Lok Sabha Elections 2019: MPs can not find a political place - लोकसभा चुनाव 2019 : सांसद रह चुके बाहुबलियों को नहीं मिल रहा सियासी ठिकाना DA Image

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लोकसभा चुनाव 2019 : सांसद रह चुके बाहुबलियों को नहीं मिल रहा सियासी ठिकाना

लंबे अरसे बाद यूपी की राजनीति में आम चुनाव के दौरान टिकटों की दावेदारी मे दबंग व बाहुबली नेता पिछड़ते नजर आ रहे हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद पूर्व में सांसद रह चुके बाहुबली नेता बड़े दलों से टिकट नहीं ले सके हैं। बड़े दलों के गठबंधन में शामिल छोटे दलों तक हाथ-पैर चलाने के बावजूद भी इन्हें कोई सफलता नहीं मिल रही है। अब इन दबंग नेताओं के सामने एक ही रास्ता है कि वह किसी छोटे दल का दामन थामे या निर्दल होकर मैदान में जाएं।

राजनीतिक दलों द्वारा बेदाग प्रत्याशी लेने की सोच ने बाहुबलियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। किसी जमाने में सपा, बसपा के साथ ही राष्ट्रीय पार्टियों के टिकट बाहुबली आसानी से लाते थे और चुनाव जीतकर माननीय बन जाते थे। 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव से बाहुबली छवि के लोगों को टिकट नहीं देने की नींव उत्तर प्रदेश में पड़ी थी।

जनता अब नकारने लगी है बाहुबली नेताओं को : उत्तर प्रदेश में 2012 के विधानसभा चुनाव से पूर्व तक बाहुबली होना चुनाव में जीत की गारंटी मानी जाती थी। सभी दल इन पर दांव लगाते थे। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में  तमाम बाहुबलियों को हार का मुंह देखना पड़ा। हारने वालों में अतीक अहमद, बृजेश सिंह, अमरमणि के बेटे अमनमणि और धनजंय सिंह की पत्नी जागृति सिंह आदि नाम प्रमुख रहे। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में धनंजय सिंह, अतीक अहमद, मित्रसेन यादव, डीपी यादव, रमाकांत यादव, रिजवान जहीर, बाल कुमार पटेल जैसे बाहुबलियों को भी तमाम जोड़-जुगाड़ के बावदूज हार का मुंह देखने को मजबूर होना पड़ा।

अतीक अहमद 
जेल में बंद बाहुबली अतीक अहमद 2004 के चुनाव में सपा से फूलपुर से सांसद चुने गए थे। पांच बार विधायक भी रह चुके हैं। फूलपुर वह सीट है जहां से जवाहर लाल नेहरू चुनाव लड़ा करते थे। इस चुनाव में भी अतीक मैदान में उतरने की तैयारी में हैं। एक राष्ट्रीय पार्टी के गठबंधन में शामिल छोटे दल से टिकट पाने की ेउनकी कोशिश नाकाम हो चुकी है। 

रमाकांत यादव
रमाकांत यादव 2009 में भाजपा के टिकट पर आजमगढ़ से सांसद चुने गए थे। 2014 की मोदी लहर में भी वह भाजपा के प्रत्याशी थे लेकिन मुलायम सिंह यादव से चुनाव हार गए। रमाकांत यादव विधायक भी रह चुके हैं। इस बार भी रमाकांत भाजपा से टिकट की दावेदारी में थे, लेकिन भाजपा ने निरहुआ को टिकट देकर साफ कर दिया कि अब वह दबंगों को टिकट नहीं देगी। 

धनंजय सिंह
जौनपुर से 2009 में बसपा से सांसद चुने गए थे। इससे पूर्व 2002 और 2007 में जदयू से जौनपुर के ही रारी से विधायक चुने गए। 2014 लोकसभा चुनाव में निर्दल मैदान में उतरे और चुनाव हार गए थे। इस चुनाव में टिकट के लिए धनंजय ने पहले कई बड़े दलों में भागदौड़ की लेकिन दाल नहीं गली।  अब धनंजय सिंह बड़े दल के सहयोगी छोटे दलों के संपर्क में लगातार बने हैं, लेकिन कहीं बात बनती नजर नहीं आ रही है। जौनपुर से चुनाव लड़ने की तैयारी कर चुके धनंजय सिंह हो सकता है निर्दल या फिर किसी छोटे दल के टिकट से चुनाव मैदान में उतरना पड़े।

उमाकांत यादव
उमाकांत यादव इस समय जेल में हैं। यह रमाकांत यादव के भाई हैं। 2004 में बसपा के टिकट पर सांसद चुने गए थे। जेल में रहते हुए भी इन्होंने कई दलों में सियासी ठौर तलाशने की कोशिश की, कोई सफलता नहीं मिली। 

खुद सांसद बनने व परिवार को आगे बढ़ाने की होड़
दबंग छवि के उपरोक्त पूर्व सांसदों के अलावा प्रदेश में कई ऐसे बाहुबली भी इस बार टिकट की दौड़ में थे, जो विधायक हैं या पूर्व विधायक रह चुके हैं। इनमें से कई ऐसे भी हैं जो पूर्व में सांसद का चुनाव लड़े लेकिन जीत नहीं सकें। ऐसे दबंग व बाहुबली नेताओं में विधायक मुख्तार अंसारी, गुड्डू पंडित, ब्रजेश सिंह आदि शामिल हैं। जेल में बंद विधायक मुख्तार अंसारी अपने भाई पूर्व सांसद अफजाल अंसारी को गाजीपुर से बसपा का प्रत्याशी बनाना चाहते हैं। 

मुख्तार पड़ोस की सीट घोसी अपने बेटे अब्बास के लिए चाहते थे, लेकिन बसपा ने यहां से मुख्तार के ही करीबी अतुल राय को प्रभारी घोषित कर रखा है। पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी बेटे विधायक कुशल तिवारी को संतकबीर नगर से बसपा से चुनाव मैदान में उतारना चाहते हैं। अभी तक कुशल का टिकट फाइनल नहीं हो सका है।  

अखिलेश ने कर लिया था बाहुबलियों से किनारा 
2017 के विधानसभा चुनाव में बाहुबलियों को टिकट नहीं देने का बड़ा कदम अखिलेश यादव ने उठाया था। मुख्तार अंसारी और उनके परिवार को सपा में शामिल करने का विरोध किया। अतीक अहमद, विजय मिश्र, गुड्डू पंडित, अमनमणि का टिकट काट दिया था। अधिकांश बाहुबली छोटे दलों के टिकट पर चुनाव में उतरे और हारे। सिर्फ मुख्तार अंसारी ही विधायक बनने में सफल रहे।  

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