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वे दिन : किस्सा 1962 का, जब चौकीदार पर होती थी बूथ की जिम्मेदारी

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देश में हुए तीसरे लोकसभा चुनाव में बूथ की सुरक्षा को लेकर न तो कोई हो-हल्ला था, न ही तीन या चार स्तर का सुरक्षा घेरा। उस वक्त चुनाव शांतिपूर्ण और निष्पक्ष ढंग से कराने की जिम्मेदारी इलाके के चौकीदार पर हुआ करती थी। 

राष्ट्रीय घुमंतू जनजातीय आयोग के सदस्य प्रोफेसर (इमरेटस) डॉ. सचिंद्र नारायण बताते हैं कि 1962 में मैंने पहली बार गया में हुए लोकसभा चुनाव में अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। उस वक्त मतदान केंद्र काफी दूर हुआ करते थे। वहां पहुंचने के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता था, लेकिन दूरी मतदान के उत्साह में रोड़ा नहीं बनती थी।

बड़ी संख्या में लोग टमटम और बैलगाड़ी से भी बूथ तक पहुंचते थे। प्रत्याशियों के बीच सिद्धांत और विचारों की लड़ाई देखने को मिलती थी। प्रतिद्वंदी होने के बावजूद वे एक-दूसरे की मदद करने से पीछे नहीं हटते थे। चुनाव में व्यक्तिगत आलोचना को लोग बहुत घृणा की दृष्टि से देखते थे। 

डॉ. सचिंद्र नारायण के मुताबिक उस समय चुनाव में सड़कों पर पुलिस की गाड़ियां नहीं दौड़ती थीं। पूरे मतदान केंद्र की जिम्मेदारी एक चौकीदार पर होती थी। लोग मतदान केंद्र पर शांति और व्यवस्था बनाए रखने में उसका पूरा सहयोग करते थे। वे उसके निर्देश पर एक-एक करके अपनी बारी आने का इंतजार करते। फिर मतदान पर्ची पर पसंदीदा प्रत्याशी के नाम पर मुहर लगाने के बाद उसे बैलट बॉक्स में डालते और घर लौट जाते। 

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  • Web Title:Lok Sabha Elections 2019 we din when on a chowkidar handled security of polling booths