Lok Sabha elections Know How importance this Lok Sabha election for Ajit Singh Rashtriya Lok Dal party - लोकसभा चुनाव 2019: जानिए, अजीत सिंह की पार्टी के लिए इस लोकसभा चुनाव को जीतना क्यों है जरूरी DA Image
19 नबम्बर, 2019|2:47|IST

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लोकसभा चुनाव 2019: जानिए, अजीत सिंह की पार्टी के लिए इस लोकसभा चुनाव को जीतना क्यों है जरूरी

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लोकसभा चुनाव 2019 (Lok Sabha Elections) इस बार जहां कई मायनों में काफी दिलचस्प होने जा रहा है क्योंकि कई कद्दावर नेताओं की साख दांव पर है तो वहीं दूसरी तरफ इन चुनावों के बाद कई दलों की सियासी तकदीर भी तय होगी। इन्हीं दलों में से एक है अजित सिंह का राष्ट्रीय लोकदल।

सियासी वारिस को बचाने की जिम्मेदारी

राजनीति के माहिर खिलाड़ी माने जानेवाले अजीत सिंह के ऊपर अपने पिता और किसानों के नेता स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह की विरासत को बचाने की जिम्मेदारी है। अजीत सिंह ने उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन कर नया पैंतरा चला है।

पुश्तैनी सीटें छोड़ी

ऐसा माना जा रहा है कि इसके लिए अजीत सिंह ने पहली बार पुश्तैनी लोकसभा सीट बागपत को छोड़कर खुद मुजफ्फरनगर संसदीय सीट से उतरने का फैसला किया है जबकि बेटे जयंत चौधरी को बागपत से सियासी मैदान में उतार रहे हैं। जबकि, मथुरा सीट से वह पार्टी के किसी अन्य उम्मीदवार को उतार सकते हैं।

स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह की राजनीति यादव जाट, गुर्जर, राजपूत (अजगह) जातियों के गठजोड़ पर चलती थी। लेकिन, अजीत सिंह ने मुस्लिम, जाट, गुर्जर और राजपूत गठजोड़) यानि मजगर में बदल कर राजनीति की। लेकिन, राज्य में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजपार्टी की मजबूती ने मुस्लिम को यादव और दलितों की ओर रुख करने को मजबूर किया।

कम होता गया आरएलडी का रुतबा

चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद बेटे अजित सिंह उनकी सियासी विरासत को पूरी तरह से सहेज कर रखने में नाकाम रहे। 1998 और 2014 के लोकसभा चुनावों में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था। राष्ट्रीय लोकदल के लिए सबसे ज्यादा हैरान करनेवाला रहा लोकसभा चुनाव में भाजपा से हारने से ज्यादा तीसरे स्थान पर लुढ़क जाना। मुस्लिम और अन्य पिछड़े वर्ग के वोटों के खिसक जाने से 2017 के विधानसभा चुनाव में भी राष्ट्रीय लोकदल की हालत काफी खराब हो गई थी। पार्टी ने विधानसभा चुनाव के दौरान राज्य में 277 उम्मीदवार उतारे थे, परंतु छपरौली सीट ही बच सकी।

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अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है राष्ट्रीय लोकदल

राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष अजीत सिंह 1999 की अटल बिहारी वाजपेय और 2009 की यूपीए सरकार में केन्द्रीय मंत्री रहे। अजित के नेतृत्व में 2002 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया था। उस वक्त बीजेपी से गठबंधन के बाद 14 सीटें आरएलडी ने जीती। 2009 में बीजेपी से गठजोड़ कर लड़े लोकसभा चुनाव में आरएलडी को पांच सीटों पर जीत मिली थी। इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव पार्टी में कांग्रेस के साथ गठबंधन कर उतरी लेकिन 9 सीटों पर सिमट गए। अजित की पहचान अब एक जाट नेता के रूप में ही रह गई है।

मुजफ्फरनगर से हार गए थे चौधरी चरण सिंह

राष्ट्रीय लोकदल के लिए मुजफ्फरनगर सीट को शुभ नहीं माना जाता है। उसकी वजह है साल 1971 में चौधरी चरण सिंह की लोकसभा के चुनाव में मुजफ्फरनगर से हार। सीपीआइ के विजयपाल सिंह ने चुनाव में उन्हें शिकस्त दी थी। जिसके बाद चौधरी चरण सिंह ने बागपत को अपना सियासी लोकसभा क्षेत्र बना लिया था। हालांकि, साल 2009 के लोकसभा चुनाव में आरएलडी उम्मीदवार अनुराधा चौधरी भी हार गई थीं।

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