाव हुआ तो मथुरा की जनता ने भाजपा और तेजवीर को नकार कर कांग्रेस के टिकट पर लड़े कुंवर मानवेंद्र सिंह के पक्ष में मतदान किया।

वर्ष 2009 में जब चुनाव हुआ तो ब्रजवासियों ने मानवेंद्र सिंह को तीसरे नंबर पर धकेल दिया और रालोद के जयंत चौधरी के पक्ष में मतदान किया। जयंत चौधरी ने बसपा के श्यामसुंदर शर्मा को पराजित किया। लेकिन 2014 के चुनाव में मथुरा के मतदाताओं ने जयंत को नकार दिया और हेमा मालिनी को विजयी बनाकर लोकसभा भेजा। इस बार मुख्य रूप से मुकाबला तीन प्रत्याशियों के बीच है। भाजपा ने पिछला चुनाव जीत चुकीं हेमा मालिनी को ही उतारा है। गठबंधन से रालोद के कुंवर नरेंद्र सिंह मैदान में हैं और कांग्रेस ने महेश पाठक को टिकट दिया है। हेमा मालिनी के लिए जहां खुद की साख दांव पर है वहीं रालोद के सामने अस्तित्व बचाने का सवाल है। कुंवर नरेंद्र सिंह के खुद के करियर की दिशा भी इस चुनाव का परिणाम तय कर देगा।

गौरतलब है कि मथुरा लोकसभा सीट पर कई बड़े सियासी दिग्गजों को भी हार का सामना करना पड़ा है। देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की यहां चुनाव में जमानत तक जब्त हो चुकी है। जबकि देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की पत्नी गायत्री देवी को भी यहां पराजय का मुंह देखना पड़ा था। लेकिन राजा बच्चू सिंह यहां से हेलीकॉप्टर से पर्चा फेंककर चुनाव जीत गए थे। बहरहाल, इस बार मुकाबले को रोचक बनाने के लिए सभी दल अपनी ताकत झोंक रहे हैं। दलों के स्टार प्रचारक अपने प्रत्याशियों के लिए गांव-गांव पसीना बहा रहे हैं। मतदाता भी खामोश हैं। ऐसे में ऊंट किस करवट बैठेगा, कहना मुश्किल है।

मथुरा में 2014 लोकसभा चुनाव के आंकड़े-

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