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लोकसभा चुनाव 2019 तीसरा चरण : सपा की पारिवारिक प्रतिष्ठा दांव पर

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तीसरे चरण में मुलायम सिंह यादव परिवार का गढ़ कही जानी वाली मैनपुरी, फिरोजाबाद और बदायूं सीटों पर मतदान है। वहीं एटा पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के प्रभाव वाला लोकसभा क्षेत्र माना जाता है। फिरोजाबाद में शिवपाल सिंह यादव और भतीजे अक्षय यादव की मौजूदगी ने मुकाबले को रोचक बना दिया है । पेश है मनोज चतुर्वेदी, शैलेंद्र उपाध्याय, आमोद कौशिक, शैलेंद्र शुक्ल और अमित उपाध्याय की रिपोर्ट -

मैनपुरी:  मुलायम के गढ़ को भेद पाना आसान नहीं
मैनपुरी लोकसभा सीट पर इस बार चुनाव में भाजपा और सपा-बसपा गठबंधन के बीच मुकाबला होगा। हालांकि इस बार लोकसभा सीट के लिए कुल 11 उम्मीदवार मैदान में हैं। लेकिन मुख्य रूप से दो प्रत्याशियों के अलावा शेष उम्मीदवार छोटे दलों के हैं या फिर निर्दलीय हैं। यहां सपा-बसपा गठबंधन के मुलायम सिंह और भाजपा के प्रेम सिंह शाक्य के बीच सीधी टक्कर होने की उम्मीद है।

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अब तक भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा मैनपुरी, किशनी में जनसभाएं कर चुके हैं। इससे पूर्व भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विनय कटियार भी यहां आकर भाजपा को जिताने की अपील कर चुके हैं। जहां तक मैनपुरी लोकसभा सीट का सवाल है, वर्ष 1989 में जनता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में मुलायम सिंह ने उदयप्रताप को उतारा था। उसके बाद से लगातार 30 सालों से यहां मुलायम और उनकी पार्टी का दबदबा बना हुआ है। मुलायम के गढ़ को यहां भेद पाना आसान नहीं है।

मैनपुरी सीट से मुलायम 1996, 2004, 2009 और 2014 में सांसद चुने गए। उनसे मुकाबले के लिए 1996 में भाजपा ने उपदेश सिंह चौहान को लड़ाया, लेकिन जीत नहीं मिल सकी। 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा के विनय शाक्य को करारी हार का सामना करना पड़ा। 2014 के चुनाव में मुलायम के सामने भाजपा के शत्रुघ्न सिंह चौहान ने चुनाव लड़ा। उपचुनाव में प्रेम सिंह उम्मीदवार बनाए गए। 2014 के आम चुनाव में मुलायम और उपचुनाव में सपा प्रत्याशी के रूप में यहां से तेजप्रताप चुनाव जीते। इस बार लोकसभा के लिए 23 अप्रैल को मतदान होना है। कांग्रेस ने यहां से अपना कोई उम्मीदवार नहीं उतारा है।

एटा: कल्याण के बेटे को तगड़ी चुनौती मिल रही 
एटा सीट हमेशा से चर्चा का विषय रही है। इस बार यहां से राजवीर सिंह राजू भाजपा से लगातार दूसरी बार संसद पहुंचने की लड़ाई लड़ रहे हैं। वहीं सपा-बसपा गठबंधन के प्रत्याशी देवेंद्र सिंह यादव ने अपने गणित से उनकी राह में कांटे बिछा रखे हैं। कांग्रेस और प्रसपा प्रत्याशी भी पूरा जोर लगा रहे हैं। उनकी उपस्थिति भी भाजपा और गठबंधन के गणित को बिगाड़ सकती है। कल्याण सिंह की जन्म और कर्मभूमि एक बार फिर भाजपा के सिर जीत का सेहरा बांधेगी? यह सवाल सभी के मन में कौंध रहा है। उनके बेटे राजवीर सिंह राजू यहां से निवर्तमान सांसद हैं। उन्हीं को इस बार भी प्रत्याशी बनाया गया है, लेकिन उनके लिए समीकरण 2014 के मुकाबले जटिल होते दिख रहे हैं। तब मोदी की लहर ने प्रदेश के करीब-करीब सभी भाजपा उम्मीदवारों का भला किया था, पर इस बार वैसी लहर का अभाव दिख रहा है। फिर भी राजू के लिए संतोष की बात ये हो सकती है कि जीत का इतिहास भाजपा के साथ ज्यादा रहा है। इनके पक्ष में अमित शाह की सभा हो चुकी है।

नरेंद्र मोदी भी 20 अप्रैल को सभा करेंगे। राजू यहां के लोधी, शाक्य, सवर्ण वोटरों और मोदी नाम के सहारे लड़ाई लड़ रहे हैं। सपा-बसपा गठबंधन के उम्मीदवार देवेंद्र सिंह इस सीट से पहले भी दो बार सांसद रह चुके हैं। रणनीतिकारों का मानना है कि इस बार दोनों ही दलों के ठोस वोटरों का साथ देवेंद्र सिंह को मिल सकता है। सपा मुखिया अखिलेश यादव उनके लिए दो सभाएं भी कर चुके हैं। देवेंद्र सिंह की बेटी वसु यादव भी उनका पूरा साथ दे रही हैं। आगे भी और सभाएं होनी हैं। अगर 2014 के आंकड़ों पर गौर करें तो गठबंधन का उम्मीदवार अपने प्रतिद्वंद्वी भाजपा उम्मीदवार को कड़ी टक्कर देता नजर आ रहा है। रणनीतिकारों की मानें, तो वोटरों के इसी गणित के चलते मोदी को यहां सभा करनी पड़ रही है। हालांकि यह तो समय के गर्भ में है कि यहां से कौन जीतेगा।

इस चुनाव में कांग्रेस ने सीधे-सीधे कोई प्रत्याशी चुनाव मैदान में नहीं उतारा है। उसका जन अधिकार पार्टी से गठबंधन है। इस दल से पूर्व मंत्री सूरज सिंह शाक्य चुनाव लड़ रहे हैं। 2014 में यहां से कांग्रेस ने महान दल के साथ लड़ाई लड़ी थी। उसके प्रत्याशी ने उपस्थिति भी दर्ज कराई थी, लेकिन इस बार महान दल भाजपा के साथ खड़ा है। शिवपाल सिंह यादव की प्रसपा भी सामाजिक कार्यकर्ता को चुनाव मैदान में लेकर आई है। डॉ. रश्मि यादव इस लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रही हैं। शिवपाल ने सपा छोड़कर प्रसपा का गठन किया है। उनका यहां पहले भी काफी दबदबा रहा है। ऐसे में चुनावों के दौरान इनकी भी मजबूत उपस्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता। शिवपाल की सभा डॉ. रश्मि के पक्ष में होनी है।

बदायूं: धर्मेंद्र यादव की साख का सवाल

बदायूं सीट पर यूपी के सबसे मशहूर राजनीतिक घराने मुलायम सिंह के परिवार की मजबूत पकड़ है। इस यादव बहुल सीट पर दशकों से सपा का कब्जा है। सपा ने ने एक बार फिर सांसद धर्मेंद्र यादव को चुनाव मैदान में उतारा है। मुस्लिम-यादव के अलावा एससी वोटों के जरिये सपा-बसपा गठबंधन अपनी जीत पक्की मान रहा है। हालांकि इस बार उनका मुकाबला राज्य मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी संघमित्रा मौर्य से है।

स्वामी प्रसाद मौर्य पूर्व में बसपा के कद्दावर नेता थे और अब भाजपा में हैं। साथ ही, चार बार सपा से सांसद रहे सलीम शेरवानी इस बार कांग्रेस के टिकट पर ताल ठोक रहे हैं। 2014 में मोदी लहर में भी सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने अपनी सीट को न केवल सुरक्षित रखा, बल्कि 1,66,347 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। मोदी लहर में भाजपा के वागीश पाठक को 3,32,031 वोट मिले थे, जबकि कांगे्रस ने इस सीट पर अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं कर अप्रत्यक्ष रूप से सपा को समर्थन दिया था। इस बार समीकरण काफी अलग हैं।

2014 में बसपा के टिकट पर मैनपुरी में मुलायम सिंह को चुनौती देने वाली संघमित्रा मौर्य इस बार भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं। सपा से अलग होकर कांग्रेस में आए पूर्व दर्जा प्राप्त मंत्री आबिद रजा ने भी सपा की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कुल मिलाकर बदायूं सीट पर बने नए समीकरणों ने धर्मेंद्र यादव की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।  

फिरोजाबाद:  चाचा-भतीजा में रोचक लड़ाई

फिरोजाबाद लोकसभा सीट पर इस चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबला साफ दिख रहा है। मतदाताओं का क्या रुख रहेगा, ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका गुणा-भाग राजनीतिक विश्लेषक भी नहीं लगा पा रहे हैं। पार्टियों ने इस बार स्टार प्रचारकों की भी ज्यादा सभाएं नहीं रखी हैं। फिरोजाबाद लोकसभा सीट पर नजर डालें तो भारतीय जनता पार्टी ने यहां पर हैट्रिक बनाई है। सांसद प्रभु दयाल कठेरिया लगातार तीन बार (1991, 1996 और 1998 में) चुने गए। इसके अलावा समाजवादी पार्टी के रामजीलाल सुमन को भी जनता ने दो बार लगातार 1999 और 2004 में जिताया। इनके अलावा किसी अन्य को यहां दूसरी बार सांसद बनने का मौका नहीं मिला है।

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वर्ष 2009 के चुनाव में यहां की जनता ने सपा के अखिलेश यादव को जिता कर भेजा और उन्होंने सीट छोड़कर उपचुनाव में अपनी पत्नी डिंपल यादव को मैदान में उतारा था। उपचुनाव में राज बब्बर ने डिंपल को हरा दिया था। 2014 में जनता ने सपा के अक्षय यादव में अपना भरोसा जताया। यहां मुख्य मुकाबला तीन प्रत्याशियों के बीच है। एक ओर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव सपा-बसपा गठबंधन से मैदान में हैं। वहीं दूसरी ओर मुलायम के भाई शिवपाल सिंह यादव, जिन्होंने प्रसपा बनाई है, भी मैदान में हैं।

भाजपा ने सिरसागंज के डॉ. चंद्रसेन जादौन पर दांव लगाया है। कांग्रेस ने यहां से प्रत्याशी नहीं उतारा है। भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में हाल ही में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह जनसभा कर चुके हैं। शिवपाल सिंह यादव भी लगातार जनता के बीच जा रहे हैं। गठबंधन प्रत्याशी के लिए 20 अप्रैल को अखिलेश, मायावती और जयंत चौधरी संयुक्त रैली करेंगे।

आंवला: त्रिकोणीय मुकाबले के बीच जातीय गणित पर ही भरोसा 

बरेली जिले की दूसरी लोकसभा सीट आंवला पर मुकाबला भाजपा के धर्मेंद्र कश्यप और बसपा-सपा गठबंधन उम्मीदवार रुचि वीरा के बीच माना जा रहा है। हालांकि कांग्रेस ने भी पूर्व सांसद कुंवर सर्वराज सिंह को चुनावी रण में उतार कर मुकाबला त्रिकोणीय बना दिया है। समीकरणों के हिसाब से इस बार चुनाव में भाजपा सांसद धर्मेंद्र कश्यप की राह आसान नहीं लग रही।

गठबंधन की उम्मीदवार रुचि वीरा को बाहरी होने की वजह से मतदाताओं के बीच पहचान बनाने में थोड़ी दिक्कत आ रही है, लेकिन उनके पास सपा और बसपा के आधार वोट हैं। मुस्लिम और दलित वोटों को गठबंधन के साथ लाने की कोशिश हो रही है। दूसरी ओर, भाजपा सांसद धर्मेंद्र कश्यप 2014 के समीकरण को बरकरार रखने की कवायद में लगे हैं। आंवला सीट पर ठाकुर वोटर अच्छी-खासी संख्या में हैं।

कांग्रेस के उम्मीदवार कुंवर सर्वराज सिंह ठाकुर हैं। इसका फायदा सर्वराज को मिलता भी दिख रहा है। भाजपा के तमाम नेता आंवला सीट पर पूरी ताकत लगा रहे हैं। प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) ने भी सुनील कुमार को उतारा है। हालांकि उनका मतदाताओं पर कोई खास असर नहीं है। 

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  • Web Title:lok sabha elections 2019 third phase samajwadi party family s reputation is at stake in upcoming polls