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लोकसभा चुनाव 2019 :राजनीतिक विरासत की जंग अपनों में भी कम नहीं

विरासत को लेकर कब अपने बेगाने हो जाएं कहा नहीं जा सकता है। कहीं चाचा-भतीजा तो कहीं मां बेटी...तो कहीं देवरानी जेठानी... एक दूसरे के आमने-सामने हैं। यूपी की राजनीति विरासत को लेकर यह जंग काफी पुरानी है। राजनीतिक विरासत को पाने की होड़ या इससे कहीं आगे निकल जाने की जद्दोजहद खूब दिख रही है। यह लड़ाई यूपी के कई राजनीतिक परिवारों में देखी जा सकती है। पेश है  रिपोर्ट- 

गांधी परिवार भी अछूता नहीं
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी के निधन के बाद उनकी पत्नी मेनका गांधी ने राजनीति में पहचान बनाने के लिए अलग राह चुनी। अपने पति के नाम से सबसे पहले संजय विचार मंच का गठन किया। 1984 में हुए लोकसभा के चुनाव में अपने जेठ राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरीं, तो जरूर लेकिन हार का सामना करना पड़ा। मेनका गांधी और उनके पुत्र वरुण गांधी अब दोनों भाजपा में हैं।

मां-बेटी में विरासत की जंग
अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल की मौत के बाद उनकी राजनीतिक विरासत अपने पत्नी कृष्णा पटेल आगे बढ़ा रही थीं। वर्ष 2014 में भाजपा से गठबंधन से उनकी बेटी अनुप्रिया पटेल के सांसद बनने के साथ ही राजनीतिक विरासत को लेकर ऐसा विवाद खड़ा हुआ कि दोनों ने अलग राह चुनना मुनासिब समझा। राजनीतिक विरासत को लेकर मां-बेटी में ऐसी जंग छिड़ी कि अनुप्रिया पटेल भाजपा के साथ और कृष्णा पटेल कांग्रेस के साथ गठजोड़ कर चुनाव लड़ रही हैं।

पति-पत्नी की अलग राह
अमेठी राजघराने डा. संजय सिंह अगर कांग्रेस की राजनीति कर रहे हैं तो उनकी पहली पत्नी गरिमा सिंह भारतीय जनता पार्टी से सियासत में कदम रखा है। गरिमा सिंह रियासत की विरासत को लेकर राजनीति में उतरी। भाजपा ने उन्हें विधानसभा चुनाव 2017 में मैदान में उतारा और वह चुनाव जीतने में सफल रही। डा. संजय सिंह सुल्तानपुर से इस बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा से यहां से मेनका गांधी को मैदान में उतारा है।

शिवपाल अलग रास्ते पर

यूपी की राजनीति में मुलायम परिवार हमेशा से सशक्त माना गया। मुलायम सिंह यादव मुखिया तो उनके भाई शिवपाल सेंकेंड कमांडेंट के रूप में पार्टी को आगे बढ़ाते रहे, लेकिन एक दौर ऐसा आया कि इस परिवार में भी ठन गई। सपा की कमान अखिलेश के हाथ में आने के बाद चाचा शिवपाल अपने को अलग-थलग होता देख अलग राह चुन ली। शिवपाल ने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया के नाम से अलग पार्टी बनाई। लोकसभा चुनाव में वह ताल ठोंक रहे हैं।  

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  • Web Title:Lok Sabha Elections 2019: Political Heritages Roots Not Even In Their Neighbors