Lok Sabha Elections 2019: when dr murli manohar joshi left allahabad lok sabha seat after a defeat in 2004 - जब एक हार पर इलाहाबाद से रूठकर चले गए मुरली मनोहर DA Image

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जब एक हार पर इलाहाबाद से रूठकर चले गए मुरली मनोहर

murli manohar joshi

पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी को अपनी कर्मस्थली इलाहाबाद में 2004 के चुनाव में हार मिली तो वह रूठकर यहां से चले गए। उसके बाद वह यहां की सियासत में कभी वापस नहीं आए। 1996, 1998 और 1999 के आम चुनाव में इलाहाबाद संसदीय सीट से जीत की हैट्रिक लगाने वाले डॉ. जोशी ने शहर के लिए इतना कुछ किया की लोग आज भी याद करते हैं।

 

शहर में भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (ट्रिपलआईटी) की स्थापना हो या यमुना पर बना दूसरा पुल हो, डॉ. जोशी की देन है। उनके प्रयासों से ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। मोतीलाल नेहरू इंजीनियरिंग कॉलेज को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान का दर्जा भी उन्हीं के प्रयासों से हासिल हुआ। झूंसी में भू-चुम्बकत्व का केंद्र, शहर में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) का क्षेत्रीय कार्यालय खुलवाने के अलावा उन्होंने यमुनापार पार में सिंचाई की समस्या के समाधान के लिए भी काफी काम किया। 2004 के आम चुनाव में वह अपनी जीत को लेकर आश्वस्त थे। लेकिन चुनाव में मिली हार से उन्हें बहुत कष्ट हुआ। 


सपा के कुंवर रेवती रमण सिंह ने डॉ. जोशी को 28409 मतों से पराजित किया था। चुनाव में हार के बाद वह जुलाई में राज्यसभा के लिए चुन लिए गए। उसके बाद 2009 के आम चुनाव में उन्हें दोबारा इलाहाबाद से चुनाव लड़ने के लिए वरिष्ठ नेताओं ने अनुरोध किया, लेकिन वह नहीं आए। डॉ. जोशी के इलाहाबाद छोड़कर जाने से शहर को नुकसान भी उठाना पड़ा।
उनके समय में शंकरगढ़ के लिए स्वीकृत ऑयल रिफाइनरी अस्तित्व में नहीं आ सकी। सन 2000-2001 में जिला प्रशासन ने अधिग्रहण के लिए जमीन चिह्नित कर ली थी। लेकिन प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो सका। जनवरी-फरवरी 2004 में नैनी में मत्स्य विभाग के फार्म हाउस में साइंस सिटी के लिए भूमि पूजन हो गया था। लेकिन शीर्ष भाजपा नेता के जाने के बाद यह प्रोजेक्ट भी पूरा नहीं हो सका।


डॉ. जोशी के निजी सचिव रहे ब्रजेश कुमार गुप्ता बताते हैं कि 2004 के चुनाव में मिली हार से उन्हें बहुत पीड़ा हुई थी। डॉ. जोशी को 2009 में दोबारा इलाहाबाद से चुनाव लड़ने का अनुरोध किया तो आने को तैयार नहीं हुए। उनका कहना था कि जब मैंने मन से काम किया तब हार गया। इसलिए अब नहीं आऊंगा। उनकी इसी जिद के कारण 2009 में पार्टी ने वाराणसी से उन्हें उम्मीदवार बनाया।

 

1984 में मिली हार ने बहुगुणा को राजनीति से किया था दूर
प्रयागराज। इलाहाबाद संसदीय सीट से 1984 में मिली हार ने पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा को भी राजनीति से दूर कर दिया था। राजनीति के मजबूत स्तंभ बहुगुणा दिग्गज नेताओं में गिने जाते थे। 1984 के चुनाव में कांग्रेस छोड़कर लोकदल से मैदान में उतरे थे। कांग्रेस ने ऐन वक्त पर मेगास्टार अमिताभ बच्चन को टिकट दे दिया। उस चुनाव में अमिताभ की ऐसी हवा चली की बहुगुणा 187795 मतों से हार गए। बहुगुणा जैसे कद्दावर नेता के लिए यह हार किसी सदमे से कम नहीं थी। उसके बाद से उन्होंने राजनीति से दूरी बना ली। कांग्रेस के प्रवेश प्रवक्ता किशोर वाष्र्णेय बताते हैं कि 1984 के चुनाव परिणाम की घोषणा से पहले ही हेमवती नंदन बहुगुणा ने अपनी हार मान ली थी। उस हार ने उन्हें बहुत कष्ट पहुंचाया था। उसके बाद वह कभी चुनाव नहीं लड़े।

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